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  शुतुरमुर्ग

लौटा तो चार बज चुके थेछ: बजे गाडी ज़ाती थी वह सिर तक ओढे चारपाई पर लेटी हुयी थीसारे दिन की भाग दौड से मैं थक गया थाधम्म से सोफे पर बैठ गया, इससे वह चौंकी और रजाई हटा कर मुँह खोलाउसका चेहरा लाल था शायद बुखार रहा होदिन भर के कार्यकलाप के बारे में मैं ने उसे बतायाकहा कि सब कुछ ठीक - ठाक हो गया है और परसों वह स्कूल ज्वाईन कर लेस्कूल जाने के पहले वह परिषद् के दफ्तर में बडे बाबू से मिल लेप्रधानाध्यापिका के नाम बडे बाबू एक आदेश दे देंगे, जिससे प्रधानाध्यापिका उसे ज्वाईन करने से नहीं रोकेगीझगडे वाले पिछले दो महीनों के वेतन के लिये भी वह पूरा केस बना कर निदेशालय को संस्तुति के साथ भेज देंगे, जहाँ वह स्वीकृत हो जाएगाउसने हल्की सी शंका प्रकट की कि कहीं परसों उसे फिर दिक्कत न हो; किन्तु मैं ने उसे आश्वस्त किया कि कार्यकारी अधिकारी से बात हो चुकी है, सारी चीजें तय हो चुकी है और अब इसमें कोई संशय नहीं हैवह निश्चिंत हो गई

मैं ने पूछा
- ''क्या बात है, कुछ तबियत खराब है? ''
''सिर में दर्द है, शायद बुखार भी है
''
मैं ने उसका सिर दबाया
विक्स लगाईमैं बडे असमंजस में था इस हालत में जाने को कैसे कहूँ। किन्तु रुकना मंहगा पड सकता थाघर में झगडा होने का खतरा था अत: अपराधबोध को दबा कर मैं ने सकुचा कर कहा, ''मेरी गाडी क़ा समय हो रहा है''

'' कल तो इतवार है, क्या करेंगे अभी जाकर? ''
''
दो दिन हो चुके हैं घर से आये। छुट्टी में रुकने का कोई औचित्य भी नहीं है।''
''
दरअसल आप ऊब जाते हैं। मुझसे पिण्ड छुडा कर भागते हैं।''
''
नहीं। तुम मेरी दिक्कत जानती हो। यों ही घर में झगडा होता है, देर करने से और गडबड होगी।''
''
मैं नौ साल से आपके साथ हूँ। आखिर मेरा भी तो कोई हक है। वह तो घर में बैठी है बच्चों के साथ, इज्जत और सारी सामाजिक गरिमा के साथ। यहाँ मैं बीमार हूँ, अकेली हूँ। हर त्यौहार-पर्व पर रोती रहती हूँ। मेरे बच्चे इधर-उधर लोगों का मुँह देखते रहते हैं। मैं आज आपको नहीं जाने दूंगी।''
''
जाना तो एकदम जरूरी है।''
''
मैं नहीं जाने दूंगी।''
''
अगर फिर न आना होता तो बात और थी। मैं जल्द ही आऊंगा।'' मैं ने समझाया।
''
मेरा सिर फटा जा रहा है, मुझे तंग न करो।''
''
मैं चला जाऊंगा तो दर्द ठीक हो जाएगा।''
''
इसके मायने कि मैं नाटक कर रही हूँ! ''
''
नहीं। दर्द इस झगडे क़ो लेकर है जो हम लोगों के बीच है। जाने से चूंकि समस्या ही मूल से खत्म हो जाएगी, दर्द भी जाता रहेगा।''
''
चाहे कुछ कहो मैं नहीं जाने दूंगी।''
''
जाँऊगा तो जरूर। तुम हर बार ऐसे ही लडती हो।''

मैं ने अटैची उठाईतब तक साढे पाँच बज चुके थेदेर करने से गाडी छूट सकती थी
'' चलिये, आपके पीछे-पीछे मैं भी आती हूँ। देखती हूं कैसे जाते हैं! कोई तमाशा है चाहे जब चले आए, चाहे जब चल दिये। कोई जिम्मेदारी कोई फर्ज नहीं।''
''
तुम ऐसे ही लडती हो। पागल हो। तुम्हें कोई बहाना चाहिये।''

'चारपाई से वह उठे इसके पहले ही मैं चल दियाकुछ दूर पर रिक्शा मिला स्टेशन पहुंचातो गाडी क़ा समय हो चुका थाकिन्तु गाडी आधा घण्टा लेट थीमुझे भूख लगी थीस्टेशन के जलपागृह में पूडियाँ लेकर मैं खाने लगातभी जाली के दरवाजे से वह दिखाई दी प्लेटफार्म पर तेज़-तेज़ चलती हुई, बौखलाई सी, पागल सी, बदहवास और अस्त-व्यस्त सीमैं ने उसे पुकारा पूडियाँ खाने को कहाउसने इनकार कर दिया पैरों के पास रखी अटैची उसने उठा ली

