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जय गंगे (वहां से चलकर जब तुम हिमालय की उस हिम से ढकी चोटी पर बैठकर थकावट मिटाओगे जहां से गंगा निकलती है और जिसकी शिलाएं कस्तूरी मृगों के सदा बैठने से महकती रहती है तब उस चोटी पर बैठे ही दिखाई दोगे जैसे महादेव के उजले सांड क़े सींगों पर मिट्टी के टीलों पर टक्कर मारने से पंक जम गया।) कहने को कोई कह सकता है एक बार आप गढवाल के एक पहाड पर घूमे और नदियों, झरनों, चीड, देवदारु, वन पीपल, भोजपत्र आदि वृक्षों और सुन्दर चिडियों को देख लिया फिर आप मध्य हिमालय के किसी और पहाड पर चले जाइये आपको कमोवेश यही मिलेगा, तब बार बार और अलग पहाडों पर क्यों जाएं? इसके कई जवाब हैं, और अच्छे जवाब हैं। किन्तु सबसे सरल और व्यावहारिक तो यह कि आज के घुटन तथा प्रदूषित नागरी वातावरण से पहाडी हरियाली की शीतल मन्द सुगन्ध हवा, कुर्सी पर धंसे रहने वाले शरीर को पहाडी चढाई और उतराई, हिमाली हरित कुलिगों से आँख मिचौली तथा प्रकृति के जितना सान्निध्य में रह सकें उतना ही उत्तम। आजकल तो बहुत से नगरवासियों को ॠतुओं का अहसास भी कितना कम हो गया है। यदि उनके नलों में पानी गर्मी भर मिलता रहे तो बारिश की उन्हें जरा भी प्रतीक्षा नहीं और आते ही सूखी और तप्त धरती के हरी चूनर ओढने का आनन्द भी नहीं। और, उसी त्रिकोण वाले हिंसा तथा चीन के भद्दे प्रदर्शन वाले सिनेमाओं से अल्पकालिक छुटकारा भी कितना अच्छा होता है। शायद आप में से बहुत इस अंतिम वाक्य से सहमत न हों। यद्यपि पहाडों में समानताएं हैं जैसे हर मानव में, परन्तु हर पहाड अलग है, उसकी हरी टोपी या हरित परिधान अलग है, उसके पक्षी अलग अलग है। आम तौर पर बोले जाने वाले दो शब्द 'सुन्दर चिडियां' जो उस दर्शक की प्रकृति में रुचि के अकाल का भंडाफोड ही करते हैं वे भी अलग है। बद्रीनाथ के पास की घाटियों और वहां से कुछ ही किलोमीटर दूर पुष्पघाटी में बहुत अन्तर है। बद्रीनाथ, केदारनाथ में, गंगोत्री, यमुनोत्री में बहुत अन्तर है। बात नजर की होती है, कैमरे तो सबके पास वही हैं। पर्यावरण के प्रति जागरुकता चाहिए, प्रकृति के प्रति प्रेम चाहिए, आदमियों से लगाव चाहिए, फिर देखिए कितना निश्छल आनंद मिलता है और उस आनन्द को लूटने के लिए शरीर में ताकत और मन में उत्साह भी। और फिर हिमालय। संसार में सबसे ऊंचे पहाड ही नहीं हैं, वे भारतीय संस्कृति और इतिहास से एक सुन्दर माला के सुगंधित फूलों की तरह गुंथे हुए भी हैं। पता नहीं गंगा में और हिमालय में क्या आकर्षण शक्ति है कि कितना भी दर्शन क्यों न कर लें 'थोडा सा और' की तीव्र अभिलाषा बनी ही रहती है, कुछ ऐसी ही जैसी शिशु की माँ के प्रति। तभी तो गंगा, सबकी माँ है (हिमालय नाना कहलायेंगे)। पिछले ही वर्ष बद्रीनाथ और पुष्पघाटी अलग अलग यात्राओं में घूम कर आया था। शिवालक पहाडियों (शिव की अलकों) में