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प्रकृति की गोद में इंद्रधनुषी
छटा बिखेरता नागालैंड

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पूर्वोत्तर राज्यों की सकारात्मक खूबियां लंबे समय से चल रहे अलगाववाद, हिंसात्मक उथल पुथल के बीच दबकर रह गयी है। इनके पहचान के साथ उग्रवाद जुड़ गया। हालांकि देश के शेष भाग के सामने यहां का एकतरफा चेहरा और उनका राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू का दबा कुचला स्वरूप ही सामने आता है। पूर्वोत्तर को समझने के लिए हर क्षेत्र को करीब से समझना, देखना और इनके सीने में दबे दर्द को सहानुभूति व सौहार्दपूर्वक महसूस करना होगा। राजनीतिक विफलताओं ने गाजे-बगाहे छोटे-बड़े अलगाववादी, भूमिगत उग्रवाद को पनपने दिया है। जितनी राजनीतिक पार्टियां इन क्षेत़्रों में नहीं होंगी, उनसे ज्यादा हथियारबंद संगठन सक्रिय हैं। सरकारी नौकरी में घुमन्तू प्रवास के दौरान पूर्वोत्तर राज्यों में काफी संवेदनशील तथा लंबे समय से हिंसा से जूझ रहे अशांत और कठिन राज्य नागालैंड को करीब से महसूस करने और समझने का अवसर मिला। करीब तीन साल तक नागालैंड की राजधानी कोहिमा में रहकर वहॉं के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलू से रू-ब-रू हुआ।

      जैसे, बिहार आने के नाम से, देश के अन्य भाग के लोगों को सॉप सूँघ जाता है, वैसे ही नागालैंड जाने के नाम पर भी दहशत होती है। कोहिमा जाने को लेकर छाये खौफ ने ठीक से खाने तो क्या सोने भी नहीं दिया था। बात एक या दो दिन की नहीं थी कम से कम दो साल वहॉ व्यतीत करना था। वर्ष २००१ के अक्टूबर माह में मेरा तबादला नागालैंड की राजधानी कोहिमा के आकाशवाणी में हुआ। खौफ और ज्यादा था कि वहॉं एक भी अपना परिचित नहीं था। उपर से जो भी थोड़ी बहुत जानकारी नागालैंड के बारे में रखता था, उसकी बातें रोज मुझे सताती थी। जिस दौर में नागालैंड के भूमिगत उग्रवादियों और भारत सरकार के बीच सीजफायर नहीं थी और रोजाना मुठभेड़ की खबरें आती थी, उसे देख चुके एक सहकर्मी की बातें मेरे अंदर डर पैदा करती रहती थीं। हालांकि वे कहते कि तबादले पर जाने वाला व्यक्ति नागालैंड पहुंचते ही अपने टेन्योर  की उल्टी गिनती गिनना शुरू कर देता है। क्योंकि नागालैंड में मैदानी लोग या फिर गैर नागाओं में जो असुरक्षा की भावना दिखती है वह उनके प्रवास तक बरकरार रहती है।

       दूसरी ओर, वहां के प्राकतिक सौन्दर्य और सदाबहार मौसम की चर्चा करते हुए सहकर्मी बताते कि जाने के बाद वहां से आने का मन नहीं करेगा।इस बीच जो भी जानकारी मिलती उसे मैं अपने जेहन में डालता जा रहा था। कोहिमा से आए मेरे सहकर्मी यह कहकर भी डराते कि जाइए कोहिमा, वहॉं कुत्ता का मांस खाने को मिलेगा। आखिर वह दिन भी आया जब मुझे पटना से ट्रेन पकड़नी थी यानी १२ मई, २००२। हालॉंकि मैंने ठान लिया था कि जाते ही एक- दो दिनों में वहॉं से भाग आउंगा। लौटने का टिकट भी ले  रखा था। इस बीच ट्रेन आ गयी। ट्रेन में भीड़ थी, धकियाते-फानते अपनी सीट पर पहुंचा, जहां पहले से ही लोग काबिज थे। सामान रखते-रखते ट्रेन चल पड़ी थी। और मैं अनचाही यात्रा पर चल पड़ा। धीरे-धीरे आसपास के लोगों से बातचीत शुरू हुई। सभी गौहाटी जा रहे थे हालॉंकि उनमें से कई को गौहाटी से बस या फिर रेल से दूर-दराज के इलाकों में जाना था। मैं चकित था कि परिवार के साथ जा रहे लोग वर्षों से पूर्वोत्तर के राज्यों में व्यापार, नौकरी कर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। लेकिन सभी ने इसके नकारात्मक पहलू से ही रू-ब-रू कराया। पूर्व में सुनी बातें ट्रेन में भी सहयात्रियों ने दोहराया लेकिन यह भी बताया कि अब हालात पहले जैसे नहीं हैं। थोड़ी शांति है। फिर भी वहां का मिजाज कब खराब हो जाए कहना मुश्किल है। दूसरे दिन मैं गोहाटी पहुंचा। स्टेशन के अंदर और बाहर सैनिकों की तैनाती देख पूर्वोत्तर की हिंसा का एहसास होने लगा था।

