मुखपृष्ठ  |  कहानीकविता | कार्टून कार्यशालाकैशोर्यचित्र-लेख |  दृष्टिकोणनृत्यनिबन्धदेस-परदेसपरिवार | फीचर | बच्चों की दुनियाभक्ति-काल धर्मरसोईलेखकव्यक्तित्वव्यंग्यविविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य |
साहित्य कोष | समाचार |

 

 Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 

  इसे ऐसा ही होने दो - 4

कह दूँ आज? आज कह ही दूँ। ये जो मेरी आँखों से, मेरे हाथों की कंपकंपाहट को नहीं समझ रहा तो कहीं यह कहने से ही समझेवह एक लम्हा, जिसका मैं इंतज़ार कर रही थी कि यह ही कहेगा और मैं शर्म से लाल पड ज़ाऊंगी, शायद जीवन में कभी नहीं आएगाकुछ चीजें जीवन में कभी नहीं होंगी और जीवन फिर भी होगाये जो दिन-रात अपने आपसे बातें करती हूँ, एक बार कह दूं इसेक्या होगा, हाँ या ना, यह जो असह्य यातना के बीच खडी हूँ उससे तो छुटकारा मिलेगा -

'' मि संजय''

हम दोनों ने चौंक कर उधर देखा लाईब्रेरी की खिडक़ी के बाहर कोई प्रोफेसर बुला रहे हैं उन्हेंउन्होंने उधर देख कर हाथ हिलाया कि आ रहे हैंफिर मेरी तरफ देखा-

'' आय एम सॉरी मिस शिरीन, आपको कुछ कहना है, मैं जानता हूँ। मैं कल यहीं लाईब्रेरी में आपका इंतजार करुंगा, दो बजे के बाद। ''

मेरी देह की कंपकंपाहट उनके कदमों से लिपटी दूर तक घिसटती चली गईवे दरवाजे से बाहर गए और वह वहीं गिर गईमेरी आँखे भर आईंमैं ने हथेलियों में चेहरा छुपा लिया और उन्हें घूंट-घूंट पीती रहीपता नहीं कितना वक्त गुजर गया

वह एक गुच्छा-गुच्छा सी रात थी, जो मेरी बाँहों में अलसाई सी सो गईबहुत देर बिलखने के बाद मैं देर तक उसका सिर थपक कर उसे दिलासा देने की पूरी कोशिश करती रहीहर रात के अपने किस्से होते हैंकुछ चकमक करते रंगीन पत्थर, कुछ अनगढ छोटे बडे मिट्टी के ढूह, कोई पुराने बाँस की पोली बाँसुरी जिसमें से अतीत की कभी कोई दबी-दबी सी कराह सीटी की तरह बजती और सोती हुई रात के स्वप्नों को खबर हो जाती बहुधा वे इस तरह की आवाजों से तितर्र बितर हो जाते, हलचल शांत होतही फिर तिरते से उपर आ जाते

आज मेरे मन की हालत बडी अजीब है ये क्या होता जा रहा है मुझे, मैं बिलकुल भी नहीं समझ पा रहीमैं टकरा जाना चाहती हूँ किसी राह चलती बस सेमेरे चिथडे-चिथडे उड जाएं, मैं बिखर जाऊं इन्हीं हवाओं में जिनमें तुम साँस लेते होहाय, अपना बोझ तक नहीं उठा पा रही मैंये रेत का रेगिस्तान कैसे पार करूं मैं? मैं लडख़डाते कदमों से ही अन्दर घुसीकिसी-किसी वक्त मेरी आँखों के आगे अंधेरा-सा छाने लगता - और मैं सर झटक कर खुदको ठीक करतीमेरी हथेलियाँ पसीने से तर हैंबिना किसी की ओर देखे मैं आगे बढती जा रही

