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कथनी और करनी

बुङ्ढा एक रहा करता था जंगल के एक गाँव में
उसकी छोटी सी कुटिया थी एक घनेरी छाँव में
उसकी पत्नी दिनभर करती थी मिहनत के काम
साँझ-सबेरे थकती बुढिया, रात करे आराम
बुङ्ढा चुप-चुप बैठा रहता पर था शेखीखोर बडा
अपनी 'बकबक' से लोगों को करता था वह 'बोर' बडा
'तीन दिनों में तुम जो करती, बुढिया! सारा काम
एक पहर में मैं निपटा दूँ और करूं आराम'
बुढिया बोली, ''अच्छा, प्यारे! कल मैं  बैठूँगी चुपचाप
तुम निबटा लेना घर के सब काम सुबह उठ अपने आप
दूध दूहना और सूअरों को देना आहार
चूजों को दाने चुगवा, चरखे से जरा उतार
धागों के लच्छे लपेटना तुम मत जाना भूल''
बुङ्ढे ने गर्दन मटकाई, ''अच्छा मुझे कबूल''
अगले दिन जब सूरज जागा बुढिया सोई खाट
बर्तन लेकर बुङ्ढा भागा कमली गैया पास
दूध दूह भी सका न तबतक एक लात में पटकी खा
बुङ्ढा भागा टाँग हिलाता और नाक से खून गिरा
चला सूअरों के बाडे में, सिर टकराया जोर
ऊपर की चौखट में, बुङ्ढा भागा करता शोर
चूजों को तो किसी तरह से उसने दाना चुगा दिया
लेकिन धागों को लपेटना बिल्कुल दिल से भुला दिया
अब वह समझ गया था कथनी और करनी का भेद
सचमुच उसे निकम्मेपन पर हुआ बहुत ही खेद

(एक अंग्रेजी बाल कथा पर आधारित )

_ सुनीतिचन्द्र मिश्र
सितम्बर 1, 2000
 

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