      खैर, मैंने गौहाटी से कोहिमा फोन कर पहुंचने की जानकारी दी। शाम में कोहिमा की यात्रा बस से शुरू हुई। ठंडी हवा के झोंको ने सुबह पांच बजे मेरी नींद उड़ा दी थी। बाहर देखा तो बस प्रकृति की गोद में फिसलती जा रही थी। पटना की गर्मी और कोलाहलपूर्ण वातावरण की जगह शांति और हरियाली के बीच अपने आप को पाकर अजीब सी अनुभूति का अहसास हो रहा था। कुछ ही देर में पेड़ों को चीरती हुई बस ने रिहायशी क्षेत्र में प्रवेश किया। एक बात तो बताना भूल ही गया। रास्ते में कोहिमा प्रवेश करने के पहले चेक पोस्ट पर बस को रोककर नागालैंड पुलिस ने चेकिंग शुरू कर दी थी। सामानों के साथ-साथ वे गैर नागाओं से पास की मांग कर रहे थे। मैंने अपना परिचय पत्र दिखाया। देखने के बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा। वहीं दो-तीन लोगों को पास नहीं रहने के कारण बस से उतार दिया। बात समझ में नहीं आ रही थी कि लोगों को क्यों उतार दिया गया और किस तरह के पास की वे बात कर रहे थे। इस बीच मैंने बाहर देखा तो सड़क के किनारे एक बोर्ड पर साफ-साफ अंग्रेजी में लिखा था कृपया अपना इनर लाइन परमिट यहां दिखाएं। बात मेरी समझ में आने लगी थी कि नागालैंड में प्रवेश के लिए विशेष परमिट की जरूरत पड़ती है। लेकिन भारत सरकार के कर्मचारियों के लिए उनका प्रवेश पत्र ही चलता था। दरअसल, विदेशी नागरिकों की घुसपैठ को रोकने के लिए इनर लाइन परमिट को अनिवार्य बना दिया गया है। नागालैंड में प्रवेश के लिए विदेशी नागरिकों को गृह मंत्रालय से विशेष परमिट लेना होता है। वैसे भारतीय नागरिकों के लिए मात्र पॉंच रूपये में कोलकाता, दीमापुर, गौहाटी और दिल्ली से परमिट बन जाता है। जब मेरी आंख खुली तो अपने को कोहिमा में पाया। यहॉं की आबोहवा देख ऐसा लग रहा था कि मैं हिल स्टेशन पर कम, विदेशी जमीन पर ज्यादा हॅू। बस अपने गंतव्य पर आकर रूक गयी थी। सामान उतारकर मैं सोच ही रहा था कि कहॉं जाउं। मेरी निगाह होटल तलाश रही थी। तभी जीन्स पैंट पहने एक नागा व्यक्ति ने मेरे पास आकर अंग्रेजी में पूछाआप पटना से आए हैं ? ऐसे सवाल की उम्मीद मैंने नहीं की थी। मेरी निगाह आकाशवाणी की गाड़ी पर गयी। मैंने पूछा; आप आकाशवाणी से हैं। जवाब और गाड़ी से आश्वस्त होकर मैं गाड़ी में बैठ गया। डर भी लगा रह था, पता नहीं कौन है। कहीं भूमिगत उग्रवादी तो नहीं। सुन रखा था कि उनका नेटवर्क बहुत ही मजबूत है और प्रदेश में आने वाले हर लोगों की सूचना उन्हें पहले मिल जाती है। उपर से मैं सरकारी मीडिया में आया था। गाड़ी के आकाशवाणी पहुंचते ही मेरा डर काफूर हो गया था। हॉं, गेट के पास अर्द्धसैनिकों को देखकर यहॉं के हालात का अंदाजा होने लगा था। अभी गाड़ी से उतरा ही था कि कंटोल रूम से एक आदमी आया और कहा कि आपका फोन है।  फोन समाचार एकांश में काम करने वाले एक सहकर्मी का था जिसने मुझे न्योता दिया कि आप मेरे यहां आकर रह सकते हैं।

