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एक दिन का मेहमान
वह पीछे हटकर ऊपर देखने लगा। वह दुमंजिला मकान था - लेन के अन्य मकानों की तरह - काली छत, अंग्रेजी वी की शक्ल में दोनों तरफ से ढलुआं और बीच में सफेद पत्थर की दीवार, जिसके माथे पर मकान का नम्बर एक काली बिन्दी सा टिमक रहा था। ऊपर की खिडक़ियां बन्द थीं और पर्दे गिरे थे। कहाँ जा सकते हैं इस वक्त? वह मकान के पिछवाडे ग़या - वही लॉन, फेन्स और झाडियां थीं जो उसने दो साल पहले देखी थीं। बीच में विलो अपनी टहनियां झुकाये एक काले बूढे रीछ की तरह ऊंघ रहा था। लेकिन गैराज खुला और खाली पडा था; वे कहीं कार लेकर गये थे, संभव है उन्होंने सारी सुबह उसकी प्रतीक्षा की हो और अब किसी काम से बाहर चले गये हों। लेकिन दरवाजे पर उसके लिये एक चिट तो छोड ही सकते थे! वह दोबारा सामने के दरवाजे पर लौट आया। अगस्त की चुनचुनाती धूप उसकी आंखों पर पड रही थी। सारा शरीर चू रहा था। वह बरामदे में ही अपने सूटकेस पर बैठ गया। अचानक उसे लगा, सडक़ के पार मकानों की खिडक़ियों से कुछ चेहरे बाहर झांक रहे हैं, उसे देख रहे हैं। उसने सुन था, अंग्रेज लोग दूसरों की निजी चिन्ताओं में दखल नहीं देते, लेकिन वह मकान के बाहर बरामदे में बैठा था, जहां प्राइवेसी का कोई मतलब नहीं था; इसलिये वे नि:संकोच, नंगी उनमुक्तता से उसे घूर रहे थे। लेकिन शायद उसके कौतुहल का एक दूसरा कारम था; उस छोटे, अंग्रेजी कस्बाती शहर में लगभग सब एक दूसरे को पहचानते थे और वह न केवल अपनी शक्ल सूरत में बल्कि झूलते झालते हिन्दुस्तानी सूट में काफी अद्भुत प्राणी दिखाई दे रहा होगा। उसकी तुडी मुडी वेशभूषा और गर्द और पसीने में लथपथ चेहरे से कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता कि अभी तीन दिन पहले फ्रेंकफर्ट की कानफ्रेन्स में उसने पेपर पढा था। मैं एक लुटा - पिटा एशियन इमीग्रेन्ट दिखाई दे रहा होऊंगा।' उसने सोचा और अचानक खडा हो गया - मानो खडा होकर प्रतीक्षा करना ज्यादा आसान हो। इस बार बिना सोचे समझे उसने दरवाजा जोर से खटखटाया और तत्काल हकबका कर पीछे हट गया - हाथ लगते ही दरवाजा खट - से खुल गया। जीने पर पैरों की आवाज सुनाई दी - और दूसरे क्षण वह चौखट पर उसके सामने खडी थी। वह भागते हुए सीढियां नीचे उतर कर आई थी, और उससे चिपट गई थी। इससे पहले वह पूछता, क्या तुम भीतर थीं? उसने अपने धूल भरे लस्तम पस्तम हाथों से उसके दुबले कन्धों को पकड लिया और लडक़ी का सिर नीचे झुक आया और उसने अपना मुंह उसके बालों पर रख दिया।
पडोसियों
ने एक एक करके अपनी खिडक़ियां बन्द कर दीं। आदमी अपना सूटकेस बीच ड्राइंगरूम में घसीट लाया। लडक़ी उत्सुकता से बैग के भीतर झांक रही थी- सिगरेट के पैकेट, स्कॉच की लम्बी बोतल, चॉकलेट के बण्डल - वे सारी चीजें जो उसने इतनी हडबडी में फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर डयूटी फ्री शॉप से खरीदी थीं, अब बैग से ऊपर झांक रही थीं।
''
तुमने अपने बाल कटवा लिये?''
