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कर भला होगा भला

रेलवे स्टेशन जकर ज्ञात हुआ महानगरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से दो घंटे लेट है

'' मैने तो फोन कर इन्क्वाइरी से पता कर लिया था महानगरी दो घंटे लेट है पर आप माने ही नहीं बाबूजी। इतनी जल्दी चले आये।'' बडा पुत्र एकनाथ उकताया हुआ है।
''
वे इसलिए कि कई बार ये इन्क्वाइरी वाले सूचना देते है य कि घंटी बजती रहती है और यह लोग उठाते ही नहीं है। इस देश जैसी अव्यवस्था और अनियमितता कहीं नहीं है। जल्दी आ गये हैं तो बहुत नुकसान नहीं हो जायेगा। ट्रेन छूट जाती तो जरूर।'' किसी को कहीं आना-जाना हो तो बाबूजी इसी तरह हडबडाते हुए एक शीघ्रता से भर जाते है।
''
उफ् इस गर्मी और भीड में दो घंटे बिताना बहुत कठिन है।'' मंझले पुत्र ओंकार ने रूमाल से पसीना पोछते हुए प्लेटफॉर्म की छत की ओर ताका। पंखा पूरी क्षमता से चल रहा था। असर नहीं डाल पा रहा ये अलग बात है।
बाबूजी अम्मा को संबोधित करते हुए बोले - '' मुंह फाडे ईथर-उधर देखती खडी न रहो। जैसे आज से पहले स्टेशन नहीं देखा है। इस बिस्तर के ऊपर बैठ जाओ और सामान की निगरानी करों। श्टेशन पर गिरहकट, चोर उचक्के फिरते रहते है।''
''
हमें न सिखाओ।'' अम्मा तुनक कर कुशल गणितज्ञ की भांति तर्जनी दिखा-दिखा कर सामान गिनने लगी - '' पूरे नौ नग है।''

ग्रीय्मावकाश में आई अम्मा की पुत्री अम्बुज अपने दो बच्चों यशा और संयोग को लेकर अपने पति के पास लौट रही थी अम्मा स्नेहवश सामानों की गिनती बढाती गई है

'' ट्रेन में इतना सामान चढाना मुश्किल होगा। आज कल की भीड देख रही हो। यशा और टोबू साइकिल बेकार ले जा रहे है फिर कभी भेज देते।'' छोटा पुत्र तिलक बोला।।
''
मैं साइकिल ले जाऊंगी। यहां ओम और देव चला-चला कर तोड देंगे।'' यशा पैर पटक पटक कर मचलने लगी। ये टोबू साइकिल उसे नानाजी ने खरीद कर दी। आरक्षण नहीं मिला इस कारण से वह साइकिल नहीं छोड सकती।
अम्मा ने कह दिया -'' हो गया, ले जाओ साइकिल। जैसे इतना सामान जायेगा वैसे ही ये भी चली जायेगी।''
तिलक फुंफकारा -'' अम्मा तुम तो रोती हुई अम्बुज दीदी के गले मिलती हुई एक तरफ खडी हो जाओगी। सामान तो हमें चढाना होगा न।''
अम्मा ने आंचल संभाल कर जोर से हुंह किया और मुंह फेर कर बैठी रही। बाबूजी ने खल्वाट खोपडी पर हाथ फेर कर अम्मा को घुडक़ा - ''तुम्हारा पुत्री प्रेम भी गजब है। बांध लाई हो गेंहू चावल दाल की बोरियां।''
''
तो क्या हुआ? यहां इतनी खेती होती है और वहां बच्ची को अनाज खरीदना पडता है। कौन सा मूड में धर कर ले जाना है।'' अम्मा अपनी पर अडी थी।
''
आजकल रेलों में इतनी भीड होती है कि आदम चढ ज़ाये यहीं बहुत है।'' बडी बहू स्नेह ने मुंह खोला।
''
तुम चुप रहो स्नेह।'' अम्मा ने दांत पीसे। इकलौती लाडली अम्बुज निर्धारित समय से एक सप्ताह पहले लौट रही है वह भी बिना आरक्षण के। अम्मा का मन भारी है और उन्हे किसी के तर्क वितर्क सुहा नहीं रहे है।

