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यात्रा वृत्तान्त
सिक्किम के
पाँच
खज़ाने
अस्त्युत्तरस्याम् दिशि देवतात्मा हिमालयोनाम नगाधिराजः
पूर्वापरौ तोयनिधीवगायः सितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।
- कालिदास, कुमारसम्भव
भारत के
उत्तर में देवता के समान पूजनीय हिमालय नाम का विशाल पर्वत है।
वह पूर्व और पश्चिम के समुद्रों तक फैला हुआ ऐसा लगता है
मानो वह पृथ्वी को नापने तौलने का मानदण्ड है।
'सोसायटी
ऑफ नेचर फोटोग्राफर्स'
की शीतकालीन (वर्ष
1987)
कार्यशाला,
सिक्किम ललित कला
अकादमी के तत्वावधान में होने जा रही थी और सदस्य के नाते मेरे पास भी
सूचना आई। अब सोचना पडा,
क्योंकि यदि कश्मीर
होता,
कुलू मनाली,
कोडाली-कनाल जैसे
जाने माने सुंदर स्थल या काजीरंगा,
कान्हा आदि अभयारण्य
होते तो बिना सोचे हाँ कह देता किंतु सिक्किम। सिक्किम की क्या खासियत है,
क्या आकर्षक है?
हिमालय पर्वत
श्रृंखला इस पृथ्वी पर विशालतम प्राकृतिक संरचना है और विश्व का प्रथम
प्राकृतिक आश्चर्य है। बहुल अनुपम और अद्वितीय वनस्पतियों और औषधियों का
भंडार है,
हजारों जातियों के सुंदर
पक्षियों का बसेरा है तथा अलौकिक सौंदर्य का खजाना है। भारतवर्ष में लगभग
45
हजार जाति की वनस्पतियां
हैं, 15
हजार पुष्प से सजने वाली
हैं और लगभग 25
हजार औषधि का काम करती हैं।
विश्व में लगभग 35
हजार अनोखी छटा वाले ऑर्किड
(एक प्रकार के 'जीवन्ती'
नाम के फूल) पुष्पी
पौधे हैं। इनमें से लगभग 1300
जातियां भारतवर्ष
में हैं जिनमें से लगभग 600
सिक्किम में हैं।
भारतवर्ष मे लगभग 12500
जातियों के पक्षी हैं,
जबकि सिक्किम में
लगभग 550।
सारे भारतवर्ष में लगभग 15
हजार पुष्पीय पौधें
हैं जबकि सिक्किम में लगभग
4000। इससे यह तो
साबित हो जाता है कि सिक्किम की उपलब्धि विशेष है तथा उसका कारण उसका
हिमालय की गोद में खेलना है।
सिक्किम की
प्राकृतिक संरचना एक सुदृढ क़िले के समान है। इस की पश्चिम (नेपाल) सीमा
पर सिंहलीला,
उत्तरी (तिब्बत) पर
चोमियोमों,
पूर्व (तिब्बत तथा भूटान)
सीमा पर दोख्या नाम की पर्वत श्रंखलाएं हैं,
और दक्षिण दिशा में
भारत की ओर तीस्ता नदी की घाटी उसका मुख्य द्वार है। इसकी चौडाई पूर्व_पश्चिम
मे लगभग 65
किलोमीटर है और लंबाई
उत्तर-दक्षिण दिशा मे 100
किलोमीटर है। तीन
तरफ ऊंचे पहाडों से घिरा होने के कारण सिक्किम के दक्षिण द्वार से जब
मानसून पानी से लडी हवायें ले जाता है तब वे इस छोटे से क्षेत्र में लगभग
630
सेंटीमीटर की वर्षा प्रतिवर्ष करती हैं।
यदि हम तीस्ता के
पठार से बढना शुरू करें तो पहले हमें उष्ण कटिबंधीय पौधे और वृक्ष जैसे,
आम,
नीम,
कटहल आदि मिलेंगे।
फिर लगभग 7000
फुट की ऊंचाई चढने पर
समशीतोष्ण कटिबंधीय वृक्ष जैसे,