मैं ने जब लाइब्ररी में कदम रखा - ठिठक गई एक मिनट लगा, वापस लौट जाऊं आज का दिन ठीक नहीं मेरे लियेपता नहीं क्या हो खुद पर भी वश नहींमेरी नजर सामने गई वे उसी टेबल पर बैठे कुछ लिख रहे थेचेहरा इतना झुका हुआ कि सिर्फ उनके बाल दिख रहे थे, आधे काले, आधे सफेदतब तक लाईब्रेरियन मुझे देख चुका था, मैं ने अभिवादन में सर हिलाया और सीधी चलती हुई उनके सामने जाकर रुक गईउन्होंने एक पल को मुझे देखा और अभिवादन के जवाब में मुझे बैठने का इशारा कर फिर कागजों पर झुक गएबैठते हुए मैं ने एक गहरी साँस फेंकी और थकान से भरा मेरा जिस्म कुर्सी पर मानो ढर्हसा गयामेरा गला सूख रहा था, मैंने इधर-उधर देखा सीढियों के पास कोने में घडा रखा था और कांच के कुछ ग्लापर मैं उठी नहीं

मैं कई पल इस आधे झुके चेहरे को देखती रही-

'' देखो न, मैं तुमसे छिपना नहीं चाहती, ये मेरी प्यास है, ये मेरी चाहत, तुम्हें छूने की लालसा है यह, जो अपनी पकड से कुछ छूटने नहीं देना चाहती। यह मैं हूँ, मुझे देखो, मुझे छुओ, मैं तुम्हारा हाथ पकड क़र इतनी दूर जाना चाहती हूँ कि तुम्हें कुछ भी याद न रहे। शायद तुम कभी न जान पाओ कि कितनी कोमल भावनाएं तुम्हारे कदमों से टकरा कर बिखर गई हैं। ''

कितने दिन तुम मेरी बेचैनी अनदेखी करते रहोगे? आखिर मेरा कुसूर क्या है, यही कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ और...और आज तक तुम्हें छुआ तक नहींनहीं कुछ भी नहीं हो रहा, उस तरफ खामोशी है, अंतहीन बिना लहरों का ऐसा समंदर, जो समूची भावनाएं अपनी अतल गहराइयों में खींच लेता हैमैं भी क्यूं इसमें छलांग लगा अपना वजूद तक खो देना चाहती हूँ।

देखे जा रही हूँ मैं उन्हें एक जानलेवा तटस्थता मेरी बेचैनी बढाए जा रही हैजी चाहता है उनके चेहरे को झिंझोड दूँ, ये जो आवरण ओढ क़े बैठे हैं गंभीरता का मेरे सामने, इसे एक झटके में चीर कर इनसे अलग कर दूँ और देखूँ, जो ये हैं पूर्णतया नग्न कैसा होता है.. आदमी कैसे हो तुम? गुस्से से मेरी मुठ्ठियां भिंच रही हैं

'' मुझे तुमसे कुछ कहना है, आज अभी, इसी वक्त। मैं इंतजार नहीं कर सकती। मैं क्यूं करूं इंतजार कि तुम्हें समय हो, सहूलियत हो। कितने निष्ठुर हो तुम, हृदयहीन, पर क्यूं हो तुम ऐसे? मेरे लहू में ये कैसा पागलपन सवार है? मेरे चारों ओर कैसे सींखचे हैं। मैं इन सबसे मुक्ति पाना चाहती हूँ। मैं अपना सिर टकरा रही हूँ। मेरा माथा लहूलुहान हो गया है, और तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता। प्रेम यातना है! हाँ, प्रेम यातना है! यह दूसरे से अनवरत तुम्हारे पास आती है। तुम्हें सिर्फ सहते रहना है। देखो, मुझे तुम्हारी यह स्थिरता नहीं चाहिये, तुम्हारी तडप, व्याकुलता, तुम्हारा जुनून, दीवानगी हाय! मैं कहाँ जाऊं , क्या करूं? आज पहली बार अपने उपर दया आ रही है। मैं तरस खा रही हूँ खुद पर? मैं तो ऐसी न थी। किसी दिन तुम भी मुझ पर तरस खाओगे, हाय बिचारी! नहीं मैं नहीं सह सकती, मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ।''