स्टेशन पर उफनाती बिलबिलाती उन्मादी भीड बाबूजी चारों ओर मुण्डी घुमाकर खुफिया दृष्टि से प्लेटफॉर्म पर बिछी भीड क़ो निहार रहे हैभीड वैसे ही प्लेटफॉर्म में समा नहीं रही है जैसे पतीले में उफनता हुआ दूधबाबूजी को सभी चेहरे शातिर चोर दिख रहे हैवे बार बार अम्बुज को समझा रहे है कि उसे कितने सर्तकता से स्फर करना है -

'' देख बिटिया, तू रात में सोना मत। द्यौसे तो तिलक भी जा रहा है पर इसका जाना न जाना बेकार है। ट्रेन चली कि ये सोया। ऐसी कुंभकरणी नींद है कि पूछो मत।''

पति की निंदा सुनकर तिलक की पत्नी सोनी ने बुरा सा मुंह बनाया

'' आप चिन्ता मत करो बाबूजी। बस ट्रेन में जगह मिल जाए बाकी मैं संभाल लूंगी पर मुझे नहीं लगता कि जगह मिलेगी। भीड देखिये न।'' अम्बुज चिन्तित है।

कल रात फोन आया था कि उसके पति को कई दिनों से ज्वर आ रहा है और उसे तुरन्त बुलाया हैबहुत भाग दौड क़े बाद भी आरक्षण नहीं मिल पाया

'' सब हो जायेगा। इस भीड में जाने वाले कम होगें और इन जाने वालों को विदा करने वाले अधिक होगें। चले आते है भीड बढाने।'' बाबूजी कह ऐसे रहे थे जैसे स्वयं अकेले आये हो।

अन्बुज को स्टेशन पहुंचाने पूरा कुनबा न आये तो बाबूजी को गौरव अनुभव नहीं होताअम्मा रिसा जाती है कि किसी को लडक़ी से प्रेम नहीं हैबडी बहू स्नेह व उसकी तीन लडक़ियां, मंझली बहू रमा व उसके दो बच्चे बबली और बालू, छोटी बहू सोनी व उसके तीन बच्चे ओम देव व साल भर का राजू अम्बुज को विदा करने इतने लोग आये हैलाये गये है कहना अधिक उपयुक्त्त होगाएकनाथ आरक्षण मिलने की आशा में निरंतर टी सी के पीछे भाग रहा थाबात बनती नहीं दिखती थी बाबूजी ने देश को कोसा -

'' मुझे लगता है पूरे देश को आज ही यात्रा करनी है।''
''
सब अपने-अपने काम से जाते है बाबूजी। हम बेकार ही इतनी जल्दी आये।'' ओंकार अभी भी जल्दी आने पर अडा हुआ है।
''
मैं देखता हूं वेटिंग रूम में जगह हो तो।'' तिलक वेटिंग रूम की ओर चला। यशा और संयोग पीछे लग गए।

इधर ठेले पर इडली डोसा समोसा नमकीन चिप्स फुल्की सजाए रेहडी वाले आ-जा रहे हैबच्चे चिल्लाने लगे अंकल चिप्स लेंगेबाबूजी को स्टेशन से सामान खरीदना पसंद नहीं है पर बाल हठ विवश किये देता हैचार पैकेट अंकल चिप्स खरीदे गएबच्चे पैकेट शेयर करने को तैयार नहीं हो रहे थेसबको एक एक पैकेट दिला कर समस्या का निदान ढूंढा गयाअम्मा गुस्सा गइ - ''दिन भर खाते है फिर भी इनका पेट नहीं भरता हैसौ रुपये स्वाहा हो गए'' बच्चे खाने में तल्लीन हैअम्मा की डांट से बेअसर सभी बच्चों की माताओं ने स्वीकार किया कि ऐसे नालायक बच्चे कहीं ले जाने लायक नहीं है

