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पुष्पघाटी : संजीवनी बूटी का प्रदेश
हस्ते लीला कमलमलके बालदुन्दानुविध्दं, कालिदास , मेघदूत (हे मेघ) वहां (कुबेर की राजधानी अलकापुरी) की कुलवधुए/ हाथों में कमल के आभूषण और चोटियों में ताजे कुन्द के फूल गूंथती हैं। गौर वर्ण करने के लिए मुख पर लोध्रपुष्प का पराग मलती हैं। जूडे में नए कुरबक के फूल खोंसती हैं, कानों पर सिरस के फूल रखती हैं और वर्षा में फूलने वाले कदम्ब के पुष्पों से अपनी मांग सजाया करती है। मैं तो चाहता था कि आपको सीधा दिल्ली से जोशी मठ ले जाकर फिर वहां से फूलों की घाटी की सैर कराऊं किन्तु शिवालिक (शिव की झलकें) पहाडियों को पार कर, ॠषिकेश पहुंचने पर पता चला कि नाग टिब्बा पर्वत शृंखला में देवप्रयाग के पहले एक भूमि स्खलन होने के कारण सडक़ बंद है। बजाय इसके कि हम ॠषिकेश में रूककर इंतजार करते कि जब सडक़ खुले तब आगे जायें, हम लोक कथाओं में छिपे चंबा और टेहरी होते हुए इस भूमि स्खलन को (बाइ-पास) बचाते हुए श्रीनगर पहुंचे। टेहरी की सुन्दरता कुछ पहारीफूलफ्युंली सी थी, तारों सी शर्मीली और अलसी के फूल सी उदास। टेहरी और उस सुंदर लडक़ी (जिसने अपने प्रेमी से विवाह न कर सकने के कारण आत्महत्या कर ली थी और उसकी मिट्टी से जो सुन्दर फूल निकले थे उनका नाम फ्यंली है) में अन्तर इतना है कि टेहरी को जबरदस्ती दफनाया जा रहा है क्योंकि टेहरी से, उसके प्राकृतिक सौंदर्य से कुछ अधिकारियों को, नेताओं को प्रेम नहीं है। कश्मीरी में एक कहावत है, ''अन्न पोषि तेलि येलि वन पोषि'' जो संस्कृति कहावत का कश्मीरी रूप है तथा इसका अर्थ है अन्न तब पोषण करता है जब वन का पोषण होता है, अर्थात बिना वन के अन्न नहीं होगा, इतना गहरा अर्थ हमारे ॠषियों को मालूम था यह बडे अचरज की बात हो सकती है किन्तु इससे भी बडे अचरज की बात है कि इसका अर्थ हमें नहीं मालूम तभी तो उत्तर प्रदेश में पिछले चार दशकों में 43000 हेक्टेअर भूमि से वनों को नष्ट किया जा चुका है। वन के साथ पर्यावरण और उसके साथ जीवन का विनाश होता है, विकास नहीं।
श्रीनगर आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित नगर है तथा यहां कमलेश्वर का
प्रसिध्द मंदिर है जिसमें श्री राम ने शंकर जी की पूजा की थी,
इसलिए इसका धार्मिक महत्त्व स्वाभाविक है।
श्रीनगर से हम आगे जोशी मठ के लिए भोजन के उपरांत चल पडे।
यद्यपि पीपल कोटि पहुंचते-पहुंचते ही रात हो गई थी तथापि हम लोगों ने तय
किया कि हम लोग लगभग
30
कि
मी पहाडी चढाई चढते हुए जोशी मठ ही जाकर विश्राम करेंगे।
किन्तु पीपल कोटि में देखा कि वहां बहुत सी बसें और कारें रूकी पडी थीं,
पता
लगा कि आगे फिर एक भूमि स्खलन है और उसको बचाकर जाने का कोई रास्ता नहीं
है।
इसलिए रात पीपल कोटि में रुकना पडा।
बातचीत के दौरान सुरेश शर्मा ने अपनी दो छोटी कविताएं सुनाई
