मुखपृष्ठ  |  कहानीकविता | कार्टून कार्यशालाकैशोर्यचित्र-लेख |  दृष्टिकोणनृत्यनिबन्धदेस-परदेसपरिवार | फीचर | बच्चों की दुनियाभक्ति-काल धर्मरसोईलेखकव्यक्तित्वव्यंग्यविविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

 

अपनी अपनी इमारतें बनाने वाले

धर्म की व्याख्या चाहे जितने भी आकार प्रकार सूक्तियों तथा शब्दों के हेर फेर से क्यों न की जाये, वस्तुत: धर्म तमाम बाहरी आवरणों से मुक्त, सद्वृत्ति, निष्कपट आचरण, सहृदयता, सत्यकर्म आदि मूल भावों का ही परिचायक है, संदेशवाहक सूत्र है; विशुध्द मानवीय शाश्वत मूल्य। प्रजातंत्र की आड में, आज हम अपनी अस्मिता के नाम पर कई कई मजहबों, जातियों, उपजातियों को पनपा पनपा कर धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाए, अपनी अपनी अलग अलग बडी से बडी ऌमारतें बनाने में मशगूल हो गये हैं

हमारा कोई राष्ट्रीय अथवा मानवीय धर्म भी हो सकता है, इस तरफ से पूरी तरह बेखबर हो, हम दूसरी तरफ करवट लेकर मजे से खर्राटे भर रहे हैं
तब यह सोचना किसका दायित्व है कि क्यों अनाचार, आडम्बर, आतंक आदि, धर्म-जाति, मजहब-क्षेत्रीयता की भावना को जड बना कर समग्ररूप से फले फूले हैं थोडा सहज निष्पक्ष भाव अपना कर हम पाएंगे कि आज पूरे विश्व में आतंक तथा बर्बरता का जो माहौल छाया हुआ है, धर्म के साथ उसकी कोई तर्कसंगति नहीं बैठती है जितने भी पूजा स्थल हैं, वस्तुत: मानव निर्मित इमारतें हैं इन इमारतों का उद्भव लक्ष्य तो मानव समाज में सद्भावनाओं का पावन प्रवाह ही करना ही रहा होगा

तब क्या कहिये, यदि इन्हीं इमारतों का इस्तेमाल निजी स्वार्थों तथा धनोपार्जन अथवा राजनैतिक लाभों के लिये किया जाने लगे क्यों चन्द धूर्त चालाक लोग इन्हीं इमारतों पर केवल अपना वर्चस्व स्थापित करलें? जब बडे बडे नामी गिरामी मन्दिरों में टिकट खरीद कर भगवान के दर्शन करवाए जाते हों, पुजारियों पण्डों द्वारा भोले भाले भक्तों का निकृष्टतम स्तर तक जाकर शोषण किया जाता हो, तब भी यदि हमारे अन्दर इन सब के प्रति श्रध्दा, आस्था बनी रहती है तो सोचना होगा कि क्या हम मात्र अपने अन्धविश्वासों के नीचे परत दर परत दब कर इन मानव निर्मित इमारतों के प्रति वफादारी जताते हुए, मात्र एक लम्बी लकीर तो नहीं पीटते चले जा रहे हैं?