उलझी गंगा की धाराओं के मुक्त होने का आनन्द देख आया था। अहम् के मोह भंग में दुख नहीं आनन्द ही होना चाहिए। इसलिए शिवालकों में उलझने पर गंगा को अपने अहम् के प्रति मोह भंग का आनन्द ही मिला होगा, क्या इसमें सन्देह हो सकता है। जब पिछले वर्ष बद्रीनाथ में एक पंडे ने बतलाया था कि आदि शंकराचार्य बद्रीनाथ से केदारनाथ सीधे पश्चिम दिशा से होकर अर्थात नारायण पर्वत पार कर पहुंचे थे तब आश्चर्य तो हुआ था किन्तु हमारे साधु सन्त तो निर्विकार भाव से दुसाध्य कार्य यों ही कर लेते हैं, इसलिए मान लेने का मन हुआ। किन्तु जब उसने कहा कि कुछ वर्षों पूर्व तक पुजारी भी सुबह की आरती केदारनाथ में कर संध्या की आरती बद्रीनाथ में करते थे तब उस पर विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि यदि वे पुजारी निम्नतम दूरी वाले रास्ते से जाते तो उन्हें गंगोत्री हिमनद पार करना पडता और वह तो अतिकुशल पर्वतारोही, विशेष उपकरणों के साथ ही कर सकते हैं और वह भी लगभग 5-6 दिनों में। यदि वे अपेक्षाकृत सुगम मार्ग से जाते और दूरी भी कम रखने का प्रयास करते तब उन्हें लगभग 8000 फुट के पहाडों को चढते उतरते लगभग 70-80 किलोमीटर की दूरी तय करना पडती क्योंकि बद्रीनाथ और केदारनाथ के बीच 20-22 हजार फुट ऊंची चार चोटियां भी हैं जिन्हें चौखम्बा कहते हैं। इसे एक पहाडी चढाइयों पर अभ्यस्त जानकार तथा स्वास्थ्य पुरुष कम से कम तीन दिन में तय कर पाएगा। मैंने किसी पुराण में पढा है कि सुमेरु पर्वत से चार नदियां चार दिशाओं में निकलती है। जब यह सब देखने के लिए नक्शे का अध्ययन कर रहा था तो बात कुछ स्पष्ट हुई। बद्रीनाथ और केदारनाथ के बीच में, देवताओं को बसन्तोत्सब मनाने के लिए, ब्रह्मा ने मानों एक अति विशाल वितान खींच दिया हो। लगभग 7000 (22000 फुट) मीटर ऊंचे चार खम्बों पर रजत धवल चाँदनी तानकर ॠतुराज स्वयं उस भूमि को सजाएं तब जो बसंतोत्सव होगा वह दिव्य ही होगा। इन चार खम्बों ने इस स्थान को बद्रीनाथ चौखम्बा नाम दिया है। चौखम्बा के क्रोड से गंगोत्री निकलता है जो लगभग उत्तर पश्चिम दिशा में 25 कि मी यात्रा कर गोमुख में भागीरथी को जन्म देता है। चौखम्बा के उत्तर पूर्व में सतोपन्थ बांक और भागीरथी हिमनद हैं जो अलकनन्दा को जन्म देते हैं। चौखम्बा के 15 कि मी पश्चिम में सुमेरु पर्वत हैं जिसके क्रोड में से निकले हिमनद से मंदाकिनी का जन्म होता है जो केदारनाथ के चरण स्पर्श करती हुई अलकनन्दा से मिलने हेतु चल पडती है। यह संभवतया प्राकृतिक व्यंग्य है कि केदार गंगा अपने नाथ के पास न जाकर, गंगोत्री में भागीरथी से मिलती है। और शायद यह भी कि गंगोत्री हिमनद से भागीरथी और भगीरथ हिमनद से अलकनन्दा गंगा निकलती है। सुमेरु पर्वत के लगभग उत्तर पश्चिम में यमुनोत्री है। अब पता नहीं पुराणों में जो चार नदियों के चार दिशाओं में निकलने की