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पता लगाने पर मालूम हुआ कि सडक़ में जो अवरोध है उसके जल्दी खुलने के कोई आशा नहीं है। इसलिए तय किया कि अवरोध तक तो गाडी से जायें और उसके बाद पैदल ही पार कर आगे चलें। वहां से हैलंग कोई 10 किलोमीटर ही बचेगा और हैलंग से जोशी मठ करीब 10 किलोमीटर। हम लोग जब अवरोध तक पहुंचे तो देखा कि बडे ज़ोरों से काम चल रहा था। पहाड का एक बहुत बडा टुकडा आकर सडक़ पर जम गया था। मानो कि वह यह कह रहा था, ''आप लोग हमारे स्वाभाविक जीवन में क्यों बाधा डालते हैं?'' और शांति पूर्ण 'रास्ता रोको' अभियान कर रहा था। किन्तु मनुष्य डीवट वाला जीव है और जब वह कुछ ठान लेता है, गलत या सही, तब उसे करके ही छोडता है। अब उसने प्रकृति के कार्य में जब जोरों से दखल देना, बिना परिणाम को ठीक से जाने, बडे बडे पहाडों को काटना, वनों को काटना शुरू कर ही दिया है, तब यह 15 टन का पत्थर तो कुछ घंटों में ही चूर कर दिया गया। किन्तु वाहन हमको हैलंग के पास ही ले जा सका क्योंकि वहां फिर अवरोध था और उस पर कोई काम नहीं हो रहा था। हम लोगों ने पैदल ही इस अवरोध को पार किया। और उस पार कोई वाहन न मिलने को कारण पैदल चलना ही शुरू किया यद्यपि हम सभी के पास दस-बीस किलो का सामान भी था। हम लोग अलकनंदा के बाएं तट पर पहाड क़ो काट कर बनाए रास्ते पर कोई पांच हजार फुट की ऊंचाई पर चल रहे थे। वृक्षों के हरियालेपन के बीच अलकनंदा गाते हुए चल रही थी। और हम लोगों को उस वातावरण में, अब बहुत सारे पक्षियों के गान भी सुनाई दे रहे थे लगा कि वे अलकनंदा के साथ एक समवेत गान प्रस्तुत कर रहे थे। बायीं ओर मेरी नजर अचानक गई और देखा कि एक सुन्दर चिडिया उड रही थी। उसकी निराली सुन्दरता का वर्णन कठिन तो अवश्य है। चिडिया का शरीर काले रंग का था किन्तु उसके पंख गाढे तांबे के रंग के थे और जब वह उड रही थी वे पंख उस काले शरीर पर गाढे तांबे के रंग की आभा का मंडल बना रहे थे। इस ताम्र आभा वाली चिडिया का नाम कलगीदार मारीट (बंटिंग) है। थोडी दूर जाने पर एक और सुन्दर चिडिया दिखाई दी। यह चिडिया गौरैया के बराबर की थी और उसके पंखों का रंग भी लगभग गौरैया सरीखा ही था, किन्तु उसके शरीर का रंग सुन्दर गुलाबी था। इस सुन्दर चिडिया को मैंने पहचान तो लिया कि यह गुलाबी कुलिंग (फिंच) है किन्तु उस थोडी सी झलक में यह नहीं देख पाया कि इस गुलाबी कुलिंग (फिंच) ने अपनी भौंहों को सफेद रंग में रंगा था या इसने अपनी बाहों में सफेद छींटदार दुपट्टा ओढा था। क्या बात है कि इस तरह सुन्दर पक्षी हमारी थकान को भी उडा देते हैं। यह सडक़ तो पहाडी सडक़ो की तरह ही तेज घुमावदार वाली; तेज चढाव वाली सडक़ थी किन्तु हम लोग अपने उत्साह में कहीं कहीं सडक़ को छोड, सीधा ही ऊपर चढ क़र, फिर से वापस आकर घूमती सडक़ को पकड लेते थे। इसी तरह हम लोग एक गांव के बीच से गुजरे। दूसरी तरफ पहुंचने पर हमें तो बडी ख़ुशी हुई और हम लोग जोशी मठ के लिए चल पडे। ज़ोशी मठ तक कार में जाते समय पहाडों से घिरी अलकनंदा के सौंदर्य का आनंद उठाया। कुटिटम (मैपल), चीड, वन-पीपल, बांज, अदरली आदि वृक्षों का आनंद भी उठाया किन्तु पक्षियों के गाने और सौंदर्य का आनंद उतना नहीं उठा पाये जितना पैदल चलने