      मैं सोच  ही रहा था, काश, कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जिसके साथ रह सकूं। मेरी स्थिति यहॉं के हालात को देख अकेले रहने की नहीं थी। अचानक साइरन की आवाज सुनकर मैं घबरा गया। भागकर बाहर आया तो देखा कि जवान इधर से उधर भाग रहे थे। पास में खड़े एक व्यक्ति से पूछा-क्या हुआ ? उसने बड़े ही इत्मिनान से बताया कि कुछ नहीं, यह तो रूटीन है। सहकर्मी के घर जाने के क्रम में सड़क के किनारे और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों का मोर्चा संभाले, गश्त लगाती आर्मी की गाड़ियों पर लगी मशीनगनों का मुख सामने और ट्रीगर पर जवानों की अंगूली दहशत पैदा कर रही थी। मैंने डाइवार से पूछा-ऐसा हमेशा रहता है। उसने बताया कि पिछले कुछ साल से सीज-फायर चल रहा है, इसलिए यहॉ का माहौल शांत है, नहीं तो स्थिति विस्फोटक थी। हालॉकि जवान रात हो या दिन किसी भी समय लोगों और गाड़ियों की चेकिंग करते रहते हैं। उसने धीरे से बताया कि यहॉं भूमिगत उग्रवादियों की अपनी समानांतर सरकार चलती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नागालैंड में सब कुछ खुशी-खुशी चलता है। बात करते-करते हम आकाशवाणी कॉलोनी पहुंच गए थे। नजर घुमाकर देखा तो उपर नीचे पहाड़ों पर मकान ही मकान नजर आए। खैर सहकर्मी के घर पहुंचा, जो केरल का रहने वाला था और पिछले दस साल से कोहिमा में कार्यरत था। तबादले को लेकर वह प्रयासरत था। कोहिमा से मेरे वापस आने के दो महीने पूर्व ही उसका भी तबादला केरल हो गया था और वह इतना खुश था मानो कोई जंग जीत ली हो। उसने कोहिमा के हालात से अवगत कराते हुए कई तरह की हिदायतें दी।

      पहला दिन ठीक ठाक गुजरा, रहने-खाने का फिलहाल मामला सुलझ गया था। यहॉं ढंग के होटल कम ही उपलब्ध है। हालांकि राइस होटल ढ़ेर सारे हैं, जहां चावल के साथ कुत्ता, गाय आदि का मांस मिलता है। कार्यालय में पहले ही दिन बिहार, उत्तर प्रदेश तथा मैदानी क्षेत्र के कार्यरत सहयोगियों ने मेरा हौसला बढाया। कई नागा भाइयों ने गर्मजोशी के साथ मेरा स्वागत किया तो कुछ ने यहां तक कहा कि अच्छा, ''इंडिया से आया है``। खैर, खूबसूरत वादियों से घिरे कोहिमा में प्रकृति का अद्भूत नजारा खुद ब खूद सभी चिंताओं को दूर कर दिल और दिमाग को ताजा कर देता था। यहां का मौसम इतना खुशनुमा था कि ऐसा लगता  जैसे स्वर्ग जमीन पर उतर आया हो। कोई शोर नहीं। चारों तरफ शांति ही शांति थी। मैं बड़ा आश्चर्यचकित था कि प्रकृति के इस अद्भूत नजारे के बीच एक भी पक्षी के चहचहाने की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। आकाश में भी पक्षियों को उड़ते हुए नहीं देखा। बाद में पता चला कि यहां नागा लोग पक्षियों को देखते ही उसके पीछे पड़ जाते हैं और मारकर खा जाते हैं। पक्षियों के हो रहे शिकार की वजह से ही वहां के राजकीय पक्षी 'हार्नबिल पक्षी` लगभग लुप्तप्राय: हो चुके हैं ।     

