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भगोड़ा

जूम ...सर से फिर एक मिग २१ गुज़रा। आकाश साफ था। दोपहर के ११ बजे थे। पास ही
में स्थित वायुसेना स्टेशन की मिग २१ की स्क्वाड्रन का दैनिक अभ्यास चल रहा
था। समूह से पीछे छूट गयी भेड़ जैसे बसन्त के इक्का दुक्का सफेद बादलों के
अलावा आकाश का नीला अथाह विस्तार अलसाया सा पसरा था। उसके सीने पर होकर
गुज़रते तेज़ रफ्तार विमान अपनी
सीमाओं की रक्षा हेतु सजगता का परचम फहरा रहे
थे। प्रशान्त ने सर उठाकर देर तक ऊपर देख कर सर नीचे किया तो उसे लगा जैसे
आकाश ने उसे गोदी में लेकर गोल - गोल घुमा कर ज़मीन पर छोड़ दिया है। ये आवाज़ें
नयी तो नहीं हैं प्रशान्त के लिये बल्कि रोज़मर्रा का हिस्सा हैं, फिर भी वह
हर जहाज़ के गुज़रने पर सर ऊपर उठा कर देख ही लेता है। यह जेल ऐसी ही जगह पर
स्थित है कि यहां के कैदियों और यहां के कर्मचारियों को इन लड़ाकू जहाज़ों की
आवाज़ अपनी ही आती - जाती सांस की आवाज़ का हिस्सा प्रतीत होती है। सांस अगर
जीवन से जोड़ती है, तो ये जहाज़ जेल की ऊंची दीवारों के बीच रहने वालों को
बाहर की दुनिया के विस्तार से जोड़ते से लगते हैं। जब भी वह भारतीय वायुसेना
के मिग २१ और सू ३० जहाजों की उड़ानें देख रहा होता है, तब वह अनजाने ही अपने
पैर के अंगूठे से पैरों के नीचे की नम मिट्टी कुरेद रहा होता है। आंखों में
एक पतली पानी की परत तैर रही होती है... मन को जैसे वह अपनी ही मुठ्ठी में
भींच रहा होता है।
इस जेल की ऊंची दीवारों के बीच के अहाते में हरी घास उगी हुई है। बीचों - बीच
एक पीपल का लम्बा युवा पेड़ है। जिसे बार - बार इस डर से काट दिया जाता है कि
कहीं बढ़ कर जेल की दीवारें न फांदने लगें इसकी डालियां। प्रशान्त इस पेड़ की
पीड़ा में हर बार तब तक शामिल रहता है जब तक कि फिर से इस पर नये लाल चिकने
पत्ते न उग आएं। प्रशान्त ही जानता है कि कैसे ये पीपल चांदनी रातों मेंे
सुनहरे - रूपहले पत्तों तथा माणिक - मोती और नीलम - पन्नों के फलों से सजे
कल्पतस्र् में बदल जाता है और मरमर की ध्वनि के साथ उसे स्नेह से पुकारता है।
इसके नीचे बने गोल चबूतरे पर इसके व अपने अच्छे - बुरे दिनों में बैठना और
बैठ कर घण्टों चुपचाप सोचना प्रशान्त का प्रिय शगल है। इस पीपल के सान्निध्य
में न जाने कितनी बार उसे लगा कि यह उसका बोधिवृक्ष है। क्योंकि उसके साथ के
क्षणों में पवित्र विचारों का उदय होता। घृणा, क्षोभ, हताशा, अपमान, क्रोध जो
उसके वज़ू़द को निरन्तर जलाते थे, इसके नीचे बैठ कर तिरोहित हो जाते। पवित्र
विचार जो मृगतृष्णा की तरह सूक्ष्म होते...उसके निकट तो आते पर जैसे ही वह
उन्हें सहेजता, वे किसी तितली की तरह जाल से निकल भागते। टूटते नक्षत्र की
तरह एक पल को सृष्टि को आलोकित कर लुप्त हो जाते और उसकी आत्मा को शांत कर
जाते।ऐसे में हृदय पिघलता बूंद - बूंद और कहीं अन्यत्र एकत्र होकर अखण्ड
