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raivaBaU-tp`qamamaukulaa: kndlaIScaanaukcCma\\।जग्ध्वाऽरेण्येष्वधिकसुरभिं गन्धमाध्राय चोर्व्याः।।सारंगास्ते जललवमुचः सूर्यायष्यन्तिमार्गम्।।कालिदास -मेघदूतवर्षा प्रारम्भ होते ही अधपके हरे पीले कदम्ब के फूलों पर भौंरे मँडराने लगते हैं, कछारों में नई फूटी हुई कदली की कोपलों को चरते हुए हरिण और जंगल की धरती की तीखी सुगन्ध को सूंघते हुए हाथी, मेघ को उसके मार्ग की जानकारी देते हैं।लगभग सौ वर्ष पूर्व, मेघालय को एशिया का वानस्पतिक समृध्दतम क्षेत्र माना जाता था। और अब, संभवतया, बहुत सी विलक्षण जातियों की वनस्पति लुप्त हो जाने के बाद और बहुत सी विलक्षण जातियों के अस्तित्व को खतरे में लाने के बाद, वह क्षेत्र उस ऊंची स्थिति से गिरकर 'संकट ग्रस्त' क्षेत्र में आ गया है। लौह खनिज तथा कोयला खादानों का दोहन और झूम की खेती (जंगल जलाकर प्रतिवर्ष नए स्थान पर खेती करना) सौ वर्ष पहले भी होती थी और आज तक हो रही है। अंतर यह है कि पहले जंगल के एक टुकडे पर खेती करने के बाद, दुबारा उस पर खेती करने की बारी लगभग 25-30 वर्ष बाद आती थी तो अब 3-4 वर्ष, बाद आ जाती है। उन 25-30 वर्षों में वे जंगल के टुकडे पूर्व रूप से पुनर्जीवित और जीवन्त हो जाते थे और पूरे जंगल का थोडा हिस्सा ही खेती में लगता था। अब जंगल का अधिकांश खेती में लगा है और जंगल तो बचा सा ही नहीं है। मेघालय के ऊपर उडते समय कितनी बार देखा है कि सारी पहाडियों के जंगलों को जैसे काटकर नंगा कर दिया हो। जंगलों के नाम पर अधिकतर केले और बाँस के जंगल नजर आते हैं और चावल, मक्का तथा आलू मुली के खेत। इस बन की क्षति का सबसे बडा कारण तो आबादी का बढना है। झूम शैली की खेती में, यदि 25 वर्षोपरान्त ही दूबारा उस टुकडे पर खेती करना हो तो मेरी गणना से, बमुश्किल एक प्रतिवर्ग किमी क्षेत्र में एक छोटा परिवार ही गुजरबसर कर सकता है। अर्थात झूम शैली के लिए आबादी का बिरल होना नितान्त आवश्यक है। जबकि लगभग 22,000 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले मेघालय की आबादी लगभग 13 लाख (1981) है। इस वृहत आबादी और झूमशैली की खेती का सहअस्तित्व असंभव है। और यदि मेघालय को बचाना है तो न केवल सरकार को वरन सभी नागरिकों को, विशेषकर बुध्दिजीवियों को युध्दस्तर पर कार्य करना पडेग़ा पूरी निष्ठा और समर्पण से। यदि हम झूम खेती नहीं रोक पाए (प्रति परिवार प्रतिवर्ग किमी की दर तक) तब जैसा कि चेरापूंजी में प्रतिवर्ष शीतकाल में पानी का अकाल पडता है, वैसा सारे मेघालय में पडेग़ा। मुझे अपनी एक कविता, इस प्रसंग में याद आ रही है _ अनंत का अंत
हिन्दुस्तान में
