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धर्म और धर्मान्धता
हर मनुष्य का व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक व्यवहार उसके मन और विचारों के विकास पर निर्भर करता है। अनेक व्यक्तियों का मिलाजुला आचरण सामाजिक व्यवहार की नीव होता है। पीढी दर पीढी व्यक्तियों की इच्छाएं, आकांक्षाएं, स्वभाव और प्रवृत्तियां एक व्यक्ति के रूप में पुनर्जीवित होती हुई दिखती है। इस तरह जहां अनेक लोंगों के अच्छे विचार आचार और सत्प्रवृत्तियां एक संत महात्मा को जन्म देती है, वहीं बुरे विचार जैसे काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर इत्यादि एक राक्षस को जन्म देते है। जब पवित्रता, उदारता, बंधुत्व, करूणा, ज्ञान और भक्ति अपनी चरम सीमा को पहुंच कर एक ही व्यक्ति के रूप में इस धरातल पर अवतरित होते है तब समाज उसे ईश्वर समझ पूजने लगता है। जैसे जैसे समय बीतता है वैसे वैसे उस पुण्यवान के बारे में यह धारणा और भी ज्यादा ठोस होती जाती है। इस व्यक्ति के नाम से एक धर्म की शुरूआत हो जाती है। उसे धर्मसंस्थापक की संज्ञा मिल जाती है। ख्रिस्त, बुध्द, राम, कृष्ण, महावीर, नानक जैसे महापुरूषों के नाम उदाहरण के तौर पर लिये जा सकते है। & |