विश्वास बन जम जाता। तब उसका सही चरित्र आकार लेने लगता। बिना असमंजस वाला,
जिजीविषा से भरा। जीवन के प्रति उसकी आस्था जागने लगती।
यह यरवदा जेल... उसे याद है, वह बचपन में बाबा के साथ जब सांगली से पूना आया
था तब बाबा ने उसे इस जेल में लाकर गांधी और नेहरू जी वाली ऐतिहासिक सेल
दिखाई थीं। तब यह जेल कुछ उजाड़ सी थी... पूना शहर से जोड़ने वाले उस पुल के
इस तरफ का इलाका भी इतना बसा हुआ नहीं था। अब तो लोहेगांव तक पूरा बस गया है
बल्कि आगे भी नई कॉलोनियां बसती जा रही हैं। और यह जेल... अपने हरे भरे
विस्तारों के साथ लोगों को आकर्षित करती हुई एक लैण्डमार्क का रूप ले चुकी
है।
जिस दिन वह यहां लाया गया था उस दिन अथाह पीड़ा व अपमान के घनत्व के बीच डूबते
हुए भी इस शांत जेल और हरे - भरे अहातों ने उसे थोड़ा संभाल लिया था। उसने
जेल के भीतर आते हुए स्वयं को समझाने के उ ेश्य सोचा था,... जगह इतनी भी बुरी
नहीं है तीन साल काटने के लिये। ``तीन सा..ल!'' वह बुदबुदाया था।
जेल के गेट पर ही मराठी में बड़े अक्षरों में लिखा था `यरवदा सेन्ट्रल जेल'।
इस बड़े फाटक के अगल - बगल में राइफल लिये संतरियों की कतार थी... बगल में
केबिननुमा सिक्योरिटी ऑफिस था...आने - जाने वाले लोगों की शिनाख्त़ के लिये।
गेट के भीतर बीच में पक्के फर्श वाले अहाते में कुछ ऑफिस और बने थे, जिनमें
कैदियों के कागज़ात रहते और जहां क्लर्की व एकाउंट्स का काम होता था। ये पक्का
फर्श वाला अहाता... पीछे तक जाते हुए कच्चे हरे भरे मैदान में बदल जाता था...
जहां सब्जियों की क्यारियां और फलों के पेड़ दूर तक लगे थे... इस हरे मैदान
के एक ओर कैदियों की वर्कशॉप थीं, जहां वे कारपेंटरी का काम, जूट के सामान
बनाने का काम सीखा करते थे। एक कंप्यूटर रूम था, जहां बाकायदा `ओ' लेवल की
कंप्यूटर शिक्षा की सुविधा कैदियों को उपलब्ध थी।
महिलाओं
के लिये शिक्षा
व्यवस्था और सिलाई का ट्रेनिंग - सेंटर भी था।
उसे वह इंसपेक्टर जिसे एयरफोर्स पुलिस ने उसे लाकर सौंपा था, यह जेल ऐसे घुमा
रहा था जैसे वह कैदी न होकर कोई विज़िटर हो। यह उसकी मानवीय संवेदना की
पराकाष्ठा थी या प्रशान्त का आभिजात्य कि इंसपेक्टर का मन यह गवाही नहीं दे
रहा था कि एयर फोर्स में अफसर रह चुके इस नौजवान को चोर - डकैतों की तरह सीधे
ले जाकर उसकी कोठरी में ठूंस दे। उसका मन इस नौजवान इंस्पेक्टर अनिल मोरे के
प्रति आभार से भर गया था।
इस बाहरी अहाते की दीवारें अपेक्षाकृत कम ऊंची थीं, हालांकि कंटीले तारों की
फेंसिंग पुख्ता थी। इस अहाते केा भीतरी अहाते से अलग करता ऊंची मोटी दीवारों
का गोल विस्तार था, इन दीवारों के मध्य ही एक और बड़ा फाटक था, जिसमें एक छोटी
खिड़की थी जो भीतरी अहाते में खुलती थी। सही मायनों में यहीं से असली जेल
शुस्र् होती थी। यह छोटी खिड़की पार करते हुए एकबारगी उसका दिल दहला था...