आदमी ने पहली बार
चैन से लडक़ी का चेहरा देखा। वह किचन की देहरी पर आया। गैस के चूल्हों के पीछे लडक़ी की पीठ दिखाई दे रही थी। कॉर्डराय की काली जीन्स और सफेद कमीज, जिसकी मुडी स्लीव्स बांहों की कुहनियों पर झूल रही थीं। वह बहुत हल्की छुई मुई सी दिखाई दे रही थी।
''
मामा कहाँ है?
'' उसने पूछा। शायद
उसकी आवाज ईतनी धीमी थी कि लडक़ी ने उसे नहीं सुन,
किन्तु उसे लगा,
जैसे लडक़ी की गर्दन
कुछ ऊपर उठी थी। ''
मामा क्या ऊपर हैं?
'' उसने दोबारा कहा
और लडक़ी वैसे ही निश्चल खडी रही और तब उसे लगा,
उसने पहली बार भी
प्रश्न को सुन लिया था। ''
क्या बाहर गई हैं?
'' उसने पूछा। लडक़ी
ने बहुत धीरे,
धुंधले ढंग से सिर हिलाया,
जिसका मतलब कुछ भी
हो सकता था। वह सब चीजें लेकर भीतर कमरे में चला आया। वह दोबारा किचन में जाना चाहता था, लेकिन लडक़ी के डर से वह वहीं सोफा पर बैठा रहा। किचन से कुछ तलने की खुश्बू आ रही थी। लडक़ी उसके लिये कुछ बना रही थी - और वह उसकी कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था। एक बार इच्छा हुई, किचन में जाकर मना कर आये कि वह कुछ नहीं खायेगा। किन्तु दूसरे क्षण भूख ने उसे पकड लिया। सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था। यूस्टन स्टेशन के कैफेटेरिया में इतनी लम्बी क्यू लगी थी कि वह टिकट लेकर सीधा ट्रेन में घुस गया था। सोचा था वह डायनिंग कार में कुछ पेट में डाल लेगा, किन्तु वह दुपहर से पहले नहीं खुलती थी। सच पूछा जाय तो उसने अंतिम खाना कल शाम फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट में खाया था और जब रात को लन्दन पहुंचा था तो, अपने होटल के बार में पीता रहा था। तीसरे गिलास के बाद उसने जेब से नोटबुक निकाली, नम्बर देखा और बार के टेलीफोन बूथ में जाकर फोन मिलाया था पहली बार में पता नहीं चला, उसकी पत्नी की आवाज है या बच्ची की। उसकी पत्नी ने फोन उठाया होगा, क्योंकि कुछ देर तक फोन का सन्नाटा उसके कान में झनझनाता रहा, और वह फोन नीचे रखना चाहता था, किन्तु उसी समय उसे बच्ची का स्वर सुनाई दिया; वह आधी नींद में थी। उसे कुछ देर तक पता ही नहीं चला कि वह इंडिया से बोल रहा है या फ्रेंकफर्ट से या लन्दन सेवह उसे अपनी स्थिति समझा ही रहा था कि तीन मिनट खत्म हो गये और उसके पास इतनी चेंज भी नहीं थी कि वह लाइन को कटने से बचा सके, तसल्ली सिर्फ इतनी थी कि वह नींद, घबराहट और नशे के बीच यह बताने में सफल हो गया कि वह कल उनके शहर पहुंच रहा है कल यानि आज। वे अच्छे क्षण थे। बाहर इंग्लैंड की पीली और मुलायम धूप फैली थी। वह घर के भीतर था। उसके भीतर गरमाई की लहरें उठने लगी थीं। हवाई अड्डों की भाग दौड, होटलों की हील हुज्जत, ट्रेन टैक्सियों की हडबडाहट - वह सबसे परे हो गया था। वह घर के भीतर था; उसका अपना घर न सही, फिर भी एक घर - कुर्सियाँ, परदे, सोफा टी वी। वह अरसे से इन चीजों के बीच रहा था और हर चीज क़े इतिहास को जानता था। हर दो तीन साल बाद जब वह आता था, तो सोचता था - बच्ची कितनी बडी हो गयी होगी और पत्नी? वह कितनी बदल गई होगी! लेकिन ये चीजें उस दिन से एक जगह ठहरीं थीं, जिस दिन उसने घर छोडा था; वे उसके साथ चली जाती थीं, उसके साथ लौट आती थीं।
''
पापा तुमने चाय नहीं डाली?''