अवश क्रोध में मेरी मुठ्ठियां भिंच रही हैंदेह की समूची शिराएं तनी हुईमेरी कनपटी गर्म हो गई हैगाल धधक रहे हैंमाथे पर गिर रहे बालों को एक झटके से पीछे किया मैं नेनहीं कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा तुम्हेंकुछ भी नहींअचानक एक झटके से टेबल पर रखे सारे कागज़ों को मुट्ठी में भरकर मसल दिया मैं नेमुट्ठियां खोलींमसले कागज टेबल पर बिखर गए और उनकी तरफ देखे बगैर मैं उठी और बाहर निकल गई

दरवाज़ा बंद था और मैं देर से खडी थी - अनिश्चित-सी खटखटाने न खटखटाने, रुकने या चले जाने के गहरे असमंजस और तनाव मेंखुद को खुद से परे करते हुए मैं ने घंटी के बटन पर उंगली रख दीअन्दर कहीं सन्नाटे में वह ध्वनि गूंजी और मैं ने खुदको जानी-मानी प्रतीक्षा में पायामैं ने उन्हें तुरंत पहचान लिया, जितना उनके बारे में सुना था, उससे कहीं ज्यादा मैं पिछले दिनों उनके बारे में सोचती रही हूँ। लंबा कद, छरहरा बदन, गोरा रंग, बडी-बडी आँखें, तीखी नाक और गोल ठोडी उनके होठों पर एक सहज मुस्कान र्है आश्वस्त करती सीमैं ने दोनों हाथ जोड उन्हें नमस्कार किया

'' आओ, आओ।'' वे हल्के से सर हिलाते हुए दरवाजे से हट गईं।

हम एक कमरे को पार करते हुए दूसरे कमरे में आ गए जो शायद इनकी बैठक हैपहले कमरे में किताबों से भरी अलमारियों के सिवा कुछ भी न देख पाईवह साधारण और सुंदर सी बैठक मानो उसमें रहने वालों की बाबत कोई सूचना देती होहम बैठ गए

'' आप शायद मुझे पहचानती नहीं।'' मैं ने हल्की सी मुस्कान के साथ उनकी ओर देखा।
''
पहचानती हूँ। तुम शिरीन हो न! ''  वे मुस्कुराती हुई मुझे देखती रहीं।
''
आपको किसने बताया मेरा नाम? ''  मैं अपने चौंकने को बडी सफाई से छुपा गई।
उन्होंने अन्दर कमरे की ओर इशारा किया। वे आपकी काफी तारीफ करते हैं।
'' तारीफ? मेरी? '' मैंने हल्के से व्यंग्य से कहा और चुप हो गई।

कितनी बेतकल्लुफी से तुमने नाम लिया संजय मैं ने गहरे विषाद के साथ सोचा एक बार यही नाम इसी तरह पुकारने की मेरी लालसा से कितनी अपरिचित हो तुम?

'' हाँ! हाँ! '' उन्होंने मानो मुझे किसी निराशा से बचाते हुए कहा।
''
वे बहुत कम ही किसी की तारीफ करते हैं। मुझे सिर्फ उनके एक या दो वाक्यों से ही समझना होता है।''

मैं ने सिर झुका लिया

'' मैं इन्हें बुलाती हूँ। कह कर वे अन्दर चली गईं।''

अब? क्या कहूंगी मैं उन्हें? उस दिन की घटना से मैं स्वयं इतनी शर्मिन्दा थी कि फिर चार दिन कॉलेज ही नहीं गई कहीं न कहीं एक धुंधली सी उम्मीद थी कि वे फोन करें शायद यह जानने को कि क्या हो गया है मुझे? पर नहींकिसी तटस्थ योगी कि तरह उन्होंने मेरा वह गुस्सा भी स्वीकार कर लिया और चुप बने रहेऔर मुझे ही आना थामैं ही आईमैं ही क्यूं ? मैं ही क्यूं चल कर आती हूँ। वह दूसरा क्यों नहीं चलता, चाहे दो कदम

