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आंखों में किरकिराते रिश्ते
''
ऐऽ मत खा मिठाई,
मैं ने सुबह से कुछ
नहीं खाया तुझे राखी बांधने के लिये। मैं अकेली क्यों भूखी रहूँ?''
कहाँ
चला गया बचपन?
कहां खो गये वो रिश्ते? एक
ही कोख से जन्मे भाई - बहनों के बीच क्या ऐसे भी दूरियां आ जाती हैं?
बहुत सारे आंसू आंख में भर आये।
बहुत सूना - सूना
सा लग रहा था आज का दिन,
दोनों बच्चे अपने पापा के साथ बहुत जिद करके कोई मिल
गया पिक्चर देखने चले गये थे, राखी की रस्म
पूरी करके।
बच्चों ने उससे
चलने की बहुत जिद की थी पर वह रुक गई थी कि राखी का दिन है जाने कौनसी ननद
चली आयें पास के शहर में ही तो तीनों रहती हैं।
कोई आ गया तो कम से
कम वह घर पर मिलेगी।
कितनी - कितनी दलीलें दीं
उसने मम्मी को,
भाई और पद्मा की शादी को लेकर।
मम्मी
जन्मपत्रिकाएं दिखवा कर कह चुकी थीं,
'' बेटा जाति का झगडा छोड भी दूं तो यह लडक़ी शुभ नहीं
है उसके लिये।
कल ही तो जोशी जी
पत्रिकाएं देख कर गये हैं,
तेरे सामने।'' उसीके मन की हो गयी थी। पर एक महीने में ही झगडे शुरु हो गये थे। फिर दोनों अलग हो गये। पास ही में अलग घर लेकर रहने लगे। मम्मी - पापा से मिलने आते जाते रहते थे। अलग हुए छ: महीने बीते भी न थे कि वह दुर्घटना घट गई, जिसमें उसका एक पैर चला गया। इतना बडा हादसा शायद फिर परिवार को जोड रहा था। लग रहा था, शायद उन दोनों को अपनी गलती का अहसास हो गया होगा। सुबह के भूले घर को लौट आयेंगे।
मम्मी अस्पताल में दिन -
रात एक करके उसकी सेवा करती रहीं थी,
अपना अशक्त बुढापा भुला कर।
तन - मन - धन तीनों
झौंक कर उन्होंने तीन महीने उसके साथ अस्पताल में बिताये,
उसकी पत्नी अपने मायके में थी,
उसे भी चोट आई थी।
वह स्वयं घर - पति
- बच्चे छोड क़र मायके के चक्कर काटती रही।
हरसंभव सहायता करती
रही।
उसके पति भी पीछे नहीं रहे
थे भाई की सेवा में,
उसे गोद में उठा उठा कर एक्सरे वगैरह के लिये ले जाते।
वह भी मम्मी के
बहुत करीब आ गया था,
दिन रात कहता, '' तुमने मुझे
नयी जिन्दगी दी है।
मेरा हाथ पकडे रहो।
मुझे सुला दो बहुत
दर्द है।''
मम्मी आंसू बहाती उसके करीब रात रात खडी रहतीं।
कभी कभी वह जिद
करके मम्मी को घर भेज देती देती और स्वयं उसका युरिन बैग बदलती,
गन्दा बिस्तर साफ करती।
शर्म छोड एक बच्चे
की तरह उसके कपडे बदलवाती।
सबके सहयोग व सेवा
से वह घर लौट आया था,
कृत्रिम आधुनिक तकनीक वाले नये पैर के सहारे चलता हुआ।
वह लौट कर अपने अलग
घर में नहीं गया।
पत्नी से कह दिया
था, '' तुझे
आना हो आ जाना, मैं अब अपनी मम्मी से अलग नहीं
रहूंगा।''
रिश्ते फिर किर्च किर्च
बिखर गये थे।
दिलों में दूरियां ही नहीं
हुईं बल्कि अलगाव की मोटी अभेद्य दीवारें खिंच गई थीं।
पर मम्मी के मन में
उसके अपाहिज होने का दर्द हमेशा बना रहा। जब मन भावुकता के अतिरेक से भर गया तो उसने उसके मोबाइल पर कॉल किया, फोन उसकी पत्नी ने उठाया -
''
हाँ,
पद्मा,
मुझे शान्तनु से बात
करनी है।''
फोन लिये वह संज्ञाशून्य
बैठी रही।
फूट फूट के रोना चाहती थी
कि बाहर बच्चों का शोर सुनाई दिया।
वह छिपा गई पति से फोन
वाली बात।
हाथ मुंह धोकर वह चाय
बनाने किचन में जा ही रही थी तो बाहर ड्रॉइंगरूम में से इनकी आवाज
आयी,
उसकी मासूम बातें सुन कर उसका मन उत्फुल्ल हो गया था, उसकी दो साल से सूनी पडी राखी आज मनेगी। क्या हुआ जो उसका ये अपने सगे भाई का हमउम्र चचेरा भाई बचपन ही से मंद बुध्दि है। कम से कम अपनी इस बहन से प्यार तो रखता है। इतनी दूर से चल कर आया है, अपनी निश्छल - निस्वार्थ भावनाएं लेकर!
उसने जल्दी से रेशम के
घुंघरू बंधे धागे थाली में रखे,
मिठाई रखी, दिया जलाया,
रोली - चावल लेकर, इस अनोखे
स्नेहिल भाई के सामने आ गई, बडे स्नेह से टीका
करके राखी बांधी, मिठाई खिलाई।
नीलू उठा उसने पैर
छुए और जेब से 100
रू का नोट निकाल कर थाली में डाल दिया।
उसके आंसू अब कैसे रुकते?
वह फूट फूट कर रो पडी।
नीलू भैया,
पतिदेव, दोनों बच्चे हतप्रभ
थे।
मनीषा कुलश्रेष्ठ |
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