चीड,
स्प्रूस (एक प्रकार
का देवदार) बांज या बलूत (ओक),
मैग्नोलिया आदि
मिलेंगे और 10
हजार फुट की ऊंचाई चढने पर
आल्पीय (अल्प पर्वत सदृश्य) मखमली घास,
जिसमें रंग-बिरंगे
विभिन्न किस्म के फूल जैसे प्रिम्यूला,
ब्लूजैन्शियन,
सैक्सीफ्राज,
ईडलवाइस आदि खिले
मिलेंगे। फिर तिब्बती,
ठंडा मरुस्थली पठार और फिर
कंचनजंगा की अनंतकालीन बर्फ। इसी तरह पक्षियों और अन्य जंतुओं की विविधता
भी मिलती है। विश्व में अन्यत्र इतनी वानस्पतिक तथा जलवायु की विविधता
पाने के लिए कुछ हजार किलोमीटर की यात्रा तय करनी पडेग़ी,
जबकि सिक्किम में
मात्र 50-60
किमी की यात्रा यथेष्ट
होगी। मैंने गौर किया कि जिस तरह छोटे से सिक्किम में विश्व के पाँचों
प्रकार के वानस्पतिक प्रकार मिल जाते हैं और इतनी विभिन्नता लिए हुए,
एक साथ मेल जोल से
रह रहे हैं कुछ वैसे ही हम लोगों की संस्था सोसायटी ऑव नेचर फोटोग्राफर्स
है जिसमें सारे भारत के लोग हैं अपनी अपनी विभिन्नता लिए किन्तु जब आपस
में मिलते हैं तो कितनी समानताएं - सोचने में,
मूल्यों में,
जीवन दर्शन में -
मिलती हैं।
कंचनजंगा का नाम
मैंने सुन रखा था और लगता था कंचनजगा जैसे सिक्किम का पर्यायवाची है।
कंचनजगा की ऊंचाई 282216
फुट मानी जाती है। (हिमालय की चोटियां अभी भी बढ रही हैं) और विश्व की
सबसे ऊंची चोटी में इसका स्थान तीसरा है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं
कि कंचनजंगा का सिक्किम की संस्कृति में विशेष महत्त्व है। लेप्चा भाषा
में कंचनजगा का सही उच्चारण खाँगचेंदजोंगा है और इसका अर्थ है,
'हिम के पाँच अनंत
खजाने'।
क्योंकि कंचनजंगा मे 5
चोटियां हैं और ये
5
खजाने स्वर्ण जैसे बहुमूल्य
खनिज,
औषधियां,
अस्त्र शस्त्र,
वस्त्र और धर्मग्रंथ
हैं। कंचनजंगा को सिक्किम लोग अपने प्रिय रक्षक देवता (देवी नहीं) के रूप
में मानते हैं और उनकी यह श्रध्दा इतनी गहरी है कि
1955
के ब्रितानी पर्वतारोही दल
को उन्होंने कंचनजंगा पर इस शर्त पर चढने की अनुमति दी थी वे उसके शिखर
पर नहीं चढेंग़े और इसलिए वह दल शिखर से
5
फुट नीचे तक जाकर ही वापस
लौटा। ये पांच खजाने साधारण आदमी की मुख्य आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
इसका अर्थ यही समझा जाना चाहिए कि प्राकृतिक और पारस्थितिकी (इकोलॉजी) की
दृष्टि से सिक्किमी लोग हजारों वर्ष पहले सिक्किम की समृध्दि के लिए
कंचनजंगा का महत्त्व समझ गए थे और उसका सम्मान करते आए हैं। यदि इन
खजानों को मैं आधुनिक नाम देने की धृष्टता करूं तो वे क्रमशः इस प्रकार
होंगे : प्राकृतिक
सौंदर्य,
वनस्पति और आर्किड,
इलायची,
शांतिप्रिय लोग,
धर्मग्रंथ।
सन्
1848
मे एक प्रसिध्द अंग्रेज वनस्पतिज्ञ,
जॉन डॉल्टन हुक्कर
