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सृजन : संपादकीय
सायबर फातिमा या ज़ुलैखाः चुनाव हिज़ाब के पीछे के विरोधाभासों का
संसार भर में फैले मुस्लिम देशों की इन लेखिकाओं से इंटरनेट पर रू - ब रू होकर मेरी सोच में बहुत बड़ा फर्क़ आया है, कि हमारे गर्व करने के लिए मुस्लिम देशों की लेखिकाओं में तस्लीमा, तहमीना से पहले भी दुस्साहसी लेखिकाओं की लंबी क़तार है और बाद में
भी।  -  आगे पढें

कविताएं
राक्षस पदतल पृथ्‍वी टलमल....सुमन केशरी

माया एंजलू से हुई मेरी बात - अपर्णा मनोज

नियति - सुधा ओम ढींगरा
अपेक्षा
- सुधा ओम ढींगरा
विचार
-
सुधा ओम ढींगरा
बेबसी
-
सुधा ओम ढींगरा

अपने होने के साथ -हरप्रीत कौर
रोहिड़ा - हरप्रीत कौर
छाया
-
 हरप्रीत कौर

खुद से बातें - अर्पिता श्रीवास्तव
अंतराल- अर्पिता श्रीवास्तव

बदल दो जो बदल रहा है- अर्पिता श्रीवास्तव

 

चर्चा में पुस्तक  : अकथ - कहानी प्रेम की : डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल

जो कलि नाम कबीर न होते...’ जिज्ञासाएं और समस्याएं (पुस्तक सार)

देशज आधुनिकता और भक्ति का लोकवृत्त
रपट
भारत में परम्पराओं को लेकर विचित्र रवैया डॉ.
पुरुषोत्तम अग्रवाल

लेखक परिचय
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल

 

इस माह के चर्चित ब्लाग
अज़दक
सबद
अनहद नाद

फिलहाल
Antheia

उपन्यास ( धारावाहिक)
आगे खुलता रास्ता
- नंद भारद्वाज (अंक - 2)
गीता अपनी शादी के बाद कुल जमा चौदह दिन पति के साथ इस आनंदलोक में अकेली रह पाई और फिर उसी पुश्तैनी घर में वापस पहुंच गई।  आगे पढ़ें

कहानियां
अंक की विशिष्ट कहानी

क्या वह धूसर में प्रकट होती है ?
(मैं यह कहूँ कि यह अमूर्तन कहानी नहीं है तो मत मानिएगा, अपने मन की मानियेगा. मैं भी नहीं मानती कि यह चर्चित युवा चित्रकार अवधेश के बनाए एक चित्र 'वह धूसर समूह की व्याख्या है. )
वह कोहरे में भागना चाहती है। फिर भी खड़ी रही और इसी वक्त एक काली लकीर उसकी खोपड़ी छेदती आर-पार निकल गयी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। फिर उसने गिनना बन्द कर दिया। अन्दर, कहीं बहुत भीतर उसका खून फैलने लगा। बहुत ही धीरे।
-- आगे पढें

Does she appear in grey - Avdhesh
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गंधर्व – गाथा - मनीषा कुलश्रेष्ठ
कहीं पढा था, कहाँ...यह तो ठीक से याद नहीं   _  कि चेतन के लिए थोड़ा भी बहुत है और जड़  क़े लिए बहुत भी कुछ नहीं. उस दोपहर में जो कुछ थोड़ा - सा था, वह मेरे सजग अवचेतन के लिए बहुत साबित हुआ. उस दोपहर में ऐसा क्या था? - आगे पढें

 

English Section

Witnessed 'SHIGAF' Grow from a Gurgling Baby to a Sassy Teenager Kanupriya Kulshreshtha
 

Poetry - Nand Chaturvedi
Translated by
Dr Ashutosh Mohan

ALL IN OUR FAVOUR  -

THE BOOK

THE CALLOUS MOMENT OF CARNIVAL

AH ! HUENTSANG

THE FORT 

LUMINOUS PEAKS

 

 

रिपोर्ताज़
जादू टोनों के देस की कतरनें  - ओमा शर्मा
महानगर में जिंदगी गुजारते चले जाने के खामियाजे का पहला अहसास आपको तभी हिट करता है जब आप किसी छोटे शहर या कस्बे में पहुँच जाते हैं। मुझे गुवाहाटी एक कस्बा लग रहा था हालांकि सभी तरह के आधुनिक महानगरीय भग्नावशेष वहाँ प्रचुरता में बिखरे पड़े थे ... फ्लाईओवर्स, मल्टीप्लैक्स, बड़ी कंपनियों के शो-रूम इत्यादि। लेकिन इस सबके बावजूद कस्बे की हवा अपनी तरह से चुगली किये जा रही थी ...आगे पढें

संस्मरण
अज्ञेय की दृष्टि में अन्य हिन्दी लेखक
विजय शर्मा
इस छोटी सी पुस्तक में उन्होंने उन लोगों की स्मृति ताजा करने का प्रयास किया है जिन्होंने साहित्यिक संवेदन का निर्माण किया है और उसे संस्कार दिया है. जिन्होंने हमें अपनी अस्मिता की पहचान कराई है. अज्ञेय इतने विनम्र हैं कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि उनके इस प्रयत्न के बिना इन लोगों की स्मृति नहीं बनी रहेगी. वे केवल धूल झाडने का प्रयास कर रहे हैं.

पद्मभूषण पं. किशन महाराज के साथ यात्रा के कुछ क्षण' - नीरजा द्विवेदी
रेशमी टसर का कुर्ता, सफ़ेद पाजामा पहने, चेयर कार में सामने की सीट से उठकर दरवाजा खोलकर बाहर जाने वाले व्यक्ति के लम्बे, फहराते श्वेत धवल केशों पर दृष्टि पड़ी तो मैं व मेरे पति चौंक पड़े-
''किशन महाराज हैं क्या''?

मेरे अकेलेपन के निस्सीम दिन -जया जादवानी
मेरे अकेलेपन के निस्सीम दिन हैं- मन कहीं ज्यादा देर नहीं लगता, भटककर वापस आ जाता है। थोड़ी देर अनमनेपन से पढ़ती हूं, फिर सोचने लगती हूं। ये साधना है मेरी-कुछ लिखने से पहले की साधना।
-आगे पढें

साहित्य कोष

कलात्मक आध्यात्म की पराकाष्ठा : अचम्भे का रोना - चित्रकार अखिलेश की पुस्तक पर

“ रंग और उसके स्याह अँधेरे में जहाँ से मैं सफेद को एक नए रूप में, एक नए आकार में, एक नए टोन में चुपके से पकड़ लेता हूँ, वह अचम्भित हो जाता है.
फिर धीरे से दोस्त बन जाता है.”
  अखिलेश

स्त्री मन की कहानियाँ - पारमिता शतपथी की कहानियां - विवेक पाण्डेय


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