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धागे
उस रात खाने के बाद कॉफी पीते हुए हम केशी के नये रिकॉर्डों की चर्चा करने लगे
'' मुझे तो रात को नींद नहीं आतीमैं ने ग्रामोफोन लायब्रेरी में रखवा दिया है
'' मीनू ने कहा
'' क्या वह अब भी पीते हैं?'' मैं ने धीरे से पूछा
'' केशी दूसरे कमरे में है''
''
हाँ लेकिन मेरे कमरे में नहीं'' मीनू ने दरवाजा खोलकर परदा उठा दियाबरामदे के परे लॉन अंधेरे में डूबा थाएक अपरिचित सी घनी सी शान्ति सारे अहाते में फैली थीहम कॉफी पी चुके थे और अपने अपने खाली प्यालों के आगे बैठे थेमीनू कुर्सी खिसका कर मेरे पास सरक आयी

'' तुम्हारे हाथ बहुत ठण्डे हैं
'' उसने मेरे दोनों हाथ अपनी मुट्ठियों में भर लिये, '' तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी? शैल तुम्हारी राह देखते देखते अभी सोई है''
'' मैं फाटक से तुम्हारे कमरे तक भागती आई थी
'' मैं ने कहामैं ने झूठ कहा थामैं मीनू से यह नहीं कहूंगी कि मैं पिछले आधे घण्टे से लॉन में अकेली बैठी रही थी - कहूंगी, तो वह विश्वास नहीं करेगी
'' क्यों तुम्हें अब भी अंधेरे से डर लगता है?'' मीनू हंस रही थी
उसका एक हाथ अब भी मेरी गोद में पडा थाबिजली की रोशनी में उसकी सफेद पतली बांहें बहुत सफेद थीं, बहुत पतली थींमुझे अजीब सा लगताकेशी इन हाथों को कैसे चूमता होगा? कैसे इन बांहों के महीन भूरे रोयों को सहलाता होगा?

'' सुनो परसों रात तुम क्या कर रही थीं?
''
क्यों अपने कमरे में थी।'' मैं ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
''
कनॉट प्लेस से घर लौटते हुए हम तुम्हारे हॉस्टल आये थे।''
''
बहका रही हो?'' मैं ने कहा।
''
सच आये थे- केशी से पूछ लेना। लेकिन इतनी रात भीतर कैसे आते तुम्हारी मिसेज हैरी देखतीं तो हमें कच्चा चबा जातीं।'' वह हंस रही थी।
''
क्या तुम लोग रुके थे?''
''
हम हॉस्टल के बाहर खडे रहे थे तुम्हारे कमरे की बत्ती जली थी। केशी ने कई बार हॉर्न बजाया था। हमने सोचा था तुम हमारी कार का हॉर्न पहचान जाओगी लेकिन तुमने सुना नहीं।''
''
मैं शायद सो गई थी मुझे कुछ पता भी नहीं चला।''
''
तुम अब भी लाइट जला कर सोती हो?'' मीनू ने पूछा, मिसेज हैरी कुछ नहीं कहतीं?''
''
यह वर्किंग वीमेन्स हॉस्टल है, और मिसेज हैरी कोई कॉन्वेन्ट स्कूल की मेट्रन थोडे ही हैं।'' मैं ने कहा, मीनू समझ गई।हम दोनों को एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई थी और हम दोनों हंसने लगे थे।

उन दिनों मैं और मीनू स्कूल के हॉस्टल में रहा करते थेकमरे में बत्ती जला कर सोने की सख्त मनाही थीअंधेरे में डर के मारे मेरी देह के पोर पोर से पसीना छूटने लगता था और मैं सबकी आंख बचाकर चोरी - चुपके बत्ती जला लेती थीडिनर के दो घण्टे बाद जब कभी मैट्रन कमरों का राउण्ड लगाने आती, तो मेरा दिल रह रह कर दहल जातामैं आंखें मूंद कर प्रार्थना करती रहतीकिन्तु मैट्रन की आंखें चील की तरह तेज थींउन्हें धोखा देना आसान नहीं था वह बडबडाते हुए मेरे कमरे में आतीं और बत्ती बुझा जातींकिन्तु जब वह मेरे कमरे से जाने लगतीं तो मैं कांपते हाथों से उनकी स्कर्ट पकड लेती, '' प्लीज मैट्रन! '' वह हत्बुध्दि सी मेरी ओर देखने लगतीं और झिडक़ने लगतीं, '' क्या बात है, यह क्या बचपना है?'' वह कहतीं, किन्तु मैं उनकी स्कर्ट पकडे रहती और सिसकते हुए बार बार कहती, '' प्लीज मैट्रन,प्लीज - प्लीज ''