तिलक वेटिंग रूम से लौट आया -'' वहां तो पैर रखने की जगह नहीं है''
''उफ्! बाबूजीने रूमाल से खलवाट शीश का पसीन पोछा
बाबूजी की अधीरता पर रमा और स्नेह अथरों में मुस्कराई
एकनाथ एक कुली पकड लाया -'' सुनो ये सामान है, महानगरी की जनरल बोगी में चढाना है
''
'' जी साब
''
'' और हां, ट्रेन आये तो यहीं रहना, ये नहीं कि तुम्हे ढूंढना पडे
''
''नहीं साब
आप बेफिकिर हों'' कुली ने चारो ओर देखकर कुछ जायजा लिया फिर बोला -
'' उधर आगे चलकर बैठिये, जनरल डिब्बा वहां आगे लगता है
''

एक मुसीबत औरसब किसी तरह चिप्स खाते बच्चों को हांकते सामान लादे निर्दिष्ट स्थान पर पहुंचेचिप्स खाकर बच्चों को प्यास लगी और घर से लाया गया पानी स्टेशन पर ही समाप्त हो गयाअम्मा ने कपाल थामा

'' इन लोगो की भूख प्यास हद् हो गई।''
''
लाओ डिब्बा पानी भर लाता हूं।''

ओंकार खाली डिब्बा लिए चला तो बबली और बालू साथ लग गयेपीछे पीछे ओम और देव भी स्नेह की लडक़ियां जुडवा और विरासत फिल्म के पोस्टर को मुग्ध भाव से निहार रही है और सलमान और अनिल कपूर की चर्चा कर रही हैइधर बाबूजी ने बहुओं को घुड़क़ा -

'' खडी क्या हो? संभालो बच्चों को। यहां बच्चा चोर गिरोह फिरते रहते है।''

सुनकर सोनी और रमा चिन्तित भावों से पंजो पर उचक उचक कर बच्चों को देखने लगीबच्चे भडि में कहीं लोप हो चुके थेभीड ज़ैसे नरमुण्डों का रेला आ जा रहा हैजाने कहां से आते है इतने लोग जैसे आने जाने के अतिरिक्त इन्हे कोई काम नहीं हैजहां तक दृष्टि जाए शीश तैरते दिख जाते हैसब किसी धुन में है उन्माद में हैरेहडी वालों के विभिन्न स्वर कनपटी फोडे ड़ालते हैपानी भर कर लौटे ओंकार के पीछे चारो बच्चों का जुलूस सकुशल लौट आयारमा ने चेतावनी दी,'' चलो सब चुपचाप यहां खडे हो जाओ वरना घर भेज देंगे''

बच्चों ने कुछ देर आज्ञाकारी भाव दिखाया पर उसकी चंचल प्रकृति उन्हे थिर नहीं रहने दे रही थी एकनाथ फिर टी सी के चक्कर काटने चल दियाएक ही जगह बिन किसी काम के खडे रहना उसकी प्रवृत्ति में नहीं हैतिलक ऊब रहा हैबुक स्टाल से जाकर इंडिया टुडे ओर यशा और संयोग के लिए कॉमिक्स खरीद लायाइंडिया टुडे बाबूजी ने झपट लीकुछ देर पंखे की भांति प्रयोग करते रहे फिर एक बोरी पर बैठकर उलटने पलटने लगे

कॉमिक्स को बच्चे ललचाई नजरों से देख रहे है और छीन झपट रहे हैस्नेह ने खीझकर अपनी मंझली बेटी शुभी को एक लप्पड मार दियास्नेह उद्विग्न है उसे अच्छा नहीं लगता कि बच्चों को अनावश्यक रूप से स्टेशन लेकर आया जाएवह बच्चों को लेकर घर पर रुकना चाहती थीअम्मा ने सुना दिया था -

'' स्टेशन तक जाते हुए पांव घिसते है तो मत जाओ। साल भर में बच्ची बेचारी आती है फिर भी तुम्हे खटकती है।''

और अब बच्चे आफत किए हुए हैशुभी को फ्राक से आंसू पोछते देख अम्बुज पसीजीजाने के क्षण भावुक होते है

'' क्या भाभी मार दिया बच्ची को। चलों मैं सबको कॉमिक्स दिलाती हूं।''

बाबूजी रोकते रहे इस अपव्यय के लिए पर अम्बुज सबको एक एक कॉमिक्स दिला लाईअम्मा की भौंहे कपाल पर टंग गई