      नागालैंड अपने आप में जितना खूबसूरत है उतना ही इसके आसपास का माहौल भी। इसके पूरब में म्यांमार और अरूणाचल प्रदेश, पश्चिम एवं उत्तर में असम और अरूणाचल प्रदेश तथा दक्षिण में मणिपुर है। मूलत: कृषि पर आधारित नागालैंड के लोगों के बारे में कहा जाता है कि नागा लोग जन्म से ही प्रकृति प्रेमी होते हैं और संगीत तथा उत्सव इनके रंग-रंग में बसा रहता है। धीरे-धीरे अपनी आदत के मुताबिक लोगों से मिलना-जुलना मैंने शुरू कर दिया। नागाओं के हमेशा हंसते रहना और खुशमिजाज व्यवहार मुझे भ्रमित करता था। खैर, जहॉं अपने ही लोग मुझे डराते रहते थें, वहीं मैंने देखा कि कुछ नागा मुझसे बडे  स्नेह से मिलते और घंटों लालू यादव और राबड़ी देवी के बारे में तरह-तरह के सवाल पूछा करते थे।   कोहिमा पहुंचने के बाद एक-एक कर बहुत सी बातें सामने आने लगी थी। उत्सुकता भी थी कि आखिरकार नागालैण्ड के बारे में सुनी गई बातों में सच्चाई कितनी है। सबसे पहले वहंश के राजनीतिक हालात से ही रूबरू होना पड़ा। एक दिन पता चला कि एक केन्द्रीय कार्यालय के प्रभारी से तीन लाख रूपए की मांग की गई थी। उन्होंने उपर के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। जब वहां से कोई निर्देश नहीं मिला तो उन्होंने नागालैंड ही छोड़ दिया। बाद में विभाग ने उनका तबादला कर दिया। इसी तरह एक दिन पत्नी के साथ दुकान में जरूरत का सामान ले रहा था, तभी दुकानदार को एक व्यक्ति रसीद पकड़ा गया। मालूम हुआ वह '' मंत्रालय `` से टैक्स वसूली का था।  दुकानदार ने बताया कि यह यहां के लिए यह आम बात है और बिना पैसे दिये यहां बिजिनेस नहीं किया जा सकता है। हांलाकि संगठन के लोगों के नाम पर कुछ असामाजिक तत्व भी फायदा उठा लेते हैं। संगठनों की इस रंगदारी में यह ईमानदारी काबिले तारीफ है कि उनके मांग या तय राशि के बाद जबरन कुछ नहीं लिया जाता। नागालैण्ड की राजधानी कोहिमा देश के महंगे शहरों में गिना जाता है। दरअसल संगठन और अन्य लोगों द्वारा पैसों के मांग की भरपाई यहाँ का व्यापारी तबका कीमतें बढ़ा कर करता है। ऐसे में यहाँ हर चीज महंगी बिकती है।

कई बार सुनने को मिला कि नागालैण्ड में सत्ता में तो राजनीतिक दल काबिज रहते हैं लेकिन यहां भूमिगत संगठनों की भी अपनी समानान्तर सरकार चलती हैं। उनका अपना संसद और मंत्रालय भी है। वर्षों से नागा विद्रोहियों ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में टैक्स जमा करने की एक व्यवस्था ही बना ली है। जिसके बारे में सभी जानते हैं। बजाप्ते संगठनों द्वारा रसीदें दी जाती हैं, जिसमें वित्त मंत्रालय को दिये जाने वाले टैक्स की चर्चा  रहती है।