ने सिक्किम आकर न केवल यहां के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद उठाया,
वरन यहां की बहुत
सारी अनुपम और बाकी विश्व में न मिलने वाली वनस्पतियों और आर्केडों को वे
सिक्किम से बाहर ले गए और उनका प्रचार यूरोप में अधिक हुआ। जॉन हुकर वही
थे जिनकी मूल्यवान सलाह चार्ल्स डार्विन ने अपने मानव विकास सिध्दांत के
लिए ली थी। विश्व में सबसे पहले लेख का जिसमें कि एवरेस्ट चोटी का जिक्र
किसी विदेशी ने किया हो,
श्रेय संभवतः इन्हीं
डॉ ज़ॉन डाल्टन हुकर को मिलेगा। सन
1848
में उन्होंने कंचनजंगा
पर्वत श्रृंखला पर घूमते हुए पश्चिम की दिशा में एक बहुत ही भव्य ऊंची
चोटी देखी जोकि वहां से लगभग एक सौ पच्चीस किलोमीटर थी और उन्होंने अपनी
डायरी में नोट किया कि वह चोटी हिमालय पर्वत श्रृंखला के उस क्षेत्र की
चोटियों में सबसे ऊंची और भव्य है तथा नेपाली लोग उसे
'त्सुन्याओं'
के नाम से पुकारते
हैं।
वैज्ञानिक सर्वेक्षण
की त्रिकोणमितीय पध्दति से हिमालय की चोटियों की परिशुध्द स्थिति एवं
ऊंचाई मापने का कार्य भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने
1849-1885
में किया था। तथा 1856
में ही गणना से सिध्द हुआ कि
29028 फुट ऊंची चोटी
सबसे ऊंची चोटी है। श्री एवरेस्ट ने भारतीय सर्वेक्षण विभाग में
1816
से कार्य करना प्रारम्भ
किया था,
तथा
1830-1843
तक भारतीय सर्वेक्षण विभाग
के सर्वोच्च पद पर रहे। दृष्टव्य है कि श्री एवरैस्ट को,
जिन्होने यह
वैज्ञानिक त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण पध्दति का शुभारम्भ कराया था,
सम्मान देने के लिये
उनकी सेवा निवृत्ति के तेरह वर्षों बाद उनके सम्मान में सर्वोच्च शिखर को
उनका नाम दिया गया।
हम लोग जलपाईगुडी
25
दिसंबर 1987
को सुबह 11
बजे ही पहुंच गए थे और लगभग 12
बजे वहां से सिक्किम नेशनल ट्रांसपोर्ट की बस से गंतोक के लिए चल पडे।
ग़ंतोक जाने की सडक़ तीस्ता नदी (सिक्किम की गंगा) के किनारे-किनारे ही
चलती है। यात्रा के शुरू में हम लोगों को अपने गर्म पुलोवर उतार देने पडे
क्योंकि दिसंबर के महीने में भी,
उस समय बडी ग़र्मी लग
रही थी और हम ठंडी हवा के साथ-साथ मनोरम दृश्यों का आनंद ले रहे थे।
प्रारंभ में इस सडक़ के दोनों तरफ वनों में शाल के वृक्षों की अधिकता थी
और बीच-बीच में सागोन,
अश्वपत्र,
आम,
नीम,
आदि ऊष्ण-कटिबंधीय
वृक्षों के तनों पर एपीफाइट (उपरिरोही) फर्न (पुष्पहीन वनस्पति) पायल या
बाजूबंद की तरह सजे हुए थे और कहीं-कहीं भाग्यवान तनों पर भव्य रंग रूप
वाले ऑर्किड शोभायान थे। शाल का जंगल घना होता है। और वह बडा साफ और
प्रकाशवान रहता है,
क्योंकि राजसी तथा
'शालीन'
वृत्ति का शाल वृक्ष
बेलों,
झाडियों और लताओं आदि को
