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 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 

पुरानी राहें नए अंदाज में दिखाएं डिजिटल नक्शे

नई दिल्ली, 14 दिसम्बर  (आईएएनएस)।  इंटरनेट हर पल नई से नई सुविधा हमारे लिए परोस रहा है और  इस कड़ी में आनलाइन मौजूद हजारों-लाखों डिजिटल मानचित्रों की क्रांति घर-घर में पहुंच चुकी है। कागज पर छपने वाले नक्शों के बाद अब जमाना 'डिजिटल मैपिंग' का है।

डिजिटल नक्शे इंटरनेट पर नि:शुल्क उपलब्ध हैं और यात्रा से पहले उस जगह की पूरी जानकारी उपलब्ध करवा सकते हैं। विदेशों में 'डिजिटल मैपिंग' का तेजी से विकास हुआ जिसके चलते कई वेबसाईट्स पर मानचित्र उपभोक्ताओं की सुविधानुसार ढल रहे हैं। नेत्रहीनों के लिए इन्हें पढ़कर सुनाए जाने की व्यवस्था है और पर्यटन स्थलों की भाषा और संस्कृति की जानकारी नक्शे के साथ मुफ्त में मिलती है।

ट्रेवेल एजेंसी 'मेक माई ट्रिप' की वरिष्ठ पर्यटन सलाहकार शोभा रावत के अनुसार, ''गूगल पर लगभग सभी देशों के नक्शे नि: शुल्क उपलब्ध हैं। ये नक्शे हमारे लिए बेहद उपयोगी साबित होते हैं। इंटरनेट पर बुकिंग सुविधाओं के लिए जरूरी है कि देश विदेश के नक्शे भी आनलाईन अपलब्ध हों ताकि यात्रियों की सुविधा के लिए उन्हें ई-मेल किया जा सके।''

'मैप्स आफ इंडिया डॉट काम' और 'मैप माई इंडिया डॉट काम' जैसी भारतीय वेबसाईट्स 'मैपिंग उद्योग' में छिपी संभावनाओं को भांप रही हैं। मैप्स आफ इंडिया के मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव सुबीर के अनुसार, ''हमारी वेबसाईट पर प्रतिदिन लगभग 30,000 से 40,000 लोग आते हैं। देशी हो या विदेशी नक्शे सभी के लिए उपयोगी हैं। भारत में सर्वे आफ इंडिया की अनुमति के बिना नक्शों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। लोगों के रुझान को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह नियमों में ढील दे ताकि भारत में भी यह उद्योग मजबूत हो।''

मैप माई इंडिया ने उपभोक्ताओं के लिए घर से गंतव्य तक की दूरी पता लगाने की सुविधा भी उपलब्ध करवाई है। गूगल अर्थ ने 2004 में दुनिया का नक्शा और सेटेलाईट चित्र उपलब्ध करवा कर इस दिशा में एक नई पहल की। इस साफ्टवेयर के माध्यम से दुनिया के नक्शे पर अपना घर ढूंढना संभव हुआ। कार्गिल इंडिया के ब्रांड प्रबंधक रोहित राठौड़ कहते हैं, ''मैं पिछले हफ्ते लद्दाख गया था। जाने से पहले ही गूगल अर्थ की सहायता से मैंने झील, मॉनेस्ट्री और होटल देख लिए थे। यह कमाल की सुविधा है।''

गूगल जैसी कंपनियां अब भारत में ऐसे नक्शे बनाने की पहल कर रही हैं जिन्हें 'विकीपीडिया' की तर्ज पर स्थानीय लोगों द्वारा बनाया जाएगा। हर गली नुक्कड़ की जानकारी लिए ये नक्शे अपने आप में अनूठे होंगे। हालांकि यह काम आसान नहीं। सर्वे आफ इंडिया के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, ''ये नक्शे भले ही उपयोगी हों लेकिन इनसे उपलब्ध जानकारी को पुष्ट करना मुश्किल है।''

जो भी हो राह चलतों के भरोसे रास्ता ढूंढने के दिन अब लद गए हैं। जमाना इंटरनेट का है और डिजिटल नक्शे दुनिया के हर कोने का हाल सुनाने के लिए हमारी सेवा में हाजिर हैं।

 पारुल अग्रवाल
15
दिसम्बर 2007

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

           
 

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