सारे हॉस्टल में यही बात फैल गयी थी ऊंची क्लास की लडक़ियां या मीनू की सहेलियां जब भी मुझे देखतीं, हंसते हुए बार - बार कहतीं,'' प्लीज मैट्रन,प्लीज - प्लीज ,प्लीज ''

'' मीनू  शिमला याद आता है न जाने कितने बरस बीत गये?'' मैं ने कहा।
''
हमने सोचा है अगली गर्मियों में वहां जायेंगे केशी ने अभी तक शिमला नहीं देखा  तुम्हें उन दिनों छुट्टी मिल जायेगी? ''
मैं मीनू को देखती हूं, मुझे कुछ समझ नहीं आता

'' तुम्हें नहीं मालूम तुम कैसी हो गयी हो कभी शीशे में अपना चेहरा देखा है? ''
''
हाँ, देखा है बडा प्यारा सा लगता है'' मैं ने कहा
'' नहीं रूनी मजाक की बात अलग है
तुम्हें हमारे संग चलना होगा जब से तुम जबलपुर से आई हो''
लेकिन मीनू आगे कुछ नहीं बोलती
शायद आगे मौन का एक दायरा है जिसे हम दोनों छूते हुए कतराते हैंशायद मेरा चेहरा बहुत सफेद सा हो गया है और वह डर सी गई है

मीनू कुर्सी से उठकर मेरे पास - बहुत पास आ गईउसने मेरे गले में अपने दोनों हाथ डाल दियेउसकी आंखों में अजीब सा विस्मय हैमुझे भ्रम होता है कि वह मेरे और केशी के बारे में सब कुछ जानती है वे बातें जो सिर्फ मेरी हैं, जिन्हें मैं अपने से भी छिपा कर रखती हूंकिन्तु वह कभी मुझसे कहेगी नहीं  वह बडी बहन है, इसलिये वह  मार्टर  हैवह हमेशा मुझे अपने से बहुत छोटा समझती रहेगी
ये कुछ ऐसे क्षण हैं, जब मैं मीनू से घृणा करती हूं बचपन से करती आई हूं

कमरे में सन्नाटा खिंचा रहा न जाने हम दोनों कितनी देर तक ऐसे ही बैठे रहे
'' तुम बुरा मान गईं
'' उसका स्वर भीगा - सा था
'' तुम पागल हो मीनू! ''
'' इस तरह हॉस्टल में अकेले कब तक रहोगी?''
मैं ने उसकी ओर हंसते हुए देखा

'' अब मुझे डर नहीं लगता
''

मीनू कुछ बोली नहीं, चुपचाप अपनी ऊंगलियों को मेरे बालों में उलझाती रहीउसकी आंखे बहुत उदास हैं वह मुझसे बडी है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि मैं उससे छोटी हूंलगता है, जैसे दिन बीतते जाते हैं और वह वहीं - एक ही स्थान पर - खडी रही है, जहां वह बरसों पहले थीफिर भी उसके सामने मैं अपने को हमेशा ही बहुत हीन पाती हूंलगता है वह सब कुछ है, मैं उसके सामने कुछ भी नहींयह उसका बडप्पन नहीं  वह होता तो कुछ भी मुश्किल नहीं था; तब मैं उससे लड लेती; उसे दोष देकर छुटकारा पा लेतीलगता है, जैसे वह कहीं बहुत ऊंची दीवार पर बैठी है और मैं उसे सिर उठाकर विस्मित आंखों से देख रही हूं