में मिल रहा था। और हमने गौर किया कि यद्यपि उस बिरली हवा में हम पहाड क़ी चढाई चढते हुए लगभग 10 किलोमीटर चले होंगे किन्तु उसकी थकान से हम लोग दबे नहीं। जोशी मठ से पुष्प घाटी तो दूसरे दिन ही जाना था। उस दिन विश्राम गृह में शाम को जब बाहर खुली हवा में बैठे तो हरी-भरी पहाडियों से घिरे मंच पर मध्दम सुर में अलकनन्दा के मधुर गान के साथ प्रगाढ नीले आकाश में बादलों के नर्तन को देखते हुए मन आत्म विभोर हो गया। सूरज पश्चिम की पहाडी क़ी चोटी पर जैसे बैठा हुआ बादलों में से झांक रहा था। मैंने सुना, एक सुन्दर गढवाली स्त्री अपने पति से कह रही थी ''मैं कितनी भाग्यवान हूं कि तुम मुझे इतना प्यार करते हो। तुम सुबह होते ही सूरज की पहली किरण के साथ पहाड पर चले जाते हो और वहां दिन भर काम करते हो। तुम्हें देखती हूं कि तुम पहाड क़े मस्तक पर एक रजत किरीट पहना देते हो और तब पहाड क़ितना भव्य लगता है। इस मुकुट को पहनाने के बाद तुम मुझसे मिलने के लिए आर्द्र होकर चल देते हो और मैं देखती हूं कि अक्सर तुम मेरे घर के ऊपर आकर बरस जाते हो और मेरी प्यास बुझा देते हो।'' अचानक एक मधुर तान से मेरी तंद्रा भंग हुई और मैंने देखा कि एक पेड पर बहुत सुंदर पक्षी बैठा हुआ है। यह बादामी रंग की चिडिया मादा स्वर्गिक चिडिया थी। जिसका शरीर बादामी रंग का होता है, सिर कजरारे मेघों सा काला और गले में बादलों का श्याम रंग होता है। मैं अब इस इंतजार में था कि इस मादा पक्षी के लिए नर-स्वर्गिक पक्षी भी आयेगा जो कि इससे कहीं अधिक सुंदर होता है। किन्तु वह नहीं आया। अगले दिन की सुबह हमारी आशंका के विपरीत एकदम साफ थी और आसमान का नीला रंग बहुत ही सुहावना था। जोशी मठ से निकलते ही अलकनन्दा को पार कर हम उसके दाहिने तट पर चलने लगते हैं और लगभग 8-10 किलोमीटर आने के बाद हमें विष्णु प्रयाग मिलता है। विष्णु प्रयाग विष्णु गंगा और धौली गंगा का संगम है। उनके बाद ही इस नदी को अलकनन्दा नाम मिलता है। किन्तु अधिकतर लोग विष्णु गंगा को अलकनन्दा ही कहते हैं उसी तरह कि जिस तरह अलकनन्दा अथवा भागीरथी को गंगा। विष्णु गंगा की घाटी में आते ही हिमालय की विशालता के दर्शन होते हैं। यहां की चट्टानें विशाल पत्थरों की बनी हुई ठोस और कठोर, कर्णप्रयाग, देव प्रयाग या नन्द प्रयाग जैसी नहीं जो कि रेत और गोल पत्थरों से मिलकर बनी हैं। यहां हमें पृथ्वी की अनन्त शक्ति का आभास होता है कि वह कैसे अपनी शक्ति से इतने विशाल अनन्त भार वाली चट्टानों को जैसे खिलवाड में उलट-पलट देती है। लगभग 40 मिनट में हम गोबिंद घाट पहुंच गये। और वहां से पैदल हमने अलकनन्दा को पार किया और लक्ष्मण गंगा के दाहिने तरफ पहुंच गये। गोबिंद घाट से चलते ही लक्ष्मण गंगा की घाटी का सौंदर्य चिदाकाश में छाने लगता है। वृक्षों में सबसे पहले तो दरली ज्यादा मिलता है और जैसे-जैसे ऊपर चढते हैं वैसे-वैसे वन पीपल की अधिकता बढती जाती है। बीच-बीच में बुरांश के फूल बहार के मौसम में मिलते हैं और यदि उनकी शोभा देखनी हो तो अप्रैल या मई के महीने में आना चाहिए। बुरांश