अपने पास पनपने का प्रोत्साहन नहीं देता है। थोडी दूर चलने पर और थोडी
ऊंचाई पर जाने पर जंगल अधिक घना हो जाता है और उनमें बेलों लताओं और
दूसरे उपरिरोही तथा परजीवी पौधों की संख्या बढ ज़ाती है। सडक़ की वह यात्रा
जिसमें एक तरफ तीस्ता का प्रवाहमान शुध्द जल मन को आह्लादित करता है और
दूसरी तरफ वृक्षों की हरीतिमा मन को हर लेती है,
ॠषिकेश से बद्रीनाथ
के दृश्यों की याद दिलाती है। किन्तु यहाँकी वनस्पति में अधिक विविधता है,
विशेषकर प्रारंभ में
ऊष्ण कटिबंधीय पौधे और वृक्ष अधिक है।
अभी सिक्किम की सीमा,
शायद बारह-पन्द्रह
किमी होगी कि,
पश्चिम की ओर दार्जिलिंग
जाने वाली सडक़ मिली थी। दार्जिलिंग में भी आकर्षण है,
किन्तु वह रहस्य नहीं जे 'गन्तोक'
नाम में है। आगे
चलने पर सीमा से आठ-दस किमी पहले पूर्व की ओर जाती एक सडक़ मिली - जो
कलिम्पोंग जाती है। कलिम्पोंग,
इस क्षेत्र में अपने
पुष्पों के लिये बहुत विख्यात है,
तथा आधुनिक भागमभाग
से बचा हुआ भी। रंगपो एक छोटा शहर है,
जो पश्चिम बंगाल और
सिक्किम की सीमा पर स्थित है। रंगपो पहुंचते-पहुंचते चार बज चुके थे और
अब हवा में थोडी ठंडक और बढ ग़ई थी,
इसलिए सिक्किम
प्रवेश करते हुए हमने अपने पुलओवर पहन लिए। यहां पर शराब की दुकानें बहुत
हैं,
शराब पर कर भी कम है। बौध्द
लोग धार्मिक कृत्यों के साथ मद्यपान भी करते हैं। किन्तु ऊधम या शोर
मचाने वाले शराबी बहुत कम देखे।
वैसे तो पहाड क़ी
चढाई-उतराई बहुत पहले शुरू हो गयी थी,
किन्तु रंगपो के बाद
घुमाव ज्यादा हैं और यहां की वनस्पति अब बदलकर समशीतोष्ण कटिबंधीय हो गई
थी। शाल और सागोन आदि के स्थान पर बलूत (ओक),
देवदारु (स्प्रूस)
आदि आने शुरू हो गये थे। इस सडक़ पर यात्रा करते समय एक बात और ध्यान में
आई,
वह यह कि यहां पर ट्रेफिक
कम है और गांवों के आस-पास भी लोग जरा कम ही नजर आते हैं क्योंकि वनों के
साथ सुखी सहस्तित्व रखते हुए घनी आबादी का रहना मुश्किल ही है। सिक्किम
में बर्फीले पहाडों के बावजूद लगभग
12
प्रतिशत जंगल हैं किन्तु अब चाय तथा नारंगी की खेती बढाने के लिए कृष्य
जमीन का प्रतिशत भी धीरे-धीरे बढता जा रहा है।
सिक्किम हिमालय की
गोद में खेलते हुए निस्संदेह सुखद विशेषता वाला प्रदेश है। तभी भूटिया
लोग इसे डेनजांग कहते हैं जिसका अर्थ होता है
'सूखी
घर'
या
'नया
महल'
तथा लेप्चा भाषा में इसे
'नाइमाईल'
कहते हैं,
जिसका अर्थ होता है
स्वर्ग। इन नामों से यह पता लग जाता है कि सिक्किम और उसके आस-पास के
सारे लोग सिक्किम के सौंदर्य को तथा उसके गुणों को बहुत पहले से समझते
आये हैं और उनका सुख लेते आए हैं (लूटते नहीं!)।
लेप्चा लोगों की
लोक-कथाओं में उनका बाहर से सिक्किम आने का जिक्र कहीं नहीं मिलता,
इसलिए लगता है कि वे
यहां के सबसे पुराने निवासी हैं,