सौ वर्ष पूर्व मेघालय में बिरली आबादी के साथ एक और महत्त्वपूर्ण परंपरा थी जिसके फलस्वरूप झूमशैली के बावजूद मेघालय वनस्पति समृध्दि में एशिया में अग्रणी था। जब झूम शैली हो तब कुछ जंगलों को अछूता छोडना अत्यावश्यक हो जाता है क्योंकि जंगलों के भी पुरातन संस्कार होते हैं, ऐतिहासिक परम्पराएं होती हैं और तभी वे समृध्द तथा जीवन्त रहते हैं। मेघालय में 'पावन वनों' की लगभग 5000 वर्ष पुरानी परम्परा है। वैसे तो सारे भारत में मंदिरों तथा तीर्थ स्थानों के आसपास, यदि जंगल नहीं तो, बट वृक्ष तथा पीपल आदि के वृक्षों को पूजित मानने की परम्परा है। महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में भी पावन वन हैं। किंतु मेघालय में यह परम्परा अधिक जीवन्त रही है। उन्होंने पावन वनों को पाँच श्रेणियों में बाँटा था। सबसे ऊंची श्रेणी को वे कहते हैं 'की लाव लिंग्डो'। लाव या ख्लाव का अर्थ होता है जंगल तथा लिंग्डो का अर्थ होता है पुजारी। अर्थात ये वन एक पुजारी के पूर्ण रूप से अधीन रहते हैं। ऌन वनों की किसी भी उपज लकडी अथवा फल, का उपयोग निषेध है, ये वन पूर्णतया वनदेवता को समर्पित माने जाते हैं। शिलांग के पास ही एक पावन वन इस श्रेणी का है - माव फ्लांग। इसका क्षेत्रफल मात्र लगभग तीन वर्ग किमी है। इसमें घूमने के लिए न केवल वन विभाग की अनुमति लेना पडी वरन मावफ्लांग ग्राम परिषद की भी। अब पुजारियों की शक्ति परिषदों ने ले ली है। उस दिन आकाश स्वच्छ था और सूर्य की प्रखर किरणें, उस शीतकालीन दिन, अपनी उष्णता से हमें सहला रही थीं। मावफ्लांग समुद्रतल से लगभग 4500 फुट की ऊंचाई पर है। जंगल के बाहर कोई मेला सा लगा था और फुटबाल मैच हो रहे थे। जमीन सूखी थी। ज्योंही हम लोग जंगल के पास पहुंचे तब दलदलों के चक्कर लगाकर उनसे कतराना पडा। जंगल में प्रवेश करते ही एकदम अंधेरा, उमस और शतिलता बढ ग़ई। अधिकांश वृक्षों को वन देवता ने विभिन्न आर्किड पुष्पों से सजाया था। जंगल के अन्दर कोई पगडण्डी भी न थी। हम लोग बस आर्किडों द्वारा प्रेरित होकर याहच्छिक रूप से घूम रहे थे। कई स्थानों पर झाड ग़िरे पडे थे, उन पर काई, कुछ किस्म की 'फर्न' (पुष्पहीन पौधे), कुछ परजीवी और कुछ पराश्रयी पौधे पनप रहे थे। सम्हलकर चलना पड रहा था उस मध्दिम प्रकाश में। यदि गलती से किसी लता को उसके प्रेमी वृक्ष के प्रेमपाश से छिटक दिया तब वह शरीर को खंरोच देती। शिलांग में पाए जाने वाले (मात्र 15-20 किमी दूर) अधिकांश वृक्ष - खासी चाड - यहाँनजर नहीं आ रहे थे। यहाँउष्ण कटिबंधीय चौडे पत्ते वाले, विशाल वृक्षों की अधिकता थी। जगह जगह लगी काई और फँफूंद वन के निर्वाध स्वतंत्र होने का - पावन होने का जैसे 'पोस्टरों' द्वारा प्रचार कर रही थी। उनसे अधिक उद्धोषणा कर रहे थे असंख्य कीट - जैसे कि बच्चे शाला में छुट्टी के समय अपने आनंदमय जीवन की अथवा अरूणोदय के समय पक्षी अपने कलरव से करते रहते हैं। हाँ पक्षी वहाँबिरले ही नजर आ रहे थे। मेघालय में पक्षियों के दर्शन थोडा कठिनाई से ही होते हैं। सम्भवतया दोपहर के तीन चार बजे पक्षियों की अपने कार्य से छुट्टी न हुई हो, वरना इस सुरक्षित जंगल में तो पक्षियों का होना आवश्यक था। जंगलों में आबादी का घनत्व जब एक छोटा परिवार प्रति वर्ग किमी हो तब यदि किशोर लडक़े पक्षियों का शिकार करें तब पक्षियों की आबादी उस नुकसान को सहन कर सकेगी। किन्तु जब आबादी 60 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी हो तब तो पक्षियों का अस्तित्व बहुत कठिन है। पक्षियों का शिकार पूर्वांचल की लगभग सभी पहाडियों पर प्रचलित है जो आज के