वह किचन से दो
प्लेटें लेकर आई,
एक में टोस्ट और मक्खन थे,
दूसरे में तले हुए
सॉसेज।
बच्ची की हंसी का फायदा
उठाते हुए वह उसके पास झुक आया जैसे कोई चंचल चिडिया हो,
जिसे केवल सुरक्षा के भ्रामक क्षण में ही पकडा जा
सकता है, '' ममी कब लौटेंगी?'' डर नहीं था। टेबलेट का असर रहा होगा या यात्रा की थकान - वह कुछ देर के लिये लडक़ी की निगाहों से हटना चाहता था। वह अपने को हटाना चाहता था। '' मैं अभी आता हूँ।'' उसने कहा। लडक़ी ने सशंकित आंखों से उसे देखा, '' क्या बाथरूम जायेंगे? '' वह उसके साथ साथ गुसलखाने तक चली आई और जब उसने दरवाजा बन्द कर लिया, तो भी उसे लगता रहा, वह दरवाजे के पीछे खडी है। उसने बेसिनी में अपना मुंह डाल लिया और नलका खोल दिया। पानी झर झर उसके चेहरे पर बहने लगा - और वह सिसकने - सा लगा, आधे बने हुए शब्द उसकी छाती के खोखल से बाहर निकलने लगे, जैसे भीतर जमी काई उलट रहा हो, उलटी, जो सीधी दिल से बाहर आती है - वह टेबलेट जो कुछ देर पहले खाई थी, अब पीले चूरे सी बेसिनी के संगमरमर पर तैर रही थी। फिर उसने नल बन्द कर दिया और रूमाल निकाल कर मुंह पौंछा। बाथरूम की खूंटी पर स्त्री के मैले कपडे टंगे थे - प्लास्टिक की एक चौडी बाल्टी में अंडरवियर और ब्रेसियर साबुन में डूबे थेखिडक़ी खुली थी और बाग का पिछवाडा धूप में चमक रहा था। कहीं किसी दूसरे बाग से घास काटने की उनींदी सी घुर्र घुर्र पास आ रही थी। वह जल्दी से बाथरूम का दरवाजा बन्द कर कमरे में चला आया। सारे घर में सन्नाटा था। वह किचन में आया, तो लडक़ी दिखाई नहीं दी। वह ड्राईंग रूम में लौटा तो वह भी खाली पडा था। उसे सन्देह हुआ कि वह ऊपर वाले कमरे में अपनी मां के पास बैठी है। एक अजीब आतंक ने उसे पकड लिया। घर जितना शांत था, उतना ही खतरे से अटा जान पडा। वह कोने में गया, जहाँ उसका सूटकेस रखा था, वह जल्दी जल्दी उसे खोलने लगा। उसने अपने कान्फ्रेस के के नोट्स और कागज अलग किये, उनके नीचे से वह सारा सामान निकालने लगा, जो वह दिल्ली से अपने साथ लाया था - एम्पोरियम का राजस्थानी लहंगा( लडक़ी के लिये), ताम्बे और पीतल के ट्रिंकेट्स, जो उसने जनपथ पर तिब्बती लामा हिप्पियों से खरीदे थे, पश्मीने की कश्मीरी शॉल( बच्ची की मां के लिये), एक लाल गुजराती जरीदार स्लीपर जिसे बच्ची और मां दोनों पहन सकते थे, हैण्डलूम के बेडकवर, हिन्दुस्तानी टिकटों का अल्बम - और एक बहुत बडी सचित्र किताब, बनारस द एटर्नल सिटी।
फर्श पर धीरे धीरे एक
छोटा सा हिन्दुस्तान जमा हो गया था जिसे वह हर बार यूरोप आते समय अपने
साथ ढो लाता था।
''
मैं तुम्हारो लिये कुछ
इण्डियन सिक्के लाया था तुमने पिछली बार कहा था न!'' |