उनकी अपनी संस्कृति,
रहन-सहन और भाषा है।
भूटिया लोग तिब्बती इलाके से कोई
13वीं
सदी के आस-पास आये और उन्होंने जब इसे चावल का प्रदेश पाया तो उनकी खुशी
की सीमा न रही। नेपालियों का आगमन,
सिक्किम में
19वीं
सदी में शुरू होता है। यद्यपि नेपाली बहुतायत से हिन्दू होते हैं,
किंतु नेपाली हिंदू
और बौध्दों की संस्कृति में और भी अधिक समानता पाई जाती है। चूंकि हिन्दु
और बौध्द धर्म दोनों ही उदार प्रकृति के हैं इसलिए नेपाली हिन्दू और
बौध्द तथा भूटिया और लेप्चा बौध्द लोगों में आपस में शांति और प्रेम के
संबंध हैं। अब लेप्चा,
भूटिया तथा नेपाली लोगों
में वैवाहिक सम्बन्ध होने लगे हैं। लेप्चा लोगों की मांग पर,
सिक्किम सरकार ने,
लेप्चा लोगों के लिए
विशेष संरक्षित क्षेत्र निश्चित कर दिए हैं। हम लोग ऐसे ही एक क्षेत्र
जोंगु घूमने गए।
गंतोक से जोंगु की
यात्रा लगभग 2
घण्टे की है और यह गंतोक से उत्तर जाने वाले राजमार्ग से लगभग दस किमी
हटकर है। तीस्ता नदी के किनारे तथा पहाडों से घिरा यह बहुत ही रम्य स्थल
है। जब हम लोग जोंगु पहुंचे तब वहां एक मेला लगा हुआ था। इस मेले की अपनी
एक विशेषता थी। आम तौर पर मेले में जो दुकानें होती हैं वे तो थीं किन्तु
वे सब की सब एक फुटबाल मैदान के चारों तरफ सजाकर लगाई गई थीं और इस सारे
मेले का केन्द्र यह फुटबाल मैदान था और इस मैदान में भिन्न-भिन्न दलों के
फुटबाल मैच एक के बाद एक हो रहे थे। ऐसा अनूठा मेला और खेल का मेल मैंने
कहीं-नहीं देखा और मैंने गौर किया कि एक आम सिक्किमी आदमी या औरत का शरीर
अच्छा,
स्वस्थ और सशक्त होता है।
एक तो उन्हें पहाडों पर हमेशा चढना और उतरना पडता है और दूसरे उनमें से
जो लोग गाँव या शहर में आ गए हैं उन्हें फुटबाल का शौक बहुत ज्यादा है।
मेले में फुटबाल के इन खेलों में लडक़ियों के फुटबाल खेल ने बहुत प्रभावित
किया क्यों कि शेष भारत में फुटबाल लडक़ियों में इतना लोकप्रिय नहीं हो
पाया है,
जितना विकसित देशों में
किन्तु सिक्किम की लडक़ियां फुटबाल की लोकप्रियता के मामले में किसी भी
विदेशी से पीछे नहीं हैं।
जोंगु घूमते हुए
हमने देखा कि तीस्ता के किनारे-किनारे डोंडा (बडी ऌलायची) के बडे-बडे खेत
थे। हम नदी के किनारे घूमते हुए जा रहे थे। वहां से हमें कंचनजंगा का जो
दृश्य दिखाई दिया वह अद्वितीय था। वैसे तो सिक्किम में लगभग सभी स्थानों
से कंचनजंगा अपनी ऊंचाई के कारण दिख जाती है किन्तु उस स्थान की तीस्ता
की घाटी से कंचनजंगा देखना मानों
'विस्टाविजन'
का आनंद दे रहा था।
घाटी में सूरज की छाया आ चुकी थी और इसलिए तुलनात्मक रूप से वह अंधेरे
में थी किंतु कंचनजंगा खुली धूप में चांदी सी चमचमा रही थी। इस कारण घाटी
हमारे पास होते हुए भी,