''बोली, चलिये घर''
''तुम समझती क्यों नहीं कि मेरा जाना कितना जरूरी है
''
''मैं कुछ नहीं समझती पर आप वापस चलिये
''
''मैं नहीं
जाँऊगालाओ अटैची दो''
''अटैची नहीं
दूँगी।''
''क्यों बेमतलब की बात करती हो? मैं दो-तीन दिन में फिर
आऊँगा''
''कल इतवार है
आप दफ्तर जाने का बहाना भी नहीं कर सकतेचलिये वापस''

मुझे गुस्सा आता जा रहा थागुस्से को दबा कर धीमी किन्तु सख्त आवाज में मैं ने कहा,'' अटैची दो।''
 ''नहीं दूँगी।''
 ''मैं ऐसे ही चला जाँऊगा।''
 ''चले जाओ।''

गाडी आने ही वाली थीस्टेशन पर हलचल बढ ग़ई थी मुसाफिर सतर्क हो गये थेकुलियों ने भागा-दौडी रम्भ कर दी थी जब गाडी स्टेशन पर आ लगी तो मैंने फिर अटैची मांगी पर उसने इनकार कर दियागाडी क़ेवल पाँच मिनट ही रुकती थीजब गाडी चलने लगी तो मैं एक डिब्बे में चढ ग़याचढ तो मैं गयाकिन्तु सोचा कि घर पहुँच कर झगडा होगालाख बहाना करुंगा किन्तु पत्नी यही कहेगी कि, उसी के पास गये होंगे; अटैची वहीं छोड आए होंगेअत: चलती गाडी से मैं उतर आया तब तक गाडी क़ो चलता देख वह प्लेटफार्म से बाहर निकल चुकी थीजब मैं प्लेटफार्म के बाहर पहुंचातो वह रिक्शे में अटैची रख कर बैठने जा रही थी

मुझे देख कर बोली,''आइए, बैठिये''
''मैं घर नहीं
जाँऊगामैं एक तरफ चल दिया'' अटैची उठाए वह भी मेरे पीछे-पीछे पैदल चल दीमैं बहुत गुस्से में था

'' तुम बडी बेशर्म हो। खुदगर्ज हो, नीच हो। केवल अपनी ही बात सोचती हो।''
''
घर चलिये। बाजार में लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे।? घर पर चाहे कुछ कहियेगा।
नहीं जाँऊगा। तुमको शर्म नहीं आती। जिन्दगी तबाह कर दी तुमने।''
''
घर चलिये।''

एक दुकान पर मैं ने कुछ पत्रिकाएं खरीदी और फिर प्लेटफार्म पर आ गयावह मेरे पीछे-पीछे थीअटैची भारी थीउसे बुखार थावह हांफ रही थीमैं ने सोचा यह इस हालत में कैसे अटैची ढोएगीकहा, ''तुम थक गई होगी, अटैची मुझे दे दो'' पर वह नहीं मानीप्लेटफार्म पर मैं एक बैन्च पर बैठ गयावह भी मेरे पास बैठ गई दूसरी गाडी साढे आठ बजे आती थीलगभग आठ बज रहे थे कहा,  ''देखो एक गाडी छूट चुकी हैसाढे आठ बजे वाली गाडी से मुझे चले जाने दो''

'' मैं नहीं जाने दूंगी। क्यों नहीं रहते मेरे साथ कुछ दिन? मुझसे अकेले नहीं रहा जाता बीमार रहती हूँ। बच्चे तंग करते हैं। घर संभालो, पांच मील सायकिल से स्कूल जाओ और लौटो।''
'' तुम बिलकुल बेवकूफ हो।''
''
मैं बेवकूफ ही सही, पर घर चलो। अगर न गए तो मैं भी आज इसी गाडी क़े नीचे कूद कर जान दे दूँगी।''

मेरे क्रोध का पारावार न रहा लगा कि यह सोचती ही नहीं मेरी मजबूरी और दिक्कत को समझना नहीं चाहतीकेवल अपनी बात करती है