'' रूनी बहुत देर हो गयी, तुम कपडे नहीं बदलोगी?'' मीनू उठ खडी हुई।
''
ठहरो चलती हूं। यह स्वेटर किसका है?'' मेरी निगाहें सामने सोफा पर टिक गईं जहां हल्के सलेटी रंग के ऊन की लच्छियां और उनमें उलझी सलाइयां पडीं थीं।
''
केशी का पुलोवर है  पूरी बांहों का।'' बुना हुआ हिस्सा उठा कर उसने मेरे हाथों में रख दिया।
''
कैसा है कल ही शुरु किया है।'' मैं ने उसे छुआ नहीं, एक लम्बे क्षण तक उसे अपने हाथों पर वैसे ही पडा रहने दिया मेरे हाथ उसके नीचे दब गये हैं। उसके नीचे दब कर सिकुड से गये हैं। मीनू की स्निग्ध, शांत आंख और मेरे कांपते हाथों के बीच केशी का अधबुना स्वेटर एक लम्बे पल के लिये बिना हिले डुले पडा रहता है।

मैं ने आज तक केशी को फुल स्लीव का पुलोवर पहने नहीं देखापता नहीं उस पर कैसा लगेगा?

मीनू ड्राईंगरूम में चली गई मैं कुछ देर तक उस कमरे में अकेली बैठी रहती हूंसब ओर सन्नाटा हैकेवल किचन से प्यालों और प्लेटों की हल्की खनखनाहट सुनाई दे जाती हैदरवाजे क़ी जाली पर फीकी सी चांदनी उतर आई है

खिडक़ी के परे बरामदा है, लाल बजरी की सडक़ हैउसके पीछे मोटर रोड को लांघ कर पहाडी ती है, जिसके टीले लॉन से दिखाई देते हैं और लॉन में पत्तियां हैं, हवा में सरसराती घास है
'' तुम अभी तक यहां बैठी हो?'' मीनू के स्वर में हल्की सी झिडक़ी थी
मैं चौंक गईकेशी का स्वेटर अब भी मेरी गोद में पडा था
'' मीनू क्या झाडियों में बेर आ गये?''
'' अभी
कहाँ? कहीं दिसम्बर में जाकर पकेंगेयाद नहीं पिछले साल इन्हीं दिनों हम पहाडी में पिकनिक पर गये थेबेर खाकर शैल का गला पक आया था''
'' वे कच्चे थे
तुमने पके बेर नहीं खाये, बिलकुल काफल जैसे मीठे होते हैं मीनू, शिमले के काफल याद हैं?''
'' और खट्टे दाडू  तुम उनका लाल रस अपनी उंगली पर लगाकर कहती थीं - यह मेरा खून है
'' और मां डर जाती थीं''

हम उस क्षण भूल गये कि इन बरसों के दौरान ढेर सी उम्र हम पर लद गयी है कि बरसों पहले उसका विवाह हुआ था और मैं एक बच्चे की मां हूंहम दरवाजे पर खडे ख़डे देर तक एक दूसरे को वे बातें याद दिलाते रहे, जो हम दोनों को मालूम थीं, जिन्हें हमने कितनी बार दुहराया था, किन्तु हर बार यही लगता था कि हम उन्हें भूल गये हों, हर बार उन्हैं दुबारा याद करने का बहाना सा करते थे

'' कल तुम्हारा ऑफ डे है  हम लोग पहाडी पर जायें तो कैसा रहे?''
''
सच! '' मैं ने खुशी से मीनू का हाथ पकड लिया।
''
केशी से कहेंगे वह अपना ग्रामोफोन ले चले बिलकुल पिछले साल की तरह।''
''
रूनी, इट विल बी वण्डरफुल सच बिलकुल पिछले साल की तरह।''