'' बच्चों को लाओ तो ऐसा ही होता है। खर्च पर खर्च हुआ जाता है। ''
''
जाने दो अम्मा बच्चे है। '' अम्बुज उदारता से बोली।
अम्मा जारी रही - '' तेरे पास बहुत पैसा है तो फूंक डाल। और हां सुन मुन्नी(अम्बुज) वो थैला संभाल कर पकडना खाने का सामान रखा है गिर जायेगा तो सब उलट पलट जायेगा।
''
अम्मा तुम्हे खाने की पडी है और ये ट्रेन पता नहीं कब आयेगी। पता नहीं उनकी तबियत कैसी है।'' अम्बुज व्यग्रता में कदमताल सी करते हुए एक गति का प्रदर्शन कर रही है।
''
मैं पता करके आता हूं।'' कहता हुआ ओंकार पूछ ताछ दफ्तर की ओर चला गया।

किसी ट्रेन के आनेकी घंटी हो चुकी है एनाउन्समेन्ट में नारी स्वर उभरा -

'' यात्री कृपया ध्यान दे जबलपुर से चलकर निजामुद्दीन जाने वाली महाकौशल एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नम्बर एक पर आ रही है।''

बाबूजी ने मुंह पर उंगली रखकर सबको चुप रहने का संकेत किया और एनाउन्समेन्ट सुनकर बोले -

'' लो महाकौशल इतनी लेट आ रही है। इसे तो चार घंटे पहले आ जाना चाहिए। महानगरी पता नहीं कब आयेगी। मालूम होता है आज सब ट्रेन लेट चल रही है।''
ओंकार लौट आया '' महानगरी एक घंटे से पहले नहीं आयेगी।''
''
आज का नक्षत्र तो'' अम्मा आंचल से हवा करते हुए बोली।

महाकौशल प्लेटफॉर्म से आ लगी ट्रेन में बहुत भीड हैजनरल बोगियों में यात्री बर्र के छत्ते की भांति गुंथे हुये हैद्वार पर डण्डा पकडे ख़डे बैठे लटके लोगअम्बुज ने असहाय दृष्टि बाबूजी पर डाली'' यहीं भीड महाानगरी में होगी तो कैसे चढाेगी दीदी?'' सोनी पूछ रही हैअम्बुज चुप रहीशायद सुन नहीं सकी

प्लेटफॉर्म में होती चहल पहल ने झटका सा खायारेहडी वालों के स्वर तेज हो गएलोग उन्मादियों के उन्मान भाग रहे थेअपेक्षित डिब्बे ढूंढ रहे है एक सज्जन विदेश जा रहे है दिल्ली से फ्लाइट हैइन्हे विदा करने कई लोग आये हैगेंदे की मालाएं और कैमरे के फ्लैशविदा होते सज्जन अपनी सामर्थ्य भर हंसी और मुस्कान बांट रहे हैउधर कोई किसी की जेब काट कर भागा है और भीड क़ी एक टुकडी ज़ेबकतरे के पीछे लगी हैबाबूजी ने बहुओं को डपटा -

'' मुंह फाडे न खडी रहो अपने गहने संभालो। दस बार कहा है कि स्टेशन पर यह सब पहन कर मत आया करों।''

सुनकर तीनों बहुओं ने चैन, बाली, चूडियां टतोलते हुए बुरा सा मुंह बनाया

स्नेह ने कह डाला - '' बाबूजी आप ऐसी हडबडी मचाते है कि गहने उतारने का ध्यान ही नहीं रह पाता है''

बाबूजी नहीं सुन पायेउनका ध्यान जेबकतरे पर थामहाकौशल ने शनै: शनै: रेंगते हुए प्लेटफॉर्म छोड दियाजाने वाले लंद फंद कर चले गएउन्हे विदा करने आये लोग वापस लौट गएप्लेटफॉर्म कुछ देर को खाली हुआ और कुछ देर में फिर से उतना ही भर गयासोनी छोटे बच्चे राजू को हलराते दुलराते हुये थक गई तो वहीं फर्श पर फसक्का मार कर बैठ गई और जोर से थपकते हुए उसे सुलाने का प्रयत्न करने लगीअम्मा ने निंदा की -

