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लौटा तो चार बज चुके थे।
छ: बजे गाडी ज़ाती
थी।
वह सिर ''
कल तो इतवार है,
क्या करेंगे अभी
जाकर? '' मैं ने अटैची उठाई।
तब तक साढे
पाँच
बज चुके थे।
देर करने से गाडी
छूट सकती थी। 'चारपाई से वह उठे इसके पहले ही मैं चल दिया। कुछ दूर पर रिक्शा मिला। स्टेशन पहुंचातो गाडी क़ा समय हो चुका था। किन्तु गाडी आधा घण्टा लेट थी। मुझे भूख लगी थी। स्टेशन के जलपानगृह में पूडियाँ लेकर मैं खाने लगा। तभी जाली के दरवाजे से वह दिखाई दी प्लेटफार्म पर तेज़-तेज़ चलती हुई, बौखलाई सी, पागल सी, बदहवास और अस्त-व्यस्त सी। मैं ने उसे पुकारा। पूडियाँ खाने को कहा। उसने इनकार कर दिया। पैरों के पास रखी अटैची उसने उठा ली। ''बोली,
चलिये घर।''
मुझे गुस्सा आता जा रहा था।
गुस्से को दबा कर
धीमी किन्तु सख्त आवाज में मैं ने कहा,''
अटैची दो।'' गाडी आने ही वाली थी। स्टेशन पर हलचल बढ ग़ई थी। मुसाफिर सतर्क हो गये थे। कुलियों ने भागा-दौडी आरम्भ कर दी थी। जब गाडी स्टेशन पर आ लगी तो मैंने फिर अटैची मांगी पर उसने इनकार कर दिया। गाडी क़ेवल पाँच मिनट ही रुकती थी। जब गाडी चलने लगी तो मैं एक डिब्बे में चढ ग़या। चढ तो मैं गया। किन्तु सोचा कि घर पहुँच कर झगडा होगा। लाख बहाना करुंगा किन्तु पत्नी यही कहेगी कि, उसी के पास गये होंगे; अटैची वहीं छोड आए होंगे। अत: चलती गाडी से मैं उतर आया। तब तक गाडी क़ो चलता देख वह प्लेटफार्म से बाहर निकल चुकी थी। जब मैं प्लेटफार्म के बाहर पहुंचातो वह रिक्शे में अटैची रख कर बैठने जा रही थी। मुझे देख कर बोली,''आइए,
बैठिये।'' ''
तुम बडी बेशर्म हो। खुदगर्ज
हो,
नीच हो। केवल अपनी ही बात
सोचती हो।'' एक दुकान पर मैं ने कुछ पत्रिकाएं खरीदी और फिर प्लेटफार्म पर आ गया।वह मेरे पीछे-पीछे थी। अटैची भारी थी। उसे बुखार था। वह हांफ रही थी। मैं ने सोचा यह इस हालत में कैसे अटैची ढोएगी। कहा, ''तुम थक गई होगी, अटैची मुझे दे दो।'' पर वह नहीं मानी। प्लेटफार्म पर मैं एक बैन्च पर बैठ गया। वह भी मेरे पास बैठ गई। दूसरी गाडी साढे आठ बजे आती थी। लगभग आठ बज रहे थे। कहा, ''देखो एक गाडी छूट चुकी है। साढे आठ बजे वाली गाडी से मुझे चले जाने दो।'' ''
मैं नहीं जाने दूंगी। क्यों
नहीं रहते मेरे साथ कुछ दिन?
मुझसे अकेले नहीं
रहा जाता बीमार रहती हूँ। बच्चे तंग करते हैं। घर संभालो,
पांच मील सायकिल से
स्कूल जाओ और लौटो।'' मेरे क्रोध का पारावार न रहा। लगा कि यह सोचती ही नहीं । मेरी मजबूरी और दिक्कत को समझना नहीं चाहती। केवल अपनी बात करती है। ''
दे दो जान। मर जाओ।रोज़-रोज़
के झंझट से तो मुक्ति मिले।'' हम लोग कुत्तों की तरह झगडने लगे थे। सारे तर्क खत्म हो गए थे। केवल गुस्सा ही बाकि था और विरोध के लिये विरोध। हम लोग भूल गए थे कि पिछले नौ वर्षों में हमने कितने दुख उठाए थे। इस धर्मशाला से उस होटल, इस शहर से उस शहर भागते रहे थे। दुनिया और समाज की निरकुंश और कुटिल वृत्तियों से साथ लडते रहे थे। कितने संघर्ष के बाद, जिल्लत और अपमान सहने के बाद यहाँ पहूँचे थे कि किसी तरह उसके पास एक नौकरी थी और सिर छिपाने के लिये एक छत। हम भूल गए थे कि कितने मकानमालिकों ने किस-किस प्रकार बेइज्जत करके हम लोगों को मकानों से निकाला था और कितनी नौकरियाँ उसे छोडनी पडी थीं। पर शायद हम लोग टूट चुके थे। शायद वह मुझे सम्पूर्ण और अकेले चाहती थी। वह नहीं चाहती कि मैं किसी भी दूसरी स्त्री के पास जाँऊ। और घर में मेरी पत्नी थी। वह बोली,
''जीते जी नहीं जाने
दूँगी।'' |
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