बात है वह इसी सुमेरु से इन चार नदियों की बात है अथवा सिंधु, ब्रह्मपुत्रा, गंगा और सतलज से है। किन्तु यह दिव्य वितान भारत के लिए वरदान ही है कि जिसके क्रोड से चार महान, बारहमासी, जलपूरित नदियों का जन्म हुआ है। जब आप गंगा के क्षेत्र में घुमने जाते हैं तब आपको पता चलता है कि जिसे हम गंगा कहते हैं, जो हमारी संस्कृति का प्रतीक है, प्रारंभ में तो वह गंगा कहीं नहीं मिलती अनगिनत गंगाएं मिलती हैं वास्तव में वह अनगिनत गंगाओं से मिलकर बनी है वैसे ही जैसे हमारी संस्कृति आर्य, द्रविड, निषाद, किरात आदि संस्कृतियों के जैव मिलन से बनी है। बद्रीनाथ और गंगोत्री में यदि आप तीर्थ यात्रियों का अनुप्रस्थ काट (क्रास सेक्शन) लें तो आप देखेंगे कि उसमें आसामी, बंगाली, मणिपुरी, उडिया तो दूसरी तरफ तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड, तीसरी तरफ मराठी, गुजराती और चौथी तरफ पंजाबी, कश्मीरी आदि हिन्दी भाषियों के साथ एक से ही कार्य करते दिखेंगे, उनका एक ही ध्येय दिखेगा - गंगा। छ मुख्य गंगाएं गिनी जा सकती हैं जिनसे मिलकर गंगा बनी है : धीली गंगा, अलकनन्दा, मंदाकिनी, पिंदार गंगा, मंदाकिनी और भागीरथी। जोशीमठ से लगभग 10 कि मी प्रतिधारा की ओर या बद्रीनाथ की ओर, विष्णु प्रयाग में धौली गंगा अलकनन्दा में मिलती है। (वैसे कई लोग कहते हैं कि विष्णु प्रयाग तक अलकनंदा नहीं वरन विष्णु गंगा है और धौली गंगा तथा विष्णु गंगा विष्णु प्रयाग संगम में मिलकर अलकनन्दा को जन्म देती है।) धौली गंगा भारत-तिब्बत की सीमा पर स्थित 'नीति' दर्रे (पास) के पश्चिम से निकलती है और जब विष्णु प्रयाग में अलकनन्दा (विष्णु गंगा) से मिलती है तब लम्बाई में अधिक ज्येष्ठा होती हुई भी अलकनन्दा को (या उसके पिता भगीरथ हिमनद को) सम्मान देती हुई उसमें अपना पूर्ण समर्पण कर देती है। नन्दापर्वत से प्रसूत मन्दाकिनी नन्द प्रयाग में तथा पिंदार गंगा कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा से मिलती है। देव प्रयाग में भागीरथी और अलकनन्दा के मधुर मिलन से पावन से पावन गंगा बनती है। गंगा का नाम त्रिपथगा भी है, सम्भवतया इसलिए कि गंगा-आकाशपथ, पृथ्वी पथ तथा पाताल पथ-तीनों पथों में प्रवाहित हुई है या कहें कि देव लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक तीनों लोकों को गंगा ने पवित्र किया है। कुछ आधुनिक पुरानविद यह मानते हैं कि सुमेरु पर्वत के आसपास की भूमि ही देवलोक है। संभवतः पामीर पठार के हिस्से का जो आर्यों का मूल स्थान है, जिसमें सुमेरु भी सम्मिलित हो गया, आदरसूचक नाम देवलोक है। किन्तु विज्ञानिक रूप से देखें, गंगोत्री हिमनद और भागीरथी आदि हिमनद आकाश पथ से आए हुए हिमकशों से बनते हैं, इसलिए गंगा के प्रारंभिक पथ को आकाशपथ कह सकते हैं। आधुनिक भूगोलविदों का कहना है कि गंगा बहुत से स्थानों पर