घनी आबादी के जमाने में पर्यावरण को बहुत नुकसान पँहुचाता है। मावफ्लांग की गंध जैसे आदिम गंघ हो, मेरी नाक में आज भी ताजी है। वह गंध, पेड, फ़ूल, पत्तों, सडाँद, काई, फँफूंद, कीडों आदि सबसे मिलकर बनी आदिम वन की गंध थी। बतलाया गया था कि यद्यपि मावफ्लांग में साँप विशेषकर वृक्ष-सर्प बहुत हैं, किन्तु शीतकाल में वे सब धरतीमाता की गोद में सोते हैं, इसलिए डरने की आवश्यकता नहीं है। माव फ्लाँग का क्षेत्र वैसे तो चट्टानी है किन्तु सब तरफ खूब हरियाली है। मावफ्लांग का खासी भाषा में अर्थ होता है 'पत्थर घास'। सोचा था कि नाम 'माव लाव' अर्थात पत्थर-जंगल होना चाहिए था। किन्तु घूमने के बाद लगा कि मावफ्लांग भी सटीक है क्योंकि वह जगह जहां पत्थर पर भी घास हो जाए मावफ्लांग कहलाएगी। पावन वनों की दूसरी श्रेणी है 'की लाव किंटांग' जिसका अर्थ है पावन वन। इन वनों में धार्मिक कृत्यों तथा धार्मिक बलिदानों की अनुमति रहती है। 'मावस्माई' पावन वन दूसरी श्रेणी के वन का एक उदाहरण है जो कि चेरापूंजी के लगभग पाँच किमी उत्तर की ओर एक गाँव है और इसका क्षेत्रफल लगभग दस वर्ग किमी है। पावन वनों की तीसरी श्रेणी है 'की लाव नियम'। खासी भाषा में नियम का अर्थ धार्मिक नियम है। अर्थात धार्मिक कार्यों के लिए इन वनों की उपज का उपयोग हो सकता है। चौथी श्रेणी है 'की लाव एडांग' जिसका अर्थ है 'वन कानून', अर्थात कानून के अनुसार, वन को क्षति पँहुचाए बिना, उसका उपयोग कर सकते हैं, पाँचवी श्रेणी है 'की लाव श्नांग' जिसका अर्थ है वनस्थली। इन वनों को बिना नुकसान पँहुचाए, वन की उपज का उपभोग गाँव के नियमों के अनुसार किया जा सकता है। इस तरह हम देखते हैं कि एक तरफ सामाजिक आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया है और दूसरी तरफ पर्यावरण की सुरक्षा का। इस सब नियमों को धार्मिक सांस्कृतिक रूप देने से उनके पालन में एक स्वाभाविकता आ जाती है, अनुशासन अपने आप आ जाता है, शासन अथवा पुजारी का दबाव मात्र कुछ उच्छृंखल लोगों के लिए ही आवश्यक होता है। समाज और प्रकृति का सहअस्तित्व स्वाभाविक हो जाता है। और जब तक यूरोपीय धर्म प्रचारक मेघालय नहीं पहुंचे थे खासी अपने सांस्कृतिक नियमों और परंपराओं के आधार पर प्रकृति के साथ एकरस जीवन व्यतीत कर रहे थे। मिशनरियों ने अपने धर्म को ऊंचा सिध्द करने के लिए खासी मान्यताओं पर आक्रमण किए। उन्होंने कहा कि वन कैसे पावन हो सकते हैं? उनमें वृक्षों को काटने से भगवान कैसे गुस्सा हो सकते हैं, कोई वन-देवता है ही नहीं। और उन्होंने कुछ पावन वनों में घुसकर वृक्षों को काटा और दिखलाया कि वनदेवता उनको कोई भी दण्ड नहीं दे सके। इस तरह खासी विश्वासों और मान्यताओं को निराधार तथा व्यर्थ सिध्द करना शुरु करके, इसाई धर्म का प्रचार किया गया। तब भी उन धार्मिक प्रचारकों को बहुत कठिनाइयां उठाना पडीं क़िन्तु अन्ततः शासन का वरद हस्त रहने से और मेघालय की सारी शिक्षा उनके हाथ में रहने से उन्हें खासी संस्कृति को कमजोर करने से सफलता मिल ही गई। उसके अन्य अच्छे परिणाम जो हुए हों से हुए हों, किन्तु एशिया के समृध्दतम वनों के स्थान से वे वन