वृक्ष तो गढवाल के जनमानस में लगभग उसी तरह समाए हैं जैसे कमल भारतीय संस्कृति में। इनका विश्वास है कि फूलों में देवता निवास करते हैं। ''बाल बुरांश शिव सिर शाबी'' एक प्रचलित लोकगीत की टेक है। कोमल बुरांश शिव के सिर की शोभा है। कुछ बहुप्रचलित लोकगीत की पंक्तियां - ''धार मा फूले बुरांश को फूल, मैन जाणे मेरी सरू छ - 'पर्वत शिखर पर बुरांश का फूल खिला है, मुझे लगा वह मेरी प्रिया है 'त्वै देखी नामा बुरांश लांदी रास' - प्रिये, तुझे देखकर तो बुरांश का फूल भी तुझसेर् ईष्या करता है। 'मेरी मैत्यों का डांडा बुरांश फूल्या, हिलासी जाण दे मैन।'' मेरे मायके की पहाडी पर बुरांश फूला है, मुझे मायके जाने दो। चढते हुए हम लोगों के पास प्रकृति की सुन्दरता का रस लेने का पूरा समय था। पगडंडी के किनारे बहुत सारे पौधे लगे थे किन्तु उनमें एक आकर्षक पौधा था कोई पंद्रह से मी ऊंचा जिसकी दो डालें घूमकर एक वृत्त बना रही थीं और पत्तियां उन डालों से किरणों की तरह बाहर निकल रही थीं। इसमें हरे रंग के साथ-साथ काले रंग के भी धब्बे यहां वहां लगे थे जैसे कि चीते के बादामी बदन पर। पूछने पर पता लगा कि यह पत्ते जहरीले होते हैं। और संभवतः इसीलिए प्रकृति ने चेतावनी के लिए यह काले रंग के धब्बे इसमें लगा दिये हैं। ऊपर नीला आसमान लहरा रहा था। धूप तेज सी लग रही थी किन्तु इतनी नहीं कि बर्दाश्त के बाहर हो। थकान के कारण थोडी-थोडी देर में रुकने की इच्छा होती थी और प्रकृति इसमें पूरी सहायता दे रही थी। कहीं फूल के बहाने, कहीं किसी वृक्ष के बहाने, कहीं किसी पक्षी के बहाने हम लोग बीच-बीच में रुककर चल रहे थे। आसमान में विशालकाय भस्मवर्णी (साइनेरियस) नामक गिध्द उड रहे थे। इनकी गर्दन का रंग भस्म सा नीला होता है और ये लगभग एक मीटर लंबे होते हैं और बीच-बीच में गिध्दराज भी उडते हुए दिखे। गिध्दों का दिखना कोई अपशकुन नहीं मानना चाहिए क्योंकि उनका होना जगल की सफाई का काम बडी मुस्तैदी से होने का द्योतक है।
मुझे
मित्र सुरेश शर्मा की छोटी सी कविता याद आ गयी
: इतने में किसी की आवाज आई, ''अरे बाप रे बिच्छू ने काट लिया''। मालूम करने पर पता लगा कि एक पौधे की पत्ती का उसकी पिंडली से स्पर्श मात्र हुआ था। और वह पौधे की पत्ती इतनी जोर से लगती है कि जैसे बिच्छू ने काटा हो। इस पौधे का नाम भी बिच्छू पौधा है। थोडी ही देर में एक आदमी ने एक दूसरे पौधे से पत्ती तोडक़र उस आदमी को दिया और कहा कि वह उसे उसी जगह पर मल ले कि जहां बिच्छु ने काटा है। और उस पत्ती के मलने से उसे काफी आराम हुआ। कहीं-कहीं बीच में छोटे गांव दिख जाते थे। उनमें ज्यादातर चौलाई या रामदाना की खेती होती है। यह लगभग डेढ मीटर ऊंचा पौधा होता है और इसकी साग खाई जाती है। इसका फल जो निकलता है वह बहुत ही छोटे-छोटे दाने का हल्के सफेद रंग का होता है, जिसके पकवान बनाकर खाये जाते हैं। और यहां के लोग ठंड के दिनों में इसकी रोटी बनाकर खाते हैं क्योंकि यह रोटी उन्हें अच्छी गरमाई देती है। मैदान से व्यापारी लोग एक बोरा धान देकर, बदले मे