पिछला साल  एक ठण्डी, बर्फीली सी झुरझुरी मेरी पीठ पर सिमट आई वह सितम्बर का महीना था, मैं शैल को लेकर दिल्ली आई थीसब कुछ पीछे छोड ई थी, अपना घर बार अपनी गृहस्थीसबने यही समझा था कि मैं कुछ दिनों के लिये रहने आई हूंकुछ दिन रहूंगी और फिर वापस चली जाऊंगीयही सितम्बर का महीना था  हम पहाडी पर पिकनिक के लिये गये थे बेर की झाडियों के पीछे मैं ने साहस बटोर कर मीनू से पहली बार बात कही थी, जो इतने दिनों से मैं अपने में छिपाती चली आ रही थीमीनू ने समझा था मैं हंसी कर रही हूं, किन्तु अगले पल जब उसने मेरे चेहरे को देखा तो वह चुप रही थी, कुछ भी नहीं बोली थी एकदम फटी फटी आंखों से मुझे निहारती रही थी

कल उस बात को बीते एक साल हो जायेगा कल हम फिर पिकनिक के लिये जायेंगे

गेस्टरूम की बत्ती जली हैमैं दरवाजे के पास जाकर ठिठक जाती हूंपीछे देखती हूंफाटक के पास चांदनी में मेरी छाया लॉन के आर पार खिंच गई हैलगता है, रात सफेद है, बंगले की छत, दूर पहाडी क़े टीले, घस पर एक दूसरे को काटती छायाएं  सब कुछ सफेद हैंघास के तिनके अलग अलग नहीं दीखते एक हरा सा धब्बा बन कर पेडों के नीचे वे एक दूसरे के संग मिल गये हैं

यहां से उस कमरे का कोना दीखता है, जिसमें मीनू और केशी सोते हैं  कोना भी नहीं, केवल दीवार का एक टुकडा - जो झाडियों से जरा दूर है लेकिन लगता है जैसे झाडियां अंधेरे के संग संग दीवार के पास तक खिसक आई हैं एक क्षण के लिये भ्रम होता है कि मैं भूल से यहां आ गई हूं, कि यह मीनू का बंगला नहीं है, वह लॉन नहीं है, जिसके कोने कोने से मैं परिचित हूंजब कभी कोई पक्षी झाडियों से बाहर निकल कर उडता है, उसके डैनों की छाया घूमते हुए लहू की तरह चांदनी पर फिसलने लगती है

कमरे में दबे पांवों से आईमेरे पलंग के पास शैल का बिस्तर लगा थाचप्पल उतार कर मैं धीरे से उसके पास बैठ गईदेर तक उसकी मुंदी आंखों को देखती रही एक बार उसने आंखें खोलकर मुझे देखा था केवल निमिष भर के लिये - किन्तु नींद ने दूसरे ही क्षण उसकी पलकों को अपने में ओढ लिया था

बत्ती बुझा कर मैं अपने बिस्तर पर लेट गयीचांदनी इतनी साफ है कि बुक केस पर रखी केशी की किताब का टाइटल भी अंधेरे में चमक रहा है   टाइम, स्पेस एण्ड आर्किटैक्चरबाहर की खुली खिडक़ी पर शैल के झूले की रस्सी टंगी हैउसकी छाया खिडक़ी की जाली पर तिरछी रेखाओं सी पड रही हैजब हवा का झौंका आता है, तो ये रेखाएं मानो डरकर कांपती हुई एक दूसरे से सट जाती हैं

न जाने क्यों मेरा दिल तेजी से धडक़ने लगता हैशायद मेरा भ्रम रहा होगा और मैं सांस रोके लेटी रहती हूंकमरे की चुप्पी में एक अजीब सी गरमाहट है जैसे कोई चीज दीवारों से रिस रिस कर बहती हुई मेरे पलंग के इर्द गिर्द जमा हो गयी होलगता है जैसे पास लेटी शैल की सांस मेरे पास आते आते भटक जाती है और मैं उसे सुन नहीं पाती

सुनती हूं  कुछ देर ठहरकर, कुछ निस्तब्ध पलों के बीच जाने के बाद दुबारा सुनती हूं, पहला भ्रम महज भ्रम नहीं थाबीच के गलियारे में धीमी सी आहट हुई हैकुछ देर तक सन्नाटा रहता है कई मिनट इसी तरह अनिश्चित प्रतीक्षा में बीत जाते हैंबाहर का दरवाजा हवा चलने से कभी खुल जाता है, कभी बन्द हो जाता हैजब खुलता है तो गलियारे में धूल से सनी पत्तियां दीवार से चिपटी हुई तितलियों की तरह उडने लगती हैं