       नागालैण्ड में उद्योग के नाम पर टूरिज्म ही दिखा, लेकिन अलगाववाद से पैदा हुए हालात ने इसे पनपने नहीं दिया है। डर से यहां कम ही लोग आते हैं। यहां उद्योग-धंधों का अभाव है। भूमिगत संगठनों द्वारा भारी रकम की मांग उद्योगपतियों को  बोरिया बिस्तर समेटने को मजबूर किया। हालांकि सीजफायर के बाद समय-समय पर भूमिगत संगठने जबरन पैसे वसूल करने की बात का खंडन करते रहते हैं। इस में दोराय नहीं कि अलगाववादी राजनीति से नागालैण्ड सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। वर्षों के हिंसक माहौल से गुजरने के कारण सीजफायर के बावजूद आज भी नागालैण्ड की फिजा में अजीब तरह के खतरे की बू आती है। उपर से शांत लेकिन अंदर से विस्फोटक राज्य के व्यवसायिक शहर दीमापुर को छोड़ कर राजधानी कोहिमा सहित सभी शहर, बाजार शाम चार-पांच बजते-बजते बंद और शांत हो जाते हैं या यूं कहें कि मृतप्राय हो जाते हैं। यहंश तक की दवा की दुकानें भी बंद हो जाती हैं। सड़कों पर वाहनों का आना-जाना लगभग समाप्त सा हो जाता है। केवल इक्के-दुक्के  सरकारी-निजी वाहन ही चलते हैं। शाम होते ही शहर में सैनिक मोर्चा संभाल लेते हैं मानो कर्फ्यू लग गया हो। लम्बे समय से रह रहे बाहर और स्थानीय लोगों के अनुसार हालांकि, पहले ऐसा नहीं था। शाम सात-आठ बजे तक बाजार खुले रहते लेकिन, हालात  जैसे-जैसे बिगड़ने लगे वैसे-वैसे जीवन भी प्रभावित होने लगा। यही नहीं, बताते है कि पैसों की बढ़ती मांग और उत्पीड़न से तंग आकर कोहिमा से बड़े व्यापारी पलायन कर गये हैं। केवल छोटे व्यापारी ही रह गये।

      नागालैंड के इस शांत जिंदगी के बीच दीमापुर में थोड़ी लाइफ दिखी। बाजार और आवागमन कम से कम आठ-नौ बजे तक खुले रहते हैं। हालांकि बाजार पर कब्जा पूरी तरह से मैदानी क्षेत्र के लोगों का है। हांलाकि अब धीरे-धीरे नागा लोग भी व्यवसाय में आ रहे हैं। दीमापुर की संस्कृति मिली-जुली है। वजह यह है कि पहले असम का हिस्सा रहा है। इसके अलावा दीमापुर सड़क व वायु मार्ग से जुड़ा होने के कारण यहंश जीवन देखने को मिला जबकि यह भूमिगत संगठनों का केंद्र माना जाता है। केंद्र सरकार ने नागालैंड को अशांत व गड़बडी वाला क्षेत्र घोषित कर रखा है जिस वजह से सुरक्षाकर्मियों की विशेष निगाह सभी पर रहती है। लम्बे समय तक हिंसाग्रस्त रहे इस प्रदेश में स्वाभाविक था सुरक्षाकर्मियों के व्यवहार में खास तरह की ठसक। नागा मित्रों ने बताया कि हालात में अभी सुधार है वरना पहले वे पूछते तक नहीं थे। कई बार ऐसे मौके आये वाहन जांच के क्रम में आर्मी/विशेष पुलिस से दो चार होना पड़ा।

      खुबसूरत वादियों से घिरे अशांत नागालैंड में एक अजीब तरह की शांति हैं। यह शांत वातावरण एक अनहोनी का भी अहसास कराता रहता है। खुल कर कोई कुछ कहने की स्थिति में नहीं दिखा। ठहरी हुई जिंदगी में जब जीने की आदत सी हो रही थी, तभी दो तीन महीने बाद ही नवम्बर और दिसम्बर की कड़ाके की ठण्ड में एक नई उर्जा से भरपूर माहौल ने दिल को गरमा दिया। देर शाम तक हर ओर चहल पहल और लोगों में खास उत्साह झलकने लगा था। घरों और दुकानों की सजावटें मेरी उत्सुकता को रोक नहीं पायी और विचारों के अनुकूल मैंने खोजबीन शुरू कर दी। नागा मित्र हंसते और बताते दिसम्बर आने दो फिर देखना !