संकटग्रस्त वन की स्थिति में आ गए और सहस्त्रों वर्ष पुरातन खासी संस्कृति भी। भारतवर्ष में मात्र कानून बनाने से कार्यों में सफलता मिलना बहुत मुश्किल है। उस अवधारणा को या कानून को सांस्कृतिक मान्यता मिलने से ही उसकी सफलता हो सकती है। अब चूंकि पढने लिखने वालों की संख्या बढती जा रही है इसलिए किसी भी उद्देश्य की अवधारणा को, उसके कारण-परिणाम को समझना भी आवश्यक हो गया है। सेंग खासी संस्था मेघालय में इस तरह के कार्य बडी लगन से कर रही है। मैं मेघालय के एक वन में, जो कि अपेक्षाकृत कम नष्ट हुआ है और अब अभयारण्य घोषित कर दिया गया है, भी घूमने गया। नांगखिलैम शिलांग से कोई 80 किमी उत्तर में शिलांग-गोहाटी मार्ग में उमलिंग से 20 किमी हटकर है। वन विश्रामगृह हम लोग दोपहर को पहूँच गए थे। 4 बजे जंगल घूमने निकल पडे। उमटूनदी में अच्छा पानी था जबकि वह जून का महीना था और वर्षा ॠतु प्रारंभिक अवस्था में ही थी। मेघालय के प्रमुख वन संरक्षक ने आगाह कर दिया था कि उस क्षेत्र में हाथी अभी भी बहुत हैं। खासी लोग हाथियों को अपनी पूज्य शिलांग देवी के दूत मानते हैं, इसलिए प्रयत्न करते हैं कि उन्हें हाथियों को न मारना पडे। क़िन्तु आधुनिक संतति अब विकास के नाम पर उनके परंपरागत वनों में घुसकर गाँव बना रही है जिसके फलस्वरूप हाथियों ने गणेश जी के शांत गुणों को त्याग कर रौद्ररूप धारण कर लिया है। वे हमेशा तो आक्रमण नहीं करते किन्तु उनसे बचकर रहने में बुध्दिमता है। उन्होंने सलाह दी कि हम लोग विश्राम गृह से तीन-चार सौ मीटर से अधिक दूर न जाएं। हम लोग जंगल घूमने, नदी के किनारे किनारे पगडंडी पर निकल पडे। विश्राम गृह के वृक्षों पर ही आर्किड खिल रहे थे। वैसे शिलांग-गुहाटी मार्ग को छोडक़र जब हम लोग वन की तरफ चले थे, तब रास्ते भर अनेक वृक्ष अपने आश्रित नीलरुण 'ऐयराइडीज मल्टी फ्लोरम' आर्किडों की सुन्दरता का अपनी उपलब्धि के समान प्रदर्शन कर रहे थे कि जैसे उन्होंने इन सुन्दर मनहर आर्किडों का पालन पोषण किया हो जब कि बिचारे आर्किडों ने उनकी सशक्त काली दरदरी पीढों पर मात्र अपनी जडें टिकाई थीं। लगता है कि समस्त वन जून माह को 'ऐयराइडीज मल्टीफ्लोरम' माह के उत्सव रूप में मनाता है। विश्रामगृह में 'सीलोजाइन पंक्टयुलाटा' आर्किड ने दर्शन दिए तो उनका जून उत्सव में यह सहयोग आकर्षक लगा। इनका रंग भी नीलारूण था। मैंने कहीं पढा था कि नीलारुण रंग सामान्य लोगों का मनपसन्द रंग नहीं है, वह विशिष्ट लोगों को ही पसंद होता है। यद्यपि मानव के किसी भी कार्य को इतनी सरलता से श्रेणियों में बा/टने पर मेरा विश्वास नहीं है, किन्तु इन निराले आर्किडों पर वह अवलोकन शतप्रतिशत घटित हो रहा था। हमलोग थे तो मेघालय में ही, किन्तु यहाँपक्षियों का कलरव, उमटू नदी के किशोरावस्था-पार के प्रणय गान में, वृन्दगान की तरह सम्मिलित हो रहा था। जब कि आमतौर पर नदी का छलछल तथा कीटों के तार स्वरों के वृन्दगान में पक्षियों के एकल या जुगल गान प्रमुख रहते हैं। किन्तु इस समय नदी की चढती युवावस्था 'पक्षी-कंचेर्टो' के स्थान पर इस समय 'उमडती नदी-कंचेर्टो' प्रस्तुत किया जा रहा था। मैं वनदेवी