वे अन्दर आए और मैं उठ कर खडी हो गई

'' बैठिये-बैठिये '' उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा और बैठ गए, पीछे वे भी आईं और बैठ गईं।
''
घर ढूंढने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई।'' यूं ही सा सवाल।

मैंने उन पर उचटती सी निगाह डाली( तुम्हें ढूंढने के मुकाबले बेहद कम )

'' नहीं कुछ खास नहीं।''
वैसे ये जो चाहती हैं ढूंढ ही लेती हैं। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा। वे मुस्कुरा दीं।

मुझे अचानक याद आ गया, मैं ने पूजा से कहा था एक दिन- पूजा, पत्नी शब्द से मुझे डर लगता है क्या है ऐसा इस शब्द में, जो हमें सारे रिश्तों से तोड देता हैक्यूं इस शब्द को इतनी ज्यादा जगह की जरूरत होती है? और क्यूं प्रेम एक छोटी सी जगह के लिये भी राजी हो जाता है? पूजा, क्यों डरते हैं दोनों एक दूसरे से?

'' आप आई नहीं पिछले दिनों तो मैं ने सोचा आप बाहर गई हैं।''

मैं बाहर ही चली गई हूँ, तुम्हारे जीवन के एकदम बाहरमुझे अन्दर आने की अनुमति चाहिये क्या मिलेगी? मेरा गला भर आया

'' मैं चाय के लिये बोल कर आती हूँ। वे सहसा उठीं और अन्दर चली गईं।'' अब मैं ने उनकी तरफ देखा
''
आय एम सॉरी'' मैं ने सिर्फ इतना कहा और आँसुओं की बाढ अा गई।
''
डोन्ट बी सिली, तुम्हें कभी मुझे सॉरी कहने की जरूरत नहीं, तुम इतना क्यूं सोचती हो? ''

उन्होंने अत्यंत कोमल स्वर में कहा और मुझे लगा, जैसे किसी ने कोई बोझ मेरे कन्धों पर से उतार दियातुम सिर्फ इस शब्द ने मुझे अंधेरों से निकाल कर रोशनी की दुनिया में खडा कर दियामैं उनकी तरफ देखना चाहती थी, मैंने एक गहरा पल निकाल कर कृतज्ञ हो उन्हें देखा और सहज और आश्वस्त हो गईहममें से फिर किसी ने कुछ नहीं कहाएक लडक़ा आया और उसने सेन्टर टेबल पर पानी रख दियामैंने हाथ नहीं बढाया, वह चला गयावे फिर अंदर आईं और बैठ गईं

वे अपने कॉलेज में सम्पन्न हुई किसी मीटींग की बातें करने लगेइस बीच वही लडक़ा आकर चाय रख गया और हमने एक साथ खत्म की

अब मुझे उठना चाहिये, मैं ने सोचा और उनसे इजाजत मांगते हुए खडी हो गईवे दोनों भी खडे हो गए

'' आपने ट्रक के लिये कह दिया था न? कोई आया नहीं बात करने।'' सहसा उनकी पत्नी ने इनसे कहा, वे मानो किसी नींद से जागे-
''
अरे, मुझे तो याद ही नहीं रहा।''
''
देखो'' उन्होंने नाराज होते हुए मानो मुझसे शिकायत की
''
अगले हफ्ते जाना है और इन्हें याद नहीं।''
''
अगले हफ्ते? ''  पर छुट्टियों में तो अभी देर है। मैं ने आश्चर्य से कहा। और इनका सामान कहाँ ले जाना है ट्रक में? कहना चाहा पर कहा नहीं।
''
क्या आपके कॉलेज में किसी को मालूम नहीं कि हम जा रहे हैं? ''