'' बैठ गई फरस पर। सिलिक की साडी बर्बाद कर दी। और सोनी कुत्ता भी बैठता है तो पूछ फटकार कर जगह साफ कर लेता है।''
''
क्या करूं इसे संभालना कठिन हो रहा है।'' सोनी थकी हुई लग रही थी।
''
कॉफी पी लेते तो उकताहट कुछ कम होती।'' अम्बुज ने प्रस्ताव रखा।
''
मैं कॉफी लाता हूं।'' एकनाथ कॉफी लाने चला गया। बच्चे अवसर क्यों चूकते। पचास रूपये स्वाहा हो गए।

कुछ देर में एनाउन्समेन्ट हुआ बाबूजी ने तर्जनी अथरों पर रखकर सब को चुप रहने का संकेत किया

''यात्री ध्यान दें, मुम्बई की ओर जाने वाली महानगरी एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नम्बर दो पर आ रही है''

सूचना से प्लेटफॉर्म पर घबराहट और उतावली का झोंका स आया

''लो इतनी देर बाद महानगरी आ रही है तो उस प्लेटफॉर्म पर।''

बाबूजी ठिठके से खडे रहे जैसे सूचना का सत्यापन करना चह रहे होओंकार इधर-उधर जाकर कुली को ढूंढने लगाकुली एनाउन्समेन्ट सुनकर स्वयं ही आ गयाऔर विद्युत की त्वरा से उसने चार सामान लाद लिएअफरा तफरी मची हैलोग हडबडाये हुए दूसरे प्लेटफॉर्म की ओर भागे जा रहे हैबाबूजी तेजी दिखाते हुए कुली के पीछे लग गए कि वह सामान लेकर गायब न हो जाएबच्चों को हांकते घसीटते सामान उठाये ये विशाल कुटुम्ब किसी तरह प्लेटफॉर्म दो पर पहुंचासामान गिना जाता, एकनाथ अनुमान लगाता अपेक्षित डिब्बा कहा आकर ठहरेगा इसके पहले धडधडाती हुई ट्रेन प्लेटफॉर्म से आ लगीउन्मादी भीड उफना रही है अम्मा निरंतर चीख रही है -

'' बच्चों का हाथ कस कर पकडो कोई गुम गया तो इस भीड में नहीं मिलेगा।''

अम्मा की चीख भीड और शोर में खो गईएकनाथ डिब्बे के पीछे दौडा पीछे पीछे कुली और ओंकार और तिलक सब सामान से लदे फंदे हैडिब्बे में बहुत भीड है द्वार पर लटके लोग जैसे प्रवेश निषेध की घोषणा कर रहे है
चढने वाले चढने की शीघ्रता और व्यग्रता में उतरने वालों को उतरने नही दे रहे है
कोई पूरा गला फाडक़र चीख रहा है -

'' जब उतरने की जगह नहीं दोंगे तो चढने की जगह कैसे मिलेगी?''
''
उतरिये जल्दी भाषण मत झाडिये। ट्रेन यहां पांच मिनट रुकती है और आप'' एकनाथ ने उस लटके हुए आदमी को खींचकर उतार दिया। कुली यात्रियों को ठेल ठाल कर सामान सहित डिब्बे में घुस गया। बाबूजी तिलक पर बिगडे
''
तुम जाते क्यों नही डिब्बे में। कुली पता नही सामान कहां रख दे।''
''
चुप भी रहिए बाबूजी। आप ही इस भीड में घुसकर दिखा दीजिए। ''

तिलक द्वार पर झूलती भीड क़ो देखकर बौखलाया हुआ थाबाबूजी उसे घूर कर रह गए क्योंकि उनकी दृष्टि डिब्बे में लोप हो गए कुली को ढूंढ रही थीउतरने व चढने वालो में प्रतिद्वन्द्विता सी हो रही हैधक्का मुक्का झपटा खींच तान चीखना चिल्लाना चल रहा हैएक वृध्द जे मोटा कुरता और परदनी पहने है कंधे पर लटकाने वाला खादी का झोला टांगे है ट्रेन में चढने का बहुत प्रयास कर रहा है और संघाती धक्कों और कोंचती कोहनियों के जोर से चढ नहीं पा रहा हैवृध्द उस उन्मादी भीड में तैरता हुआ सा डिब्बे के द्वार तक पहुंचता और फिर दूर छिटक जाता है जैसे कागज की असहाय नाव लहरों के थपेडों से इधर उधर डगमगा रही हो एक बार वह चढ ज़ाता पर एकनाथ ने उसे कंधे से पकड क़र पीछे खींच लिया और अम्बुज को लगभग घसीट कर कूपे में ढकेल दिया