बार बार और आज के दौर में एक बार फिर कहा जा रहा है कि फौज, पुलिस को किसी भी धार्मिक स्थल में कार्यवाही हेतु नहीं घुसना चाहिये, लेकिन ऐसी नौबत आती ही क्यों है? इससे बचा जाना चाहिये पहली गलती तो राजनैतिक, प्रशासनिक स्तर पर ही होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं क्यों पुलिस बल समय रहते सतर्कता नहीं बरतते और गुरुद्वारों, दरगाहों को उग्रवादियों की शरणस्थली बन जाने देते हैं। वहां बडी तादाद में अस्लाह आदि भी जमा होने देते रहते हैं दूसरी तरफ उन धर्मस्थलों के मठाधीश भी आरंभ ही से धार्मिक स्थल में आतंक फैलने देने का विरोध क्यों नहीं करते या वे स्वयं ऐसी चीजों को आश्रय देते हैं? अब जब यह सब हो चुकता है तो धर्म के नाम पर उग्रवाद फैलाने वालों को वहां से बाहर खदेडने के लिये सरकार के पास अन्त में एक ही रास्ता रह जाता है, फौजी हस्तक्षेप बडी आसानी से समझ में आ सकता है कि यदि आतंकवादियों ने अन्य इमारत को अपना अड्डा बनाया होता तो सेना उसमें घुसती, धार्मिक स्थल में कतई नहीं घुसती

लेकिन सिर्फ सरकार को दोष देने से आज तक किसी भी ज्वलन्त समस्या का समाधान नहीं निकल सका है थोडा सा दोष हम अपने माथे पर भी लें तो क्या हर्ज है? हम स्वयं क्या करते हैं? सामाजिक चेतना जाग्रत करने तथा कपटियों के विरुध्द आवाज उठाने ( आदेश पत्र / फतवा जारी करने ) में हमारी भी क्या कोई भूमिका नहीं हो सकती? मात्र निष्क्रिय, कर्तव्य विमूढ होकर किसी को गालियां देने तक ही क्या हमारी भूमिका सीमित होनी चाहिये? सरकार हो या फिर कोई षडयन्त्रकारी जमात, संघर्ष उसके विरुध्द हो, न कि हम आपास में ही धर्म, जाति के नाम पर आपस में ही मार काट मचा दें दोषी
निर्दोष का फर्क जाने बगैर!

सर्वविदित है कि हमारे तथाकथित राजनेता, अपने भारी कंधों पर पूरे मुल्क का भार उठाने का दम भरते हुए, दंगों, क्षगडों फसादों को जन्म देते हुए धर्म के कन्धों पर राजनीति का खेल खेलते हैं और आम भोले भाले नागरिकों को अपने वोटों की फसल पैदा करने के मकसद के तहत, खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं

प्रश्न यह है कि क्या सचमुच हम ऐसे लोगों को ऊंचा उठाने के लिये खाद बन जाएं या अपनी समझ से काम लें।यहां एक स्थूल सा उदाहरण देना अनुचित नहीं होगा कुछ दफ्तरों में ऐसे आकाओं को मुंह की खानी पडी है, जो मात्र अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने के उद्देश्य से अपने अथीनस्थ कर्मचारियों में फूट डलवाना चाहते थे हरेक को एक दूसरे के खिलाफ भडक़ा कर ये अफसर ज्यादा देर तक सफल नहीं हो पाए क्योंकि कर्मचारी भी अपनी समझ रखते थे अपने पूर्वसम्बन्धों तथा दूरगामी हितों, परस्पर बन्धुत्व के प्रति सचेत थे गलत और सही को नापने का पैमाना उनके पास था, यही वजह थी कि ऐसा अफसर अपने फायदे का कुशासन उन पर थोपने में बुरी तरह विफल रहा क्या भारतीय जनता इतनी छोटी सी बात नहीं समझ पा रही?

संत ऐसा नहीं होता जिसे एक जाति संप्रदाय तो पूजे और दूसरे संप्रदाय वाले, दीनधर्म वाले लानत भेजें कम से कम हमारा इतिहास तो ऐसा नहीं कहता जहां सूफी सन्तों की सब धर्मों को मानने वालों ने समय समय पर सम्मान दिया है यह इसलिये कि वास्तविक संत देश काल अथवा समुदाय विशेष से बंधा हुआ नहीं होता उसके हृदय की गहराइयों में सम्पूर्ण मानव समाज की भलाई की भावना रची बसी होती है ऐसी भावना हर पल उसके आचरण से ही स्वत: स्फुटित होती है इसीलिये सभी धर्मों के सब लोग बिना किसी भेदभाव के उसी संत के होकर रह जाते हैं उसे सदा आदर और प्यार देते हैं ऐसे अनेक सन्त भारत में हुए हैं _ कबीर, गूगा, लालीसन को तो सभी जानते हैं इन्हें हिन्दु कहो या मुसलमान इससे क्या फर्क पडने वाला है? ईसा तथा नानक के प्रति सभी के मन में अटूट श्रध्दा विराजमान है