द्वारा प्रस्तुत संगीत का आनन्द ले रहा था कि देखा एक नीला पक्षी पास के वृक्ष से उडक़र नदी पार कर रहा था। नीलकंठ के दर्शन, दशहरा तो क्या, हमेशा ही शुभ मानता हूँ। वैसे नीलकंठ का सही नाम नीलपंख होना चाहिए क्योंकि उसके पंख नीले तथा गर्दन हल्की गुलाबी होती है। परन्तु भारतीय संस्कृति तो जीव जीव में परमात्मा का अंश देखती है। एक वृक्ष से एक भुजंगा उडा और उसने एक सुनहले पक्षी पर झपट्टा मारा। किन्तु यह सुनहली चिडिया दिल्ली की सामान्य लडक़ी सी न थी जो कि झपट्टे से हाथ मारकर अपना हार चुराने वाले से हार न बचा पाए इस पीलक ने भी पैंतरा बदला और चिल्लाया, ''क्या मुझे कोई उडने वाला कीट समझ रखा है जो यूं ही पकड लोगे। माना कि तुम तीरन्दाज हो किन्तु कीडों के लिए तो जाओ उन्हें पकडो।'' अपने की सरकसी समझने वाले ड्रांगो को भी समझ में आ गया और वे महाशय चुपचाप दूसरे तरफ तेजी से उड ग़ए। मैंने गौर किया कि इस पीलक ने, सुनहरे पीलक के समान अपनी सारी सुनहरी देह का घमंड न कर, अपने सिर पर काला घूँघट डाल लिया था - 'कृष्ण सिर पीलक' थी यह साहसी चिडिया। वैसे मैंने भुजंगे की मस्त चपल उडान का आनन्द अक्सर उठाया है। किन्तु किसी चिडिया उस पर झपट्टे मारते पहले बार ही देखा है। जब माहौल खराब हो तब साधारण राहगीर भी चोर-उचक्के बन जाते हैं। थोडा आगे जाने पर ही, नदी के पार से एक जोडी ऌस पार सागौन के वृक्ष पर आकर बैठी। वह कृष्ण-गर्दन कठफोडवा की जोडी थी। उसी के पास एक वृक्ष में पक्षी बारातियों की तरह (या कहूँ दूल्हे की तरह) सजधजकर इस शाख से उस शाख उडक़र धूम मचा रहे थे। वह वृक्ष बेर से भी छोटे (मके के दाने के बराबर) नारंगी और लाल लाल गोल फलों के गुच्छों से लदा था, मानो जनवासे में बारातियों के लिए स्वागत व्यवस्था की गई थी। नारंगी रंग पकने पर लाल हो गया था, किन्तु ये बाराती इतने भुखमरे थे कि इन्होंने कच्चे पके का कोई भेद नहीं किया। इन्होंने चोंच पर लाल लिपस्टिक, पैरों में लाल माहुर, नयन रतनारे कितनी सजधज की थी और इनके साथ में बिलकुल बिना मेकअप किए हुए उनके समान एक अंगुष्ठ बडी चिडिया भी थीं। पक्षियों के संसार में तो नर खूब मेक-अप करके बनठन के रहता है और मादा अधिकतर शांत हल्के रां पसन्द करती है। मुझे लगता है कि शायद आज भारत की कानून व्यवस्था को देखते हुए, भारतीय नारियां भी अक्सर आभूषणहीन निकलना ही पसन्द करती हैं। खैर, ये आकर्षक और अति चपल पक्षी थे 'पीलीदुम फूल चुही'। हम लोग, इस तरह विश्राम गृह से लगभग चार-पाँच सौ मीटर आ गए होंगे। और देखा कि पगडंडी पर ही हाथी की लीद पडी थी, और शायद एक दिन पुरानी और हम लोगों को प्रमुख वन संरक्षक द्वारा दी गई चेतावनी याद आ गई। मेरी पत्नी ने सलाह दी कि अब आगे जाना खतरे से भरा है इसलिए वापिस लौटना चाहिए। किन्तु मेरी इच्छा और वन के भीतर जाने की थी, उसी तरह मेरी बिटीया की और मेरे मित्र की भी। तब पत्नी ने कहा कि हाथी सामने पडने पर वे तो भाग भी न सकेंगी और यदि हम लोगों को उनकी सही सलाह नहीं मानना है तो वे वापिस जाएंगी और वापिस चली गईं। हम लोग आगे चले। मैंने गीता से पूछा कि हाथी आ जाएगा तो हम लोग उस मोटे |