हावी न होकर कंचनजंगा की
शोभा बढा रही थी।
हम गंतोक में
सिन्योलचू लॉज में ठहरे हुए थे। इस होटल से कोई आधा घण्टे की चढाई के
भीतर ही जो हनुमान टेक है,
वहां से कंचनजंगा का
दृश्य देखने के लिए सारे गंतोक से उत्साही घुमकड सुबह ही पहुंच जाते हैं।
हम लोग भी सूर्योदय से लगभग आधा घण्टा पहले पहुंच गए थे और सूर्य की आभा
से प्रतिक्षण बदलता वहां प्राकृतिक दृश्य देखने का आनंद तो अद्भुत ही है।
इससे पहले कि सूर्य अपनी किरणें कंचनजंगा पर डाले,
कंचनजंगा एक अरुण
आलोक में जैसे चंदन लगा कर स्नान करती दिखती है,
मानो वह अपने
प्रियतम से मिलने के लिए श्रृंगार कर रही हो। और यदि अपने प्रियतम से
मिलने के लिए वह श्रृंगार नहीं कर रही होती तब उसकी झलक मिलते ही,
पहली किरन पडते ही,
लज्जा से उसके कपोल
लाल लाल कैसे हो जाते। प्रियतम के चुम्बन के प्रयत्न मात्र से ! धुंधलके
से एकदम प्रकाश में आ जाने पर कंचनजंगा का व्यक्तित्व जैसे निखर उठा!
क्या अज्ञान से ज्ञान में प्रवेश,
अंधकार से प्रकाश
में प्रवेश,
भोलेपन से प्रेम में प्रवेश
में बहुत समानता नहीं है। और थोडी ही देर में जैसे कंचनजंगा की चोटी
स्वर्णमय हो जाती और इसके बाद जब सूर्य थोडा चढता है तब वह चांदी सी धवल
जगमगाती है। शायद इसी सूर्योदय के इन रंगीन दृश्यों का आनंद लेने के कारण
सिक्किमी लोग कंचनजंगा में तांबा,
सोना और चांदी के
खजानों का स्थान मानते हैं। यह सूर्योदय इतना निराला और अद्भुत था कि इस
सारे अनुभव ने मेरे हृदय में एक कविता की प्रेरणा दी। यह कविता सौंदर्य
बोध से उद्भूत कविता है। इस सौंदर्य का पान करने के पश्चात जब मैं लौटकर
आ गया था और कमरे में आराम से बैठ गया तब अचानक कविता की प्रेरणा के साथ
एक नया रूपक भी मेरे मानस में कौंधा था। कंचनजंगा के लिए होटल से निकलने
से लेकर सूर्योदय के आनन्द में डूबने तक के प्रत्येक कार्य में और कविता
रचने के प्रत्येक कार्य में एक सशक्त और जीवन्त संबन्ध एकाएक मेरे मन में
कौंध गया दो,
बिलकुल अलग विधियों से
सौंदर्य सृजन की विधियों में एक गहरी समानता दिखलाई दी। प्रस्तुत है
कविता :
कंचनजंगा और कविता
अंधेरे
मुंह
होटल के तारों को
छोड
चढता
हूँ
पहाडी पर
अदृश्य चोटी की
ओर
कंचनजंगा के
दर्शन करने
कल्पना ही पकड
सकती है
जिन नक्षत्रों की
दूरी
उन्हीं की सुरमई
रोशनी में
टटोलता हूं राह
मैं
कभी हल्के से
टिके
पत्थरों सा
फिसलता
कभी आडी तिरछी
पगडंडियों सा
भटकता
पहुंचता हूं चोटी
पर
चट्टानों की
गरिमा
और
पेडों
की हरीतिमा
मेरी धमनियों में
फैल जाती है
और बढ ज़ाती है
मेरी उत्कंठा
अवगुण्ठन में पर
छिपी बैठी है
कंचनजंगा
थोडी ही देर में
देखता हूं
हल्की अरुणाई आभा
में
उषा लगा रही है
कंचनजंगा को
चंदन का उबटन
हैरान हूं
कहां है सूरज !