पृथ्वी तल के नीचे (अर्थात पाताल) भी बहती है। इसलिए विज्ञानिक दृष्टि से भी गंगा त्रिपथगा कहलाई। गंगा का वाहन मकर है। गंगा के घडियाल अपनी किस्म के विशिष्ट जल जीव हैं और अब उनका अस्तित्व ही खतरे में है। यह स्वाभाविक लगता है कि एक नदी का वाहन मकर हो। किन्तु इससे एक अर्थ यह भी निकलता है कि बिना मगर या घडियाल से गंगा भी नहीं चल सकती। बिना मछलियों के मगर नहीं रह सकते। प्रदूषित पानी में मछली नहीं रह सकती। इसलिए पानी में मगर नहीं रह सकता और तब गंगा भी नहीं चल सकती। गंगा मकरवाहिनी और इसी तरह यमुना कर्मवाहिनी। तब हमें यदि गंगा को जीवन्त रखना है तब उसे प्रदूषण से बचाना अत्यावश्यक है। उत्तराखण्ड में घूमने पर यह स्पष्ट दिखता है कि अधिकांश नदियों के नाम में गंगा जुडा है, यथा : बिरही गंगा, मार्कण्डेय गंगा, पागल गंगा, गोमती गंगा आदि आदि। हम देखते हैं कि शिवालकहिमालय की शृंखला में गंगा ही गंगा है। इसलिए शिव की अलकों में गंगा का नाम पारिवारिक नाम (सर) सा लगने का एक कारण यह भी सम्भव है कि उस नाम से अन्य छोटी (प्रतिष्ठा में) नदियों की प्रतिष्ठा बढ ज़ाती है जैसे गांधी नाम की प्रतिष्ठा महात्मा गांधी के नाम से। मध्य प्रदेश में भी कई नदियों के नाम में गंगा जुडा हुआ है जैसे कंग अथवा गंग है जो नदी में बहते पत्थर के समान गोलाई लेकर गंगा हो गई है। पहले गंगा शब्द का अर्थ ही नदी था-निषादों की भाषा में-जिसे आर्यों ने अपना लिया, अन्य शब्दों और परम्पराओं की तरह। भारतीय संस्कृति ने गंगा के प्रति आभार प्रकट किया उसे सम्मान दिया, पूज्य बना दिया। ऐसा अन्य देशों में नहीं होता। यह भारतीय संस्कृति की प्रकृति के महत्त्व को मान्यता देते हुए प्रकृति को-गंगा को - माँ का रूप देने की समझ का ही परिणाम है। प्रकृति के साथ एक प्रतयोगी का सा व्यवहार करने की तथा उस पर अपना अंकुश हमेशा लगाने की प्रवृत्ति भारतीय नहीं वरन प्रकृति के साथ तादाम्य स्थापित करने की, उसका यथोचित सम्मान करने की परम्परा भारतीय रही है। जब कोई संज्ञा शब्द, जैसे गंगा (नदी), एक विशेष सर्वनाम जैसे भगीरथ वाली गंगा का रूप ले ले तब ऐसा उस वस्तु या व्यक्ति के अत्यंत अप्रतिम गुणों के कारण ही हो सकता है। क्योंकि जिस गंगा शब्द का अर्थ ही नदी होगा तब मात्र नदी कहने से जिस विशिष्ट नदी मात्र का बोध होता होगा, वह नदी वास्तव में सभी के हृदय में स्थापित होगी। यही बात बाइबिल शब्द में है जिसका अभिधात्मक अर्थ मात्र पुस्तक होता था किन्तु अब एक विशिष्ट सम्मानित धर्म ग्रन्थ है। और जब गंगा के स्मरण से ही कश्मीर से कन्याकुमारी तक के सभी लोगों के मानस पवित्र हो जाते हैं तब जो सशक्त और जीवन्त संस्कृति की झलक 'गंगा' में मिलती है, इसे एक भारतीय ही समझ सकता है, एक सच्चा भारतीय, नकली पाश्चात्य सभ्यता से दबा हुआ भारतीय नहीं। गं ध्वनि हिंदचीन में 