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सृजन : संपादकीय
सायबर फातिमा या ज़ुलैखाः चुनाव हिज़ाब के पीछे के विरोधाभासों का
संसार भर में फैले मुस्लिम देशों की इन लेखिकाओं से इंटरनेट
पर रू - ब रू होकर मेरी सोच में बहुत बड़ा फर्क़ आया है, कि हमारे गर्व करने के
लिए मुस्लिम देशों की लेखिकाओं में तस्लीमा, तहमीना से पहले भी दुस्साहसी
लेखिकाओं की लंबी क़तार है और बाद में
कविताएं राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल....सुमन केशरी
माया एंजलू से हुई मेरी बात - अपर्णा मनोज
नियति - सुधा ओम ढींगरा
खुद से बातें
- अर्पिता श्रीवास्तव
चर्चा में पुस्तक : अकथ - कहानी प्रेम की : डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल
जो कलि नाम कबीर न होते...’ जिज्ञासाएं और समस्याएं (पुस्तक सार)
देशज आधुनिकता और भक्ति का लोकवृत्त
रपट
लेखक
परिचय
इस माह के चर्चित
ब्लाग
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उपन्यास (
धारावाहिक)
गीता अपनी शादी के बाद कुल जमा चौदह दिन पति के साथ इस आनंदलोक में अकेली रह
पाई और फिर उसी पुश्तैनी घर में वापस पहुंच गई। आगे पढ़ें
कहानियां
(मैं यह कहूँ कि यह अमूर्तन कहानी
नहीं है तो मत मानिएगा, अपने मन की मानियेगा. मैं भी नहीं
मानती कि यह चर्चित युवा चित्रकार अवधेश के बनाए एक चित्र 'वह धूसर समूह की
व्याख्या है. )
Does she appear in grey - Avdhesh
गंधर्व – गाथा
- मनीषा कुलश्रेष्ठ कहीं पढा था, कहाँ...यह तो ठीक से याद नहीं _ कि चेतन के लिए थोड़ा भी बहुत
है और जड़ क़े लिए बहुत भी कुछ नहीं. उस दोपहर में जो कुछ थोड़ा - सा था, वह
मेरे सजग अवचेतन के लिए बहुत साबित हुआ. उस दोपहर में ऐसा क्या था?
-
आगे पढें
English Section
Witnessed
'SHIGAF' Grow from a
Gurgling Baby to a Sassy
Teenager
-
Kanupriya Kulshreshtha
Poetry - Nand
Chaturvedi
Dr Ashutosh Mohan
THE BOOK
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रिपोर्ताज़
महानगर में जिंदगी गुजारते चले जाने के खामियाजे का पहला अहसास आपको तभी हिट करता है जब आप किसी छोटे शहर या कस्बे में पहुँच जाते हैं। मुझे गुवाहाटी एक कस्बा लग रहा था हालांकि सभी तरह के आधुनिक महानगरीय भग्नावशेष वहाँ प्रचुरता में बिखरे पड़े थे ... फ्लाईओवर्स, मल्टीप्लैक्स, बड़ी कंपनियों के शो-रूम इत्यादि। लेकिन इस सबके बावजूद कस्बे की हवा अपनी तरह से चुगली किये जा रही थी ...आगे पढें
संस्मरण
पद्मभूषण पं. किशन महाराज के साथ यात्रा के कुछ क्षण'
- नीरजा द्विवेदी
साहित्य कोष
कलात्मक आध्यात्म
की पराकाष्ठा : अचम्भे का रोना
- चित्रकार अखिलेश की पुस्तक पर
“ रंग और उसके स्याह अँधेरे में जहाँ से मैं
सफेद को एक नए रूप में, एक नए आकार में, एक नए टोन में चुपके से पकड़ लेता
हूँ, वह अचम्भित हो जाता है.
स्त्री मन की कहानियाँ - पारमिता शतपथी की कहानियां
-
विवेक पाण्डेय
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