'' दे दो जान। मर जाओ।रोज़-रोज़ के झंझट से तो मुक्ति मिले।''
''
मैं तो पहले ही मर जाती। इसीसे बचती रही कि कहीं आप न फंस जाएं।''
''
मेरी चिन्ता न करो। जो भी होगा एक ही बार न होगा! भुगत लूंगा। दो-चार, दस-बीस हजार रुपया ही तो खर्च होगा, झगडा तो खत्म हो जायेगा। आज तुम्हारी रोटी की समस्या, कल नौकरी की, परसों मकान की, फिर बच्चों की, फिर बीमारी। रोज कुछ न कुछ।''
''
मैं क्या अपने आप समस्या पैदा करती हूँ? कौन सुखी हूँ इस तरह आपके साथ? मैं तो उस समय को कोसती हूँ ज़ब आपको देखा था। सब कुछ तबाह हो गया। इस दयनीय हालत में पहुंचा दिया आपने। कहीं कुछ नहीं है। मेरा पति, माँ-बाप सब छुडवा दिये। बच्चे बडे होंगे तो वे भी गाली देंगे। कहेंगे - हमारी माँ चरित्रहीन थी। सारी दुनिया भी बच्चों पर थूकेगी। ताने देगी कि इनकी माँ कलंकिनी थी, अपने आदमी को छोड क़र सरे आम दूसरे के साथ रहती थी।''
''
क्यों क्या बहुत अच्छी हालत में आईं थीं तुम मेरे पास? याद है उस दिन ट्रेन में भिखारिन को देख तुमने कहा था कि ऐसी ही हालत तुम्हारी भी हो जाएगी।''
''
आपको यही तो दुख है कि मेरी वैसी हालत नहीं हुई।''
''
तुम एकदम कमीनी हो। इस तरह सोचती हो।''

हम लोग कुत्तों की तरह झगडने लगे थेसारे तर्क खत्म हो गए थे केवल गुस्सा ही बाकि था और विरोध के लिये विरोधहम लोग भूल गए थे कि पिछले नौ वर्षों में हमने कितने दुख उठाए थेइस धर्मशाला से उस होटल, इस शहर से उस शहर भागते रहे थेदुनिया और समाज की निरकुंश और कुटिल वृत्तियों से साथ लडते रहे थेकितने संघर्ष के बाद, जिल्लत और अपमान सहने के बाद यहाँ पहूँचे थे कि किसी तरह उसके पास एक नौकरी थी और सिर छिपाने के लिये एक छतहम भूल गए थे कि कितने मकानमालिकों ने किस-किस प्रकार बेइज्जत करके हम लोगों को मकानों से निकाला था और कितनी नौकरियाँ उसे छोडनी पडी थीं पर शायद हम लोग टूट चुके थे शायद वह मुझे सम्पूर्ण और अकेले चाहती थीवह नहीं चाहती कि मैं किसी भी दूसरी स्त्री के पास जाँऊ। और घर में मेरी पत्नी थी

वह बोली,  ''जीते जी नहीं जाने दूँगी।''
हर प्रयत्न विफल हो चुका था
मैं ने कहा,  ''एक शर्त पर रुक सकता हूँ कि तुम सुबह आठ बजे की गाडी से जाने से नहीं रोकोगी''
''ठीक है, पर आप रात में घर पर झगडियेगा नहीं
आप तो गाली देकर, मुझे अपमानित करके चले जाते हैंकभी सोचा है कि पीछे कैसे जिन्दगी ढोती हूँ? मैं थक गई हूँ, तंग आ गई हूँ। बच्चों को इस तरह नहीं देखा जाता बेचारा दस वर्ष का लडक़ा खाना बनाता है, पानी लाता है, बाजार से सामान लाता है, बर्तन साफ करता हैअब मुझसे नहीं होता यह सब कुछयह तो नहीं होता आपसे कि मुझे कुछ सहारा देंउपर से डाँटते हैं इतनी तंगी है कि एक पैसा हाथ में नहीं हैआपसे भी कहाँ तक कहूँ? कितना करें आप भी? माँ ने आने को लिखा हैपिछली बार जब आई थी तब भी घर में कुछ नहीं थाउसी ने सारा खर्चा किया थाबच्चों से लोग तरह-तरह की बातें करते हैंवह जो वकील है बडे से पूछ रहा था, तुम्हारे कितने बाप हैं दोनों बच्चे झगडते रहते हैंमुझसे उठा नहीं जाता छोटे के जूते बिलकुल फट गए हैं स्कूल नहीं जा पा रहालोगों को क्या जवाब दूँ? कहते हैंरखैल की तरह रहती है फिर भी इस तरह फटेहाल! रखैल शब्द सीने में गोली की तरह लगता हैमैं ने तो प्यार में शहीद हो जाने के, मर-मिट जाने के सपने बुने थे; पर कहाँ पहुँच गई मैं? पिताजी के न रहने से एकदम अनाथ महसूस करती हूँ। वैसे भी वो जब थे तो तभी क्या कर सकते थे? न देख पाते थे, न चल-फिर पाते थेफिर भी एक भरोसा-सा था लगता था कोई हैएक-एक करके दाँत गिरते जा रहे हैंडॉक्टर ने एक्सरे को कहा है सीने में दर्द रहता है और बुखार भी क्या करूं? आप तो कुछ कहते नहीं, बस डाँटते रहते हैं आपकी परेशानी समझती हूँ। फिर भी मैं बहुत दिन नहीं रहूँगी आपको तंग करने के लियेमेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा? इस बेगैरत जिन्दगी का क्या अर्थ हो सकता है?''

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