यदि कोई व्यक्ति अपने आपको संत कहलवा कर एक सम्प्रदाय द्वारा किसी अन्य व्यक्ति या अन्य धर्मावलम्बियों/विचारालम्बियों पर अत्याचार करने का आह्वान करता है या फतवा जारी करता है या उनकी भावनाओं पर आघात करता है तब होना यह चाहिये कि स्वयं उसीके सम्प्रदाय लोग उसके विरुध्द आवाज उठाएं। प्रभावित सम्प्रदाय के लोगों को तो आगे आकर कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पडनी चाहिये ऐसे तथाकथित संतों को अपनी असली औकात जल्दी ही समझा देनी चाहिये

धर्म के नाम पर किया गया दुष्प्रचार तथा फैलाई गई घृणा अंततोगत्वा, उसी धर्म की छवि को धूमिल करती है इसीलिये भी उसी धर्म के लोगों का दायित्व बन जाता है कि खुल कर आगे आएं और ऐसे धर्माचारियों(?) की निन्दा, भर्त्सना कर उन्हें हतोत्साहित करें और धर्म के प्रति अतिसम्वेदनशीलता भी घातक है कुछ बुरी बातों को नजरअन्दाज क़र देना चाहिये, दूसरे धर्म के लोग आपके धर्म के प्रति बदतमीजी क़रके अपने धर्म की तुच्छता ही जता रहे होते हैं, आपके धर्म का क्या बिगडने वाला है? जो कि शाश्वत है

धर्म कर्तव्यनिष्ठ स्वच्छ भावना है धर्म की साधना सर्वथा निष्कपट मन से एकाग्र होकर की जानी चाहिये भगवान कोई बहरा नहीं जिसे शोर मचा मचा कर घडियाल बजा बजा कर या लाउडस्पीकरों से चेताया जाये अपनी जयजयकार सुनने को तो हमारे राजनेता ही काफी हैं उनके कान यही सब सुनने को लालायित रहते हैं और आँखें अपने चहेते भक्तों की भीड ही भीड देखना चाहती हैं, चाहे वे किराये के ही क्यों न हों अपने चारों ओर भीड देखने की लालसा किसी भगवान की नहीं हो सकती भगवान और धर्म को तो हमें आज के नेताओ और धर्माचारियों से मुक्त कराना होगा जो सिर्फ अपनी इमारतें बनवाने में मशगूल हैं मानवीय गरिमा को विखण्डित करने वाली शक्तियों को तो राष्ट्रद्रोही मान कर दण्डित करने की आवश्यकता है

नि:सन्देह यह अधिकार हमारा है कि हम एकजुट होकर कथित महापुरुषों (?) से पूछें कि इस प्रकार की धर्म की ठेकेदारी तुम्हें किसने दी है जो किसी व्यक्ति को हिन्दु सिख मुसलमान ईसाइ धर्म से निष्कासित करते रहते हो? निश्चित रूप से यदि हम मात्र अपने मानव एवं राष्ट्रीय धर्म पर ही गर्व कर सकें तो हमारे नैतिक मनोबल में वृध्दि होगी
साथ ही राष्ट्रीय समस्याएं भी बहुत हद तक सुलझ जाएंगी राजनैतिक स्वार्थियों के निहित स्वार्थों की इमारतें धरी रह जाएंगी

हरदर्शन सहगल
जून 9, 2002


   
 

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2012 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manisha@hindinest.com