      सच, दिसम्बर में नगालैंड की खूबसूरती देखते ही बनी। शांत वातावरण और रात भर गीत संगीत के बीच थिरकते कदमों के उत्सवी माहौल ने मेरे सोच को बदलने पर मजबूर किया। नवम्बर के अंतिम सप्ताह से उत्सवी माहौल का नजारा दिखने लगा था और क्रिसमस के मद्देनजर दिसम्बर आते-आते पूरा नागालैंड लाल रंग की रोशनियों में सरोबर हो गया। नागाओं के साथ-साथ गैर नागा भी अपने अपने घरों के बाहर रोशनी वाले लाल स्टार सजाते, जो खासकर रात में टिमटिमाते जुगनुओं का आभास कराते थे। हमेशा की तरह देर शाम कार्यालय से लौटता तो मुहल्लों, सड़कों और नुक्कड़ों पर खास कर युवा जोड़े गर्मजोशी के साथ बतियाते-घुमते मिलते। गीत-संगीत में सराबोर इन जोड़ों को देख दुविधा होती क्या यह वही खौफजदा नागालैंड है ? नागा मित्रों ने बताया कि क्रिसमस आते-आते पूरा नागालैंड उत्साहित हो जाता है। यों, उत्सवी माहौल की शुरुआत क्रिसमस के पहले हॉर्नबिल फेस्टीवल से ही हो जाती है। जो हर वर्ष एक से पांच दिसम्बर तक शिकार की वजह से लुप्तप्राय: हो चले हॉर्नबिल पक्षी के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से राजधानी कोहिमा में मनाया जाता है। हालांकि वर्ष २००४ से यह कोहिमा से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर खूबसूरत पर्यटन स्थल फेसमा में आयोजित होने लगा है। तीन बार वहां जाने का मौका मिला और एक प्लेटफार्म पर नागा संस्कृति का अदभूत समां बंधते देखा। नागा जनजाति के अपने-अपने पारंपरिक रिवाजों पहनावों के साथ नागा यहां जमा होते हैं। वास्तविक रूप से प्रदर्शित मोरूंग यानी परंपरागत घर पूरे आयोजन स्थल को नागा संस्कृति से इस तरह जोड़ देते थे मानो समूचा नागालैण्ड़ एक प्लेटफार्म पर सिमटा हो।

      यहां आने के बाद मौसम ने मुझे जितना प्रभावित किया उससे ज्यादा सांस्कृतिक माहौल ने मेरे अंदर एक उर्जा भर दी। यों, तो अपना देश सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। त्योहारों-उत्सवों की यह भूमि है और हर धर्म के लोगों के आपसी एकता और सौहार्द्ध की मिसाल भी, जो हर समय मिलकर खुशियां बांटते हैं। ऐसे में ईसाई धर्म को अपना चुके जनजाति बाहुल्य वाला राज्य नागालैण्ड सांस्कृतिक विरासत के मामले में देश के अन्य भागों से बिल्कुल ही अनोखा है। खासकर इसके उत्सव, जो उनके पुरखों के दौर से चले आ रहे हैं, अनूठे हैं। यहां की विभिन्न जनजातियां सालों भर रंग-बिरंगे उत्सव मनाते रहते हैं। जिनमें उनकी संस्कृति की झलक मजबूती से दिखाई देती है। नागाओं के जीवन में ये उत्सव बड़े प्यारे है। लगभग हर महीने कोई-न-कोई त्योहार/उत्सव यहां मनाए ही जाते हैं। इसलिए नागालैंड को उत्सवों की धरती भी कहा जाता है।

      राज्य में १६ प्रमुख जनजातियां एवं कई उप जनजातियां हैं। इनकी पारम्परिक वेशभूषा व रहन-सहन की तरह इनके उत्सव / त्योहार भी अलग-अलग हैं। इनकी संस्कृति में कृषि की भूमिका बहुत मायने रखती है और यही वजह है कि इनके उत्सवों में भी इसका पुट मिलता है। फसल की बुआई से पहले या बाद में अच्छी फसल होने के लिए प्रार्थना हो या फिर फसल होने के बाद भगवान को धन्यवाद देने का अवसर, सभी उत्सव का रूप लेकर नागाओं के लिए उमंगे लाता है। हालांकि अलग-अलग उत्सवों में अलग-अलग नागा प्रजातियों की पारलौकिक भावनाएं, धार्मिक विधियां जुड़ी रहती है। फिर भी सभी में उसी परमात्मा ईश्वर की पूजा की जाती है, जिन्हें अलग-अलग नागा बोलियों में अलग-अलग नाम से जाना या बोला जाता है। चाहे वे कोन्यकों के गवांग हों या आओ के सूंगरेम या फिर सूमियों के अल्हो या तिमिल्हो। प्राय: सभी जनजातियों के उत्सवों में कुछ रस्में एक सी होती हैं, जैसे जानवरों की बलि और चावल से बनी विशेष शराब और मांस का समायोजन और नृत्य-संगीत की अहम् भूमिका। हांलाकि कई बार सामूहिक उत्सवों में शराब की जगह लाल चाय पिलायी जाती है। आओ जनजाति के उत्सव मोत्सू मोंग में जाने का मुझे मौका मिला। रंगा-रंग उत्सव एक बडे से मैदान में मनाया जा रहा था। मेरे लिए उत्सव का रोचक पहलू यह रहा कि इसमें शामिल सभी को बांस से बने कप में लाल चाय और सींक में लगी छोटे-छोटे पके मांस के टुकड़े लगा कर दिये जा रहे थे। सकोंच करते हुए मैंने मांस और चाय ले ली क्योंकि नहीं लेने पर अनादर समझा जाता है। खैर मैंने बांस से बनी कप में चाय पी और मांस पास में बैठे नागा मित्र को दे दिया। ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद नागाओं ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को नहीं छोड़ा है।

