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दिव्य प्रेम
बन्धुत्वहम हमारे पुराणों के अनुसार पुरूष को शिव का तथा स्त्री को शक्ति का रूप माना गया है। शिव व शक्ति का अटूट प्रेम विश्वविख्यात है। उनका एक दूसरे के प्रति असीम प्रेम और आकर्षण ही, प्राकृतिक भाव से उनके मूर्त रूप अर्थात् मनुष्य में साकार हो दूसरों के प्रति प्रेम तथा आकर्षण का भाव उजागर करते है। शिव व शक्ति का प्रेम भाव प्रकट करने के असंख्य तरीके है और उसी के परिणामस्वरूप मनुष्यरूपी कृति की रचना ईश्वर ने की हैं। मनुष्य का जीवन दैविय क्रीडाओं का एक क्रीडा स्थल मात्र हैं। विवाह ही एक सूत्र है जिसमें बंधकर दो अनजान प्राणी आपसी अपरिचितता को त्याग कर एक हो जाते है लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि इस समाज ने विवाह को समझौते के रूप में परिभाषित किया है, उसके कथन के अनुसार विवाह वह संबंध है जो हमारे जीवन की एक आवश्यकता है, जो हमें किसी पर आश्रित होना सिखाती है। इसका सार है कि समाज द्वारा लिखे नियमों का पालन करों न कि इन संबंधों को आपसी प्रेम से सिंचित करों। ये हमारे समाज की कैसी विडम्बना है सच्चा प्रेम किसी भी प्रकार की निर्भरताओं तथा आशाओं से परे होता हैसिर्फ आप और यह बह्मांड, इसी में हमारी दुनिया लिप्त रहती है।
विचार या भावनाएं?
सुख लेकिन क्यों? हम सोचते है कि धन ही हमें समस्त सुख प्रदान कर सकता है। हम सोचते है कि रतिक्रीडा हमें सुख प्रदान कर सकती है। हम विचार करते है। यहीं एक जटिल समस्या है। विचार ही संदेह की उत्पत्ति का मूल कारण हैं।
मैं
आपको एक सरल उदाहरण देना चाहती हूं
देवालय रूपी शरीर कौन सी शक्ति ईश्वर में लीन होने में बाधित है? जिस प्रकार हम पूजा-वेदी को विभूषित कर ईश्वर की अराधना करते हैं उसी प्रकार कौन इस शरीर के अंतर्मन को, शुध्दीकरण रूपी श्रृंगार से आभूषित नहीं करना चाहेंगा। प्रकृति की सृजनात्मक सुन्दरता इस बात का द्योतक है कि स्वयं ईश्वर भी सौन्दर्य के उपासक हैं। एक-एक कृति उनके लिए नन्हें बालक के समान है, जिनसे जननी की भांति उन्हे असीम स्नेह है। इसलिए अपने अंतर्मन का पवित्र विचारों से सुन्दरीकरण कर इस शरीर को एक नवीन समाज के जनक-जननी की भांति उपयोग करों। इस शरीर को ईश्वर का वरदान प्राप्त है कि किसी के मन में प्रेम भाव को उत्पन्न कर सकता है, किसी में नवीन प्राण फूंक सकता है तथा एक नई कृति को इस संसार में जन्म दे सकता है। इस प्रकार अपने कर्मों को तल्लीनता पूर्ण सम्पन्न करके इस शरीर को ईश्वर भक्ति में लीन कर अपना जीवन समर्पित कर दो। हम ईश्वर का आवाहन ध्यान, रेकी, योग, ताईची, पूजा, तंत्र द्वाराजो विधि सें आप अपने को ईश्वर के अधिक समीप महसूस करते है, कर सकते है। ईश्वर को पाने के लिए वनों, पर्वतों में भटकना आवश्यक नहीं, उसका वास तो हमारे अंदर ही हैवरन् वह तो कण-कण में विद्यमान हैं।
स्वास्थ्य हमारे सभी प्रकार के गुण-दोषों को जानते हुए भी जो हमसें प्रेमभाव रखता है वह ईश्वर द्वारा प्राप्त सबसे अनमोल भेंट है और वह कोई नहीं अपितु स्वयं ईश्वर है। सृष्टि का यह नियम है कि यदि हम किसी से कुछ भी अपेक्षा रखते है तो हमें देने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए। किसी से भी प्रेम बिना किसी आशा या अपेक्षा के करना चाहिए और यदि कोई आपके प्रति प्रेमभाव रखता है तो बिना किसी शंका व संदेह के उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। लेकिन यह हमारी त्रासदी है कि इस प्रकार के वातावरण का अभाव हमारे में दमनकारी तथा अवरोधक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता हैं। और शीघ्र ही हम इस दमघोंटू आवरण से निकल मुक्त हो श्वास लेना चाहते हैं। हमारा शरीर तथा मस्तिष्क एक दूसरे के पूरक हैं। अत: यदि हमारे मस्तिष्क पर दमनकारी प्रवृत्तियां अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है तो शरीर उसका विद्रोह करता है। हमारा शरीर हमारे अंदर उत्पन्न हो रही भावनाओं को प्रकट करने में सक्षम है। तो इसका समाधान क्या है, अगर हम उन कारणों को ढूंढ पाने में असमर्थ है जिसमें हम किसी भी प्रकार के प्रेमभाव को बिना किसी प्रतिबन्ध के स्वीकार कर सकें? यह समस्या इतनी जटिल नहीं परन्तु उससे पहले हमें अप्रतिबन्धित रूप से स्वयं के प्रति प्रेमभाव उत्पन्न करना सीखना होगा। उस प्रक्रिया में उत्पन्न हो रही नकारात्मक भावनाओं का भी विशलेषण करना होगा जो रोगों की भांति हमारे शरीर में बीज बोकर उसे रोगग्रस्त कर देती है। अगर हम इन बीजों को नष्ट नहीं करेंगे तो यह विकसित हो एक विशालकाय वृक्ष का रूप ले लेगा जिसका विनाश असंभव हैं।
समझो,
जानो,स्वीकार करों।
मूलकथा एंव
ग्राफिक - वैश
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