गलियारे के सामने लाइब्रेरी की बत्ती जली हैखूंटी से मीनू की शॉल उतार कर मैं ने ओढ लीबाहर आई नंगे पांवलाइब्रेरी का दरवाजा खुला थाटेबललैम्प के हरे शेड के पीछे केशी का चेहरा छिप गया है सोफा पर केवल उसकी टांगे दिखाई देती हैं सामने तिपाई पर कोन्याक की बोतल और खाली गिलास पडे हैं उनकी छाया हू ब हू वैसी ही स्टिल लाइफ की तरह दीवार पर खिंच आई हैबिलकुल चुप, बिलकुल स्थिर

'' तुम अभी सोई नहीं?''
उसने मुझे देख लिया था। मैं कुछ देर तक चुपचाप देहरी पर खडी रही।
''
इतनी रात यहां क्या कर रहे हो? ''
वह सोफा पर बैठ गया। उसकी उंगली अभी तक किताब के पन्नों के बीच दबी थी।
''
मीनू को पसन्द नहीं कि मैं उसके कमरे में पियूं। रात को मैं अकसर यहां आ जाता हूं।''
''
यहीं सोते हो?'' मेरा स्वर कुछ ऐसा था कि खुद मुझसे नहीं पहचाना गया।''
''
कभी कभी  एनी वे, इट हार्डली मेक्स एनी डिफरेन्स, इज ऌट?'' उसने धीमे से हंस दिया। मैं कभी उसकी ओर देखती रही। बाहर अंधेरे में बजरी की सडक़ पर भागती पत्तियों का शोर हो रहा था। कुछ देर तक हम दोनों रात की इन अजीब, खामोश आवाजों को सुनते रहे।

'' मैं तुम्हारे कमरे तक आया था - फिर सोचा, शायद तुम सो गई हो।''
''
कुछ कहना था?''
''
बैठ जाओ।''
केशी का चेहरा पत्थर सा भावहीन और शान्त था। उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसे मैं पढ पाती। उसकी छाया आधी ग्रामोफोन पर, आधी दीवार पर पड रही है। ग्रामोफोन और किताबों की शेल्फ के बीच एक छोटी सी मेज है, जिस पर रिकार्डों का बण्डल रखा है, जो शायद अभी तक नहीं खोला गया
''
ज़बलपुर से चिट्ठी आई है।''
केशी ने मेरी ओर नहीं देखा। वह शायद यह भी नहीं जानता कि मैं उसकी ओर देख रही हूं।
''
तुमसे पूछना था कि क्या उत्तर दूं।'' उसने कहा।
मैं प्रतीक्षा कर रही हूं - लेकिन केशी चुप है। वह भी शायद प्रतीक्षा कर रहा है।
''
तुम्हें क्यों भेजा है?''
''
पत्र तुम्हारे लिये है, सिर्फ लिफाफे पर मेरा नाम है।'' केशी ने जेब से लिफाफा निकाला और उसे ग्रामोफोन पर रख दिया।
''
इसे पढ लो।''

लिफाफे पर जो हस्तलिपी है, उसे पहचानती हूँ। उसे देखकर जिस व्यक्ति का चेहरा आंखों के सामने घूम जाता है, उसे पहचानती हूँ। क्या मैं कभी अपने अतीत से छुटकारा नहीं पा सकूंगी वह हमेशा छाया की तरह पीछे आता रहेगा?
'' पढाेगी नहीं?''
'' क्या होगा?''
केशी हताश भाव से मुझे देखता है मैं जानती
हूँ, वह क्या सोच रहा है
'' तुम्हें बुलाया है
''
'' जानती
हूँ।''
'' वह एक बार शैल को देखना चाहते हैं
''
'' वह शैल के पिता हैं जब आकर देखना चाहें देख लें अपने संग ले जाना चाहें ले जायें मैं रोकूंगी नहीं
''
मैं रोकूंगी नहीं यही मैं ने कहा था
केशी निर्विकार भाव से मुझे देखता रहा था