जेल! हाथ अनायास ही पेशानी पर छलकती बूंदों को पौंछने में व्यस्त हो गये थे,
पैर उठ कर फाटक में बनी छोटी खिड़की को पार करने लगे।
छोटी खिड़की पार कर उसके पैर जिस कच्चे हरे - भरे अहाते में उतरे थे, उस अहाते
में चारों तरफ इधर - उधर गलियारों और वरांडों की भूलभुलैय्या थी, जिसमें कई
तरह की कोठरियां थीं। बायीं ओर फूलों भरी क्यारियों की तरफ जाते साफ - सुथरे
सुव्यवस्थित गलियारे में वे प्रसिद्ध ऐतिहासिक सेल थी जहां गांधी व नेहरू तथा
अन्य ऐतिहासिक महत्व के राजनैतिक कैदी वर्षों रहे थे। यह सेल पर्यटकों के लिये
वर्ष भर खुली रहा करती हैं। पीले रंग से पुती इस जेल की सारी दीवारें और
कोठरियां एक अजीब सा अवसाद जगाती थीं। दायीं तरफ जाते गलियारों से पहले बड़ा
कुछ कच्चा, कुछ पक्के फर्श वाला आंगन - सा था और उसके एक ओर डोरमेट्रीनुमा
वार्ड बैरक्स थीं जिनमें कई कैदी साथ रहते थे और अन्दर बने पलंगनुमा चबूतरों
पर सोते थे। इन्हीं गलियारों की भूलभुलैया में अन्दर को अंधेरे की तरफ खतरनाक
मुजरिमों की सेल थी। आंगन के पक्के हिस्से में बीचों - बीच एक रसोई थी जो
आधुनिक तरह से बनी था, सफेद टाइल्स और बड़े - बड़े सिंक, बड़े गैस बनर्स।
परातों में ढेर आटा गुंथा रखा हुआ था। एल्युमीनियम के विशाल भगोनों में दाल
और सब्जी।इंस्पेक्टर बता रहा था, खाना कैदी ही बनाते हैं, रविवार या किसी
त्योहार के दिन पूड़ी परांठे और खीर - हलवा बनाने की उन्हें इजाज़त होती है।
किचन के पीछे की ओर महिला कैदियों के सामूहिक सेल थे।
वे दायीं तरफ मुड़े, जहां सामने के ही गलियारे में बी - टायप कैदियों की
स्वतन्त्र कमरेनुमा कोठरियां थीं, उसे उसी में रखा जाना तय था। वह इंसपेक्टर
मोरे के प्रति सच में कृतज्ञता महसूस कर रहा था कि वह उसे कैदी की तरह न लाकर,
एक विज़िटर की तरह सब दिखाता हुआ लाया था।
``बचपन में मैं बाबा के साथ ये जेल देखने आया था... तब यहां हरा - भरा नहीं
था... ये सब्ज़ियों की खेती तब नहीं होती थी। तब क्या पता था कि...'' कहकर
प्रशान्त का गला भर्रा गया। इंसपेक्टर मोरे ने स्नेह से हाथ थाम लिया। वे
तीसरे नम्बर की कोठरी के पास आकर स्र्क गये थे।
`` होता है साहब, कभी - कभी किस्मत करवा ही लेती है कुछ ऐसा और ले आती है...अच्छे
- भले लोगों को भी ऐसी जगह पर। अब चलूं, कोई ज़रूरत हो तो मुझे बताना।'' जेब
से चाभियों का मोटा गुच्छा निकाल कर इंस्पेक्टर मोरे मुड़ गया और दरवाज़ा भिड़ा
दिया गया। उसी मानवीय संवेदना के तहत उसने बहुत आहिस्ते से दरवाज़े के बाहर
के ताले में कुंजी घुमाई, ताकि प्रशान्त को अजीब न लगे। सूने गलियारे में वह
ताले में घूमती चाभी की धीमी आवाज़ भी उसके मर्म को चीरती चली गई। वह उस कोठरी
की दीवारों का रंग को देखने से पहले ही फफक कर रो पड़ा। एक पल को उसकी
स्र्लाई की आवाज़ से इंस्पेक्टर के जूतों की आवाज़ ठिठकी... फिर कुछ पल बाद
भारी बूटों की बोझिल आवाज़ उसके कानों से ओझल हाती चली गयी थी। तब से उसका
आवाज़ और आहटों से ये जो नाता जुड़ा है वह कभी छूटेगा नहीं। आवाज़ों के प्रति
उसका अवचेतन स्थायीरूप से सूक्ष्मग्राही हो चला है।
शुस्र् में वह उस कोठरी में जाने कितने दिनों शांत और अपनी ही पीड़ा से बोझिल,
अर्धचेतन - सा पड़ा हुआ, मौसमों को बीतते देखता रहा। वह बस खाने व चाय के लिये
कमरे से तीन बार निकलता बाकि समय भीतर से ही बाहर की आवाज़ों से
घटनाओं व समय का अन्दाज़ लगाता। सुबह होते ही
कौओं की कांव - कांव की आवाज़ के साथ ही
जेल की दीवारों पर सूरज शीशे के पिसे चूर्ण - सी रोशनी बिखेर जाता। न जाने
कैसे लम्बा दिन आखिरकार अपनी ही सांसे गिनते बीत जाता... सूर्य अस्ताचलगामी
होता हुआ महज महसूस भर होता...विदाई में शायद वह आकाश में आग बिखेर देता...