वृध्द करुण स्वर में बोला '' मुझे भी चढने दो बेटाबहुत जरूरी काम से जा रहा हूं''
'' सभी जरूरी काम से ही जाते है बाबा
कोई फालतू मरने नहीं जायेगा इस भीड मेंपर आप लोगो में धैर्य और एटीकेट बिल्कुल नहीं है वरना सबको उतरने चढने की जगह मिल जाती'' एकनाथ ने उपदेश दे डाला
'' इतनी समझदारी की बातें करते हो फिर भी इस तरह धक्का मुक्की कर रहे हो
'' वृध्द के स्वर में व्यंग थाव्यवस्था सिखाने वाले ये नवयुवक स्वयं कितनी व्यवस्था बनाये रखते है
'' चुप भी रहो बाबा
'' तिलक जो संयोग को कंधे पर लादे हुए है ने वृध्द को एक ओर सरकाया और डिब्बे में चढ क़र किसी तरह किला फतह कर लिया
'' बेटा मुझे भी तनिक हाथपकड क़र खींचोंगे?'' वृध्द का कृश काय हाथ उठा ही रह गया और तिलक कूपे में कहीं बिला गया

'' बुढढा तो पीछे ही पड गया
'' पीछे से ओंकार का स्वर उभरा

अम्बुज ने फेंटा कस लिया और दोनो हाथ हिला हिलाकर बाकी बचे सामान और यश के लिए चिल्ला रही हैलोग जब व्यक्ति से भीड क़ी शक्ल में बदलते है तो सारे संस्कार शालीनता धैर्य संयम नम्रता सभ्यता सदाशयता खो देते हैभीड क़ी शक्ल में स्वयं को पहचाने जाने का भय नहीं होतावृध्द ट्रेन में चढने के लिए भीड से जूझने में सारी क्षमता और ऊर्जा व्यय कर चुका तो भीड से निकलकर एक ओर पराजित सा खडा हो गयाकदाचित उस असंभव क्षण की प्रतीक्षा में जब भीड छंटेगी और वह डिब्बे में चढ सकेगाबाबूजी डिब्बे की गतिविधि पर दृष्टि जमाये हुए बोले -

'' महोदय, ये आपके अकेले स्फर करने की उम्र नहीं है। कम से कम अकेले तो सफर न किया करें। मुझे नहीं लगता आप ट्रेन में चढ पायेंगे। ''
''
जाना बहुत जरूरी है इसलिए जा रहा हूं।'' वृध्द ने अपनी पनियाई आंखे परदनी की कोर से पोछी।

उधर यशा को ओंकार ने किसी तरह डिब्बे में फेंक दियाउसके भाल के दायीं ओर किसी संदूक का नुकीला कोना लग गया और गूमड निकल आयाट्रेन धक्का खा कर रेंगने लगीकुछ साहसी पराकमी लोग डंडा पकडक़र ट्रेन के साथ घिसट रहे है

बाबूजी सस्वर गाने लगे - '' प्रबिसि नगर कीजै सब काजा, हृदय राख कौसलपुर राजा''

यात्रा की सफलता हेतु बाबूजी गोसाई जी की ये चौपाई अवश्य दोहराते हैएकनाथ कूपे में ही रह गया जो बडी क़ठिनाई से कूद पायाचावल और दाल की बोरी यहीं छूट गई और अम्मा का मुंह फूला हुआ हैजाते हुए बेटी से ठीक से मिल भी नहीं पाई

भीड वापस लौटने लगी प्लेटफॉर्म एक की ओरभीड मे कही गुम सा लटपटाते बदहवास पैरों से रेंगता हुआ वृध्द भी लौट रहा हैबाबूजी तनिक दयार्द्र हुये

'' ओंकार तुम लोग उस वृध्द की सहायता कर सकते थे। बेचारा किसी जरूरी काम ì