उन्होंने कुछ हैरत से उन्हें देखकर कहा

'' जा रहे हैं? क्यूं? '' बेवकूफों की तरह मेरे मुँह से इतना ही निकला।
''
अरे, हम तो सिर्फ तीन महीनों के लिये आए थे, इन्हें बुलाया गया था खासतौर सेअब बस परीक्षाएं खत्म हो रही हैं इनका काम भी खत्म।''

एक प्लेन उंचाई पर जाकर फूट जाता है

अचानक कैसे खाली हो गई ये दूर-दूर तक फैली सडक़ें
। जहाँ लोग थे, शोर था, फूल और सपने थेहरे भरे पेड थे चारों तरफ चिडियां और कबूतर के घोंसले थे शाखों पर जो हवा के डर से कस कर चिपके रहते पेडों पर जबरदस्त संभावना से भरे हुए अण्डे थे, हल्के भूरे, चितकबरे, र्म नाजुक गरमायी सेकते जीवन लेते आतुर और उत्सुक नदियां-जंगल थे, इनके हजारों रंग थेये क्या हो गया कि चारों तरफ बिछे पहाडों के सिवा कुछ नजर नहीं आता। यँहा खुशियाँ चिडियों की तरह फुदकती-चहकती थींइस डाल से इस डाल, सिर्फ एक तिनके के लियेकहाँ गईं सब? सिर्फ एक आदमी जा रहा है और सब कुछ खत्म हो गया? कहाँ है वह? उसकी पीठ भी नहीं दिखाई दे रही , सिर्फ उसके जाते हुए कदमों की आहट सुनाई दे रही हैकितनी साफ है वह आवाजधाड-धाड क़ही पसलियों में बजती हुईबस करो मेरी पसलियाँ टूट रही हैंबस करोकितना सितम और करोगे, क्या किया है मैं ने सिर्फ प्यार? ओ खुदाया, सिर्फ इसी के लिये तूने इतनी सजा तजबीज क़ीवो देखो जाता हुआ संसार जाते हुए संसार की पीठ देखी है मैंने? कुछ भी तो नहीं देखा मैंनेकब मैं संसार के मध्य थी और कब वह मुझे छोड क़र चला गया। कहाँ देख पाई मैं ठीक से अरे अब मैं इन खाली सडक़ों पर क्यूं भागी जा रही हूँ? किसे पकडना है? और अगर पकड लूं - क्या अब भी कोई उम्मीद बाकि है?

प्लेटफार्म पर पैर रखते ही मैं ने इधर-उधर देखा दूर तक कोई नहीं दिखा सिवाय भीड क़े और मैं चलने लगीजब से तुम मिले चल ही तो रही हूँ लगातारएक वरदान की तरह लगता रहा वह चलना और आज उसकी मियाद खत्म हो रही हैभीड क़ा एक रेला है उसके और मेरे बीच हमेशा मैं ने पार किया था आज भी कर रही हूँ और दूर से ही देख लिया मैं ने उन्हें भीड में खोया-खोया सा स्वप्निल चेहरा जिससे मेरी जन्मों की पहचान है इसका एक-एक रेशा, एक-एक उतार-चढाव जिसे मैं ने हजारों बार छुआ और जो आज तक अस्पर्शित है

मैं खडी रह गई वहींपुकारना चाहती थी मैं उसे, आवाज देना चाहती थी, लहर की तरह दूर जा रहा है, भीड क़े समंदर में वह मुझसेउसके कंधों पर एक छोटा बैग टंगा देखा है मैंने क्या-क्या ले जा रहे हो तुम? मेरी हंसी के टुकडे, मेरी उदासी के पल, मेरी कविताएं, मेरे रंगीन लम्हेऔर क्या-क्या?