      कोहिमा पहुंचते ही जो चीज मुझे स्पष्ट दिखने, लुभाने लगी थी, वो था उनका पहनावा, रंग-बिरंगी वेश-भूषाएं, अहलेसुबह शुरू होती उनके रोजमर्रे की जिंदगी, सुबह-सुबह खुलते बाजार और काम पर निकलते आधुनिक दिखते युवकऱ्युवतियां, महिलाएं-पुरूष यानी कुल मिलाकर उनका दैनिक जीवन। एक ओर तो पाश्चात्य आधुनिक पोशाकों को मात देती लड़कियां तो दूसरी ओर पारंपरिक 'मेखला` में भी सुसज्जित। इसे मेखला कहते है यह तो खैर मैने बाद में जाना, पर यह एक शॉलनुमा वस्त्र है जिसे लोग कमर में लपेट कर पहनते है। इसके अलावा लोग यहां करघे से बुने शॉल ओढ़ते भी हैं। यूं तो सभी शॉल मुझे पहले एक से लगते थे पर बाद में पता चला कि अलग-अलग नागा जनजातियों और स्त्री-पुरूषों के पहनावे अलग-अलग होते हैं। जिस तरह नागालैंड का सांस्कृतिक माहौल विभिन्न जनजातियों के भिन्न रंगों से रंगा है, उसी तरह इनके पहनावे भी अलग-अलग हैं। शॉल उनका प्रमुख पहनावा है और इनके डिजाइनों से नागा जनजातियों का पता लगाया जा सकता है। शॉलों के अलावा उनके अन्य पारंपरिक वस्त्र अक्सर कौड़ियों से सजे होते हैं। हालांकि नागा जिस सहजता से पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं उतने ही आराम से वे आधुनिक परिधानों में भी नजर आते हैं। बल्कि इस मामले में तो कोहिमा फैशन की नगरी मानी जाती है।

      इनका खानपान भी बड़ा रोचक है। एक दिन कोहिमा के सब्जी बाजार के किनारे जीव-जन्तु, तरह-तरह के रंग बिरंगे पिल्लुओं और कीड़े-मकौड़ों को बिकते देखा तो उत्सुकता बढ़ गयी। यहां ग्लास से नाप कर बिकते घोंघा मन में भ्रम पैदा कर रहे थे। लेकिन जब अपने पड़ोसी और उसके बच्चों को भात के साथ पकाया घोंघा खाते देखा तो बरबस ही बिहार-झारखंड और उड़ीसा की याद आयी जहंश समय-समय पर अखबारों में आदिवासियों को घोंघा खाते फोटो और समाचार छाप कर मीडिया उनके भूख और गरीबी को सामने लाती रहती है। पहली बार कोहिमा आने वालों को मैं वह बाजार जरूर दिखाने ले जाता था। इस बाजार का दिलचस्प नजारा होता है, पानी से भरे पॉलिथिन में बेचने के लिये रखे रंग-बिरंगे जिंदा मेढक या फिर एक साथ पांच-दस मेढ़कों के पैर आपस में बांधकर सड़क किनारे ग्राहकों के लिए रखा जाता था। मेढ़कों के आपसी खींचातान का नजारा देखने लायक रहता है, जब तक कि कोई ग्राहक खरीद न ले जाये। खानपान को लेकर कई बार उन्हें अलग नज