एक बोरा रामदाना ले जाते हैं। आलू खूब होते हैं। अनाजों में मुंडई नामक अनाज अधिक होता है जिसकी रोटी बनाकर खाई जाती है। यहां कनक भी होती है, गेहूं को यहां मध्यप्रदेश की तरह कनक कहते हैं। सब्जियों में यहां बैंगन, टमाटर, भिंडी, मिर्ची आदि होती हैं। राजमां भी कई जगह पैदा किया जाता है। लेकिन जो पौधे सबसे ज्यादा देखने में आये वह थे भांग के। सारे रास्ते में आधे से अधिक जमीन पर भांग के पौधे लगे हुए थे। बीच-बीच में कहीं धतूरे के पौधे भी दिख जाते हैं। रास्ते में एक विशेष पौधा लगभग तीस से मी ऊंचा जिसका कि फल बहुत ही सुन्दर लाल रंग का होता है दिखा। कहते हैं कि यह फल भालू को बहुत ही प्रिय है अतः इसे भाल पौधा कहते हैं। गांव से थोडी दूर चढने पर एक सुन्दर पीले रंग के, कुछ अलसी के फूल समान उदास फूल दिखे। इनका नाम फ्यूली है और गढवाल की लोक संस्कृति में इनका विशेष स्थान है। एक लोक गीत की दो पंक्तियां देखिए, 'कूडा की रेणो डांडू की फ्यूंली छई धार मा सी गंणी। प्रिये तू पर्वत शिखर पर झिलमिल करते तारे जैसी फ्यूंली सी सुंदर है। किन्तु फ्यूंली के साथ बिना बुझी प्यास की, अधखिली आकांक्षाओं की भावना जुडी रहती है, पुराने जन्म की अधुरी लालसा के करुण अवसान का भावपूर्ण प्रतीक है फ्यूंली। कथा ऐसी है कि जब एक सुन्दर लडक़ी अपने प्रेमी से विवाह न कर सकी तो उसने आत्महत्या कर ली और उसकी मिट्टी से 'फ्यूंली' के उदास फूल निकले। देखिए एक लोक गीत की कुछ पंक्तियां, 'फ्यूंली सी कली, कैकी बौराण छ ? घास काटद वणी द गितांग/ स्वामी गेन माल चिट्टी आई नी च/ कनु निरदै होलू जू विसरदू ई तैं।'' यह फ्यूंली सी कली किसकी बहु है जो घास काटते काटते गीत गा रही है - ''स्वामी परदेश गए हैं और उनकी चिठ्ठी भी नहीं आई है।'' वह कौन निर्दयी है जो इस फूल की कली को भूल गया है।'' वृक्षों के प्रति प्रेम और पुण्य की भावना देखिए - 'परायो डालो और अपणो बालों' - दूसरे वृक्ष और अपना बेटा - एक समान। 'नई डाली पैरुयो जामी देवतों की डाली' - पद्म का नन्हा वृक्ष उगा है, देवताओं का वृक्ष है'। 'ओंदी रया ॠतु मास/फूलदा रया फूल' वसंत ॠतु आती रहे और फूल खिलते रहे। कितनी कोमल और सौंदर्यपूर्ण इच्छा है। ऐसी सौंदर्यमय भावनाओं से ओतप्रोत 'फुलदेई' (वसन्त) उत्सव में लडक़ियां इन्हीं भावनाओं को व्यक्त करती हुई गीत गाती हैं, घर घर जाकर। फूलों की ही भांति गढवाली लोकगीतों में पक्षियों के प्रति प्रेम झलकता है। गढवाली में पक्षियों को 'पोथली' कहते हैं जिसका अर्थ होता है पुत्रल-पुत्र की तरह प्यारा। फ्यूंली की तरह घूघूती (कबूतर के परिवार का एक पक्षी जिसकी बोली से 'माँ सोई है' सरीखी करुण ध्वनि निकलती है) भी नारी के उत्पीडन का प्रतीक है। एक बालिका को उसकी विमाता ने मार डाला, उस बालिका ने दूसरे जन्म में घूघूती का रूप लिया और तब से 'माँ सोई है' कहती हुई अपनी माँ के अभाव का दुख व्यक्त करती रहती है। इस तरह लोकगीत गढवाल के जीवन मूल्यों, सुख दुख भरे यथार्थ जीवन को मार्मिक भावपूर्ण अभिव्यक्ति देते हैं। गढवाल आदि क्षेत्रो& |