वे अन्य प्रोफेसर्स से बात कर रहे थे जब मैं उनके नजदीक पहुंचीसबने चौंक कर मुझे देखामैं ने सभी को एक साथ विश किया

'' अरे, आप उन्होंने बहुत धीरे से कहा। मैं ने उनकी तरफ देखा, कहा कुछ नहीं। मेरे पैरों के नीचे लम्बी अंधेरी सुरंग में से जैसे एक धू-धू करता ज्वालामुखी बाहर आने को छटपटा रहा था।वह लगातार धक्का दे रहा था नीचे से और मैं खुद को पलभर भी सरकने नहीं दे रही थी।

मैं जरा दूर खडी रह गईवे चलते हुए मेरे करीब आए मैं ने उनकी आँखों में देखा- एक तीव्र आवेग उठा अंदर से, कस के गले लगा लूं, कुचर्लमसल डालूंखुद कोइसेहड्डी से हड्डी मज्जा से, मज्जा खून से, खून मिल कर एक हो जाए असहनीय वेदना से मैं ने अपनी आँखे परे कर लींमैं जनती हूँ वे मेरी तरफ देख रहे हैंमैं प्लेटफार्म पर आती-जाती भीड क़ो कुछ पल यूं ही गुजर गए

'' मैं जानता हूँ, तुम मुझसे नाराज हो।''

नहीं, नहीं! नहीं जानते तुमकुछ नहीं जानते अगर जानते तो इस तरह? बिना कहे, बिना सुने कुछ भी कौन किसको जान सका है, कोई नहीं, कुछ नहीं मैं ने उनकी तरफ नहीं देखा

'' शिरीन, इधर देखो ''

मेरे अन्दर सब कुछ लडख़डा गया पल भर में जो इतने दिनों साध-साध कर खडा किया थामैं ने उनकी तरफ देखा, आह इस चेहरे को छू लेने की इस अदम्य कामना के सम्मुख मैं हार चुकी हूँ।

'' तुम्हें तो ऐसा लगता है न कि मैं कुछ नहीं जानता हूँ! ''

तत्काल मेरी आँखे भर आईंमैं ने पलकें झुका लीं नहीं , यँहा नहीं

'' शिरीन वह आवाज क़ि जिसने यकबयक मेरे होंठ आकर छू लिये। मैं सिहर उठी। जोर से हवा चली, सूखे पत्ते झरने लगेझरते रहेमेरे चारों ओर सूखे पत्तों का ढेरबीच में अकेली खडी मैं... ''

'' नथिंग, द ऑटम फॉल लीव्स.. ''
''
अच्छा तुमने लूथर बुरबांक के बारे में सुना है? ''

मैं ने अपनी सिहरती देह संभालते हुए उनकी तरफ देखा, कहा कुछ नहीं-

'' वह बातें करता था पौधों से बीजों से.. वह एक पागल अमरीकी था, वृक्षों और पौधों का प्रेमी। उसे लगता पौधे सुन रहे हैं। लोग हँसते थे उस परफिर उसने कैक्टस पर एक प्रयोग किया सात वर्ष तकसात वर्ष बाद कैक्टस में एक नई शाखा उगी, बिना कांटों वाली। शिरीन तुम्हें लगता होगा मैं ने बहुत देर कर दी। कैक्टस ने सात वर्ष लागाए समझने में, मैं सात ही पलों में समझ गया था, पर उससे क्या होता है?

उसका चेहरा मेरे सामने धुंधला गया। आँसुओं की तीव्र बाढ हाय! अब कह रहे हो, जब मैं कुछ नहीं कर सकती, जब कुछ नहीं हो सकता

'' शिरीन कहने की कोशिशों में तुम खुद को बांट भी लेती हो, उसका क्या जो नहीं कह पाता।'' तभी वे चलती हुई हमारे बीच आ गईं। वे सहसा चुप हो गए। अपने बीच किसी की उपस्थिति का आभास पाकर मैं ने चेहरा उनकी तरफ मोडा, उनके होंठों पर मुस्कान है। मैं ने अपने होंठों का काँप कर फैलना महसूस किया।

उनके भूरे बाल धूप में चमक रहे हैंउनकी दुबली-पतली देह पर प्रिंटेड साडीछोटे-छोटे काले फूलउन्होंने इनसे कुछ कहा, फिर मुझसेमैं ठीक से सुन नहीं पाई