कहां से आया यह
उबटन
अरे कंचनजंगा के
कपोल
अरुणिम अरुणिम
ज्यों गोपियों के
बीच
कृष्ण का हो आगमन
और
ढँक
लिए हों लाज ने
सबसे पहले राधा
के कपोल
और मुझे पूर्व
में
अभी नहीं दिख रहा
है सूर्य
क्या पहली किरन
छिपकर फेंक रहा
है सूर्य !
अब कंचनजंगा की
सखियों के भी गाल
हो रहें हैं लाल
लाल
मैं देख रहा हूं
सब तरफ लाल ही
लाल
अब कंचनजंगा
दमक रही है
तृप्त और दीप्त
स्वर्णिम
स्वर्णिम
प्रेम से प्रथम
मिलन पर
मुस्करा रहा है
सूर्य
मधुरिम मधुरिम
अब कंचनजंगा
चमक रही है
शुध्द रजत धवला
सी
हरियाली गाने लगी
है गीत,
भौंरे गुनगुना
रहे हैं
कंचनजंगा के
प्रेम पर
सीमा है आकाश
मैं खडा हूं चोटी
पर
निस्तब्ध
डूब गया हूं
आकाश से उतर आई
है
सौंदर्य सरिता
जैसे कोरे कागज
पर
यह कविता
लौटते समय रास्ते
में एन्चे गुम्पा भी देखा।
यह गुम्पा लगभग
200
साल पुराना है।
ऐसा माना जाता है
कि,
इसकी संस्थापना करने
वाले लामा दुपथाब कार्पो दक्षिण सिक्किम की मैनम पहाडी से उड क़र इस स्थान
पर आये थे।
हम जब एन्चे गुम्पा में
घूम रहे थे तो वातावरण बहुत ही शांत था,
हमारे मंदिरों
में ऐसी शांति नहीं मिलती।
गुम्पा के एक
कोने में धूप जलाते हैं।
यह इस तरह का धूप
आला,
लगभग सभी गुम्पाओं के
आस-पास देखा।
उस समय दो महिलाएं वहां
'धूप'
जला रही थीं।
वे साडी पहने
खुले बाल रखे आधुनिक साजसज्जा में थीं।
वह
'धूप'
मैंने देखा कि
वहां बहुतायत से पाये जाने वाले वृक्ष
'जूनिपर'
(जिसे हिंदी में
धूपी कहते हैं) की सूखी पत्तियां ही थीं।
ये पत्तियां आम
पत्तियों के आकार की न होकर कुछ इस तरह की होती हैं जिस तरह से कसीदाकारी
में पत्ती काढ क़र दिखाई जाती है।
हवा में एक
मनमोहक सुगंध फैली हुई थी।
वे स्त्रियां इस
धूप के साथ कत्थई रंग का पदार्थ भी रख रही थीं।
जब मैंने उनसे
दूसरे पदार्थ के बारे में पूछा,
जोकि गाढा कत्थई
रंग का था,
उन्होंने बताया कि छांग
(चावल से बनाई हुई स्थानीय मदिरा) बनाने के बाद जो अवशेष बचता है यह
पदार्थ वह ही है।
जब मैंने उनसे
पूछा कि,
क्या पूजा के समय
मद्यपान उचित है ?
एक ने मुस्कराकर
उत्तर दिया, '' |