वह सोफा से उठ खडा हुआमैं अपनी कुर्सी से चिपकी बैठी रहती हूँ। मुझे लगता है, मैं रात भर इसी कुर्सी पर बैठी रहूंगी, रात भर केशी खिडक़ी के पास खडा रहेगा
'' रूनी, तुमने सोचा क्या है? क्या ऐसे ही रहोगी?''
मेरी आंखें अनायास उसके चेहरे पर उठ आईं थीं
कुछ है मेरे भीतर जो बहुत निरीह है, बहुत विवश हैकेशी उसे नहीं देखतादेखता है, तो भी शायद आंखें मूंद करइस क्षण भी वह चुप है उसकी भावहीन, पथरीली आंखों में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे मैं ले सकूं, जो वह मुझे दे सकेमुझे अचानक शर्म आती हैअपने पर, अपनी कमजोरी पर और मैं हंस पडती हूँ। मेरी समूची देह बार बार किसी झटके से हिल उठती है
'' रूनी! ''
केशी का मुख एकदम म्लान सा हो उठा था
उसका स्वर मुझे अजीब सा लगा थामैं हंसते हंसते सहसा चुप हो गयीवह धीमे झिझकते कदमों से मेरे पास चला आया थाबीच में ग्रामोफोन था, ग्रामोफोन पर लिफाफा रखा था
'' रूनी, मुझे तुमसे कुछ और नहीं कहना है
तुम चाहो तो, अपने कमरे में जा सकती हो''
मैं कुछ नहीं कहती  मैं सिर्फ उसकी कमीज क़ा खुला कॉलर देख रही
हूँ, जिसके पीछे उसकी छाती के भूरे बाल बिजली की रोशनी में चमक रहे हैंदूसरे कमरे में कभी कभी सोती हुई शैल की सांसे सुनाई दे जाती हैंउन्हें सुनकर मन फिर स्थिर हो जाता हैलगता है उन नरम सांसों की आहट ने कमरे की हवा को बहुत हल्का सा कर दिया है

'' सुना है, तुम कुछ नये रिकॉर्ड लाए हो?''
''
हाँ, सुनोगी?''
''
अभी नहीं, शैल सो रही है।''
''
हम तुम्हारे हॉस्टल गये थे।''
''
हां, मीनू ने कहा था। तुमने कार का हॉर्न बजाया था।''
''
तुमने सुना था? तुम नीचे क्यों नहीं आईं? हम पोर्च के बाहर खडे रहे थे।''
''
मैं सो रही थी। मुझे लगा, मैं सोते हुए सुन रही हूँ।''

कुछ देर तक हम चुप बैठे रहे मुझे लगा हम दोनों किसी छोटे से स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे हैंदोनों चुपचाप अपनी अपनी ट्रेनों की प्रतीक्षा कर रहे हैंकिन्तु बीच के इन लम्हों को हम अच्छी तरह गुजार देना चाहते हैं ताकि बाद में हम दोनों में से किसी को एक दूसरे के प्रति कोई गिला, कोई शिकायत न रहे

'' यू वोन्ट माइन्ड रूनी विल यू?'' किन्तु उसने मेरे उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की। मैं ने चुपचाप सिर हिला दिया।
ग्लास में कोन्याक ढालते हुए उसने मेरी ओर देखा था।
''
तुम्हें बुरा तो नहीं लगता रूनी?'' उसका स्वर बहुत धीमा सा कोमल हो आया था।
''
मीनू को बुरा लगता है। रात को वह मुझे अपने कमरे में नहीं पीने देती।''
मैं चुपचाप उसकी ओर देखती रहती हूँ। लगता है इस क्षण भी, जब वह मेरे सामने तिपाई पर झुका हुआ पी रहा है - उसमें कुछ ऐसा है - जिसके केवल होने भर का आभास होता है, किन्तु जो उंगलियों में आता आता फिसल जाता है। मैं उसका गोल, पीला चेहरा, गालों की चौडी, उभरी हुई हड्डियां, तनिक गहरी उदास आंखें देख सकती हूँ। सिर के बाल धीरे धीरे उड&