'खंग' (दोनों 'क' वर्ग की ध्वनियां) हो जाती है, जहां की प्रसिध्द नदी है मीखंग। डक्षिण चीन में यही ध्वनि 'कंग' या 'किआंग' बन जाती है, जैसे यांग टीसी किआंग। खासी भाषा में यह ध्वनि 'कंका' बन जाती है। और जयंतिया खासियों में बडी पुत्री का नाम कंका रखने की लोकप्रिय परंपरा रही है (और बेटों का नाम राम तथा लखन)। व्युत्पत्ति की दिशा में मेरा मन भटक गया था, वहां से वापिस आकर हम देखते हैं कि बद्रीनाथ, केदारनाथ, अलकनंदा, मंदाकिनी, गंगोत्री और भागीरथी गोमुख तथा चौखम्बा से प्राकृतिक तथा भावात्मक स्तरों पर गुंथे हुए हैं। इसलिए इस बार मैंने गोमुख पर्यटन की ठानी। तथा रास्ते में पहली रात (4 सितम्बर 88) उत्तरकाशी में और फिर हर्षिल में डेरा डालकर घूमना तय किया। पुष्पघाटी में पिछले वर्ष एक सैनिक घुमक्कड ब्रिग्रेडियर त्रिपाठी ने बतलाया था कि गंगनानी - कियार कोटी की पहाडियां और घाटियां गर्मियों में फूलों से चित्रित रहती है। इसलिए हर्षिल को केन्द्र बनाकर उसके आसपास की प्रकृति का आनन्द लेने के लिए लगभग 10,000 फुट की ऊंचाई पर गंगनानी में तम्बू या डेरा भी डाला। उत्तरकाशी भागीरथी के दोनों तटों पर बसा एक अनोखे व्यक्तित्व वाला पहाडी नगर है। जब मैं संध्या समय भागीरथी के बांए तट पर कुछ ऊंचाई से भागीरथी का गान सुन रहा था तब थोडी ही देर में घंटों के शुध्द निनादों ने भागीरथी के अलापों के बीच ऊंचे स्तरों में तान छेडना शुरु कर दिया था। लग रहा था कि जैसे उत्तरकाशी में मंदिर ही मंदिर है और भागीरथी के साथ सारे वायुमण्डल को उदात्तस्वरों में गुंजायमान कर रहे हैं। बांए तट पर उस विश्राम गृह का बहुत ही सौंदर्यबोध के साथ चयन किया गया है। सूर्यास्त और सूर्योदय के समय जो आनन्दमय दृश्य सारी दिशाओं को भासमान करता है तथा भागीरथी की सतत कलकल ध्वनि जो वातावरण में छाई रहती है, वह प्रकृति से एक होने में - मात्र बाह्यरूप से नहीं वरन आतंरिक तन्यमया की ओर भी, मानो स्वतः ले जाती है और उत्तरकाशी में अनन्यता स्वयं आपका स्वागत करने के लिए तत्पर रहती है। हर्षिल उत्तरकाशी से गंगोत्री के रास्ते पर ही गंगोत्री से 25 कि मी पहले भागीरथी के दांए तट पर एक छोटा सा गांव है। इसमें प्रवेश करने के लिए मुख्य सडक़ को छोडक़र भागीरथी को पार करना पडता है। इसलिए यहां अनजाने में आदमी नहीं आते, योजना बनाकर ही आते हैं। हर्षिल तक सारे रास्ते प्राकृतिक सौंदर्य की छटा पहाडी ख़ुशबू की तरह महमहाती हुई बिखरी मिलेगी।रास्ते में 'चिडियां' भी खूब मिलीं। एक बहुत बडी चिडिया, लम्बी पूंछ वाली नारंगी रंग की लिपस्टिक लगाए, सडक़ के किनारे, सभी को अपनी सुन्दरता दिखाने के लिए झाडों पर फुदक रही थी। यह तो नीली मैगपाई के समान दिखती है, मैंने सोचा। किन्तु नीली मैगपाई तो लाल रंग का लिपस्टिक लगाती है, तो ये नया फैशन कैसा? चिडियां तो फैशन करती नहीं, अर्थात यह नारंगी चोंच वाली नीली मैगपाई है जो सामान्यतया पाई जाने वाली लाल चोंच वाली की बहन है। हम लोगों को आशंका थी कि कहीं रास्ते में भूमि स्खलन न मिल जाए और सौभाग्यवश नहीं मिला, नहीं तो इस सडक़ का कोई विकल्प नहीं है और जब तक भूस्खलन साफ न कर दिया जाए आप सडक़ पर ही पडे रहते हैं। सुबह 7 बजे उत्तरकाशी से निकलने के बाद हम लोग कोई बारह बजे ही हर्षिल पहुंच गए थे। गंगोत्री के लिए तो अगले दिन जाना था। उस दिन घुमने के लिए पास ही का गांव मुखवा चुना। इस गांव के लिए भागीरथी के दाहिने तट पर पगडंडियों से चढते उतरते कोई 4-5 कि मी चले। इस गांव में एक महत्त्वपूर्ण मंदिर है - गंगा मैय्या का। ग्रीष्म ॠतु में हिमनद तो गोमुख तक ही आता है, किन्तु शीत ॠतु में लगभग गंगोत्री तक आ जाता है। इसलिए शीत ॠतु में गंगा मैय्या की मूर्ति गंगोत्री से इस गांव में लाई जाती है। पता नहीं कितने सैकडों वर्षो से यह परंपरा चली आ रही है। आखिर गंगा की पूजा तो प्रतिदिन होना चाहिए। यह गांव अपने सुन्दर निवासियों के लिए भी प्रसिध्द है। निवासी हैं तो सुन्दर पर हैं गरीब। इस गांव में मुख्यतया या तो पुजारी रहते हैं या किसान। मकान लकडी क़े बने हैं जिनमें गोशाला निचली मंजिल में रहती है, इसलिए मकान में सडते गोबर, गोमूत्र की दबादब खुशबू और लबालब भुनगे! गांव के बीच में एक मंदिर है, उसके सामने बडा चौगान है। इस चौगान में पंचायत बैठती है और दशहरे के समय रामलीला होती है। उस समय वह गाँव, किन्तु, सूना ही सूना था, क्योंकि सभी पुजारी सपरिवार गंगोत्री में रहते हैं। कठिनता से एक पुजारी जी मिले। वे कहने लगे कि, ''बच्चों को वे आगे पढाई के लिए उत्तरकाशी भेजना चाहते हैं (अभी तो बच्चे हर्षित पढने जाते हैं किन्तु वहां शालाएं मात्र दसवीं तक हैं) किन्तु गरीबी ही आडे अाती है।'' हम लोग समझते हैं कि पुजारी हम लोगों को लूटकर अच्छा पैसा बनाते हैं, किन्तु अधिकांश मंदिरों में वास्तविकता कुछ और है। गांव से लौटते समय संध्या हो चली थी। यद्यपि दोपहर में गांव जाते समय भी पक्षी मिले थे किन्तु संभवतया वे अपने कार्यों में चुपचाप दत्तचित्त हो लगे थे। अब वे झाडों पर उसी तरह चह चहा रहे थे जिस तरह छुट्टी के समय शाला के बच्चे! गांव के बिलकुल पास तो गौरैय्या अधिक मिलीं - ये नगरी गौरैय्या की तुलना में अधिक गौर वर्ण वाली तथा स्वस्थ्य, किन्तु सामान्य तथा तटीय मैना वैसी ही लडाकू और लाल दुम तथा श्वेत कपोल बुलबले वैसी ही घमंडिन। और जैसे जंगल में आए तब देखा कि हरित-नीले पतरिंगे(फ्लाइ कैचर) खेलते कूदते अपने शिकार-कीडों को 'बुफे' डिनर की तरह ले रहे थे और काले भुजंगे (ड्रांगो) कलावाजियां खाते हुए हवा में उडते कीडों को पुरस्कार की तरह ले रहे थे। और क्यों न लें पुरस्कार की तरह। यदि संसार के सब कीडे ख़ाना बन्द कर दें तो सब दुनियां कीडों से भर जाएगी क& |