जिसके बुझते हुए अंगारे जेल की दीवारों पर लाल - सलेटी राख में फैल जाते। इसके
बाद यकायक अंधेरे का परदा फैल जाता। वह आवाज़ की उंगली थाम लेता - दरवाज़ों
के पल्ले खुलने - बन्द होने की आवाज़, कैदियों के हिंसात्मक तरीके से देर रात
तक लड़ने और फिर कराहने की आवाज़, कभी ठहाकों की आवाज़। किसी महिला कैदी की
सिसकियां। कुत्तों की हूक। न जाने कितनी - कितनी आवाजें उसे देर रात तक जगाये
रखतीं।
उसके जेल में आने के साथ ही मानसून का मौसम आ गया था। बरसात उस साल पूरे जोश
से हुई थी, तूफान और आधिंयों के साथ। ये तूफान जेल के टीन - टप्परों को
झिंझोड़ जाते, रसोई की चिमनी से ऐसी आवाज़ आती मानो निर्जन में कोई मातम मना
रहा हो। इस अर्धचेतनता में न जाने क्यों उसकी समस्त इन्द्रिया तो सजग हो गयी
थीं मगर वह अतीत के घटनाक्रमों व अपने अस्तित्व की ओर से लगभग सुन्न होकर इस
कोठरी में जी रहा था।उसकी चेतना को आंधियों - तूफानों ने भी नहीं झिंझोड़ा।
वह बस वर्तमान भर महसूस करता अस्तित्वहीन होकर।
तभी न जाने कब शर्मीली चाल से बसन्त आ गया था। वह अपनी खिड़की से उदास आंखों
से बाहर झांकने लगा था। छत पर बिल्लियों के झगड़ने के स्वर सुनाई देते। जेल
की ऊंची दीवार के उस पार से बसन्त के आगमन के संकेत आने लगे थे। हवा की महक
में था बसन्त... बसन्त के साथ ही स्मृतियां जेल के तिलचट्टों की फौज की तरह
उसके मस्तिष्क पर घेरा डालने लगी थीं।
वह कोठरी से बाहर जाने को व्याकुल हो उठा। एक दिन जब सुबह की चाय के समय उसका
दरवाजा खोला गया तो वह चाय पीकर हमेशा की तरह सर झुकाये कोठरी में लौटा नहीं...
पीपल के निकट जा बैठा। अन्य कैदी भी बैठे हुए धूप सेकते बातें कर रहे थे...
उसे देख अचानक चुप हो गये। उसने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया चुप बैठा रहा। यह
उसका जेल के अहातों में बसते जीवन और इस पीपल के पेड़ से पहला परिचय था। उसके
मर्म में गूंजती आवाज़ों ने शीघ्र ही इन बाहरी दृश्यों से एक रिश्ता बना लिया...
उसे लगा कि इन बाहरी दृश्यों में कुछ तो बोधगम्यता है, कुछ तो रस है...कि उसके
दिनों के टूटे पंख स्वस्थ होने लगे हैं और वे धीरे ही सही कुछ तो उड़ने लगे
हैं।
अब तो वह इस पूरी जेल के चप्पे - चप्पे से परिचित है। उसके सद्व्यवहार की वजह
से एक साल के भीतर - भीतर उसे इतनी आज़ादी मिल गयी थी कि अब वह बिना बंदिशों
के जेल के भीतरी अहाते व बाहरी अहाते के वर्कशॉप वाले हिस्से में घूम सकता
है। यूं भी जेल के सभी कर्मचारी जानते हैं, प्रशान्त एक चुप्पा, अनुशासित कैदी
है। दिन में उसे बाहर निकल कर पेड़ के नीचे बने बैंचों - चबूतरों पर बैठने की
इजाज़त तो है ही, ट्रेनिंग सेन्टर और जेल के बाहरी गलियारे में बने ऑफिस तक
जाने में भी उसे हथकड़ियों की दरकार नहीं। जेल निदेशक तक उससे स्नेह व सम्मान
से बात करते हैं। कैदियों और कांस्टेबलों की कंप्यूटर और अंग्रेजी की कक्षाएं
भी वह लेने लगा है। मगर अधिकतर चुप रहता है। चुप्पी मानो उसके व्यक्तित्व का
ज़रूरी हिस्सा है। बाहर वह दृश्य - दर - दृश्य बदलते माहौल को घूंट - घूंट
पीता है मगर अपने भीतर ही भीतर वह जीवन की नदी के किनारे पसरे कटते कगारों सा
खामोशी से नष्ट होता रहता है। अपनी आत्मा से उलझता है और भीतर ही भीतर
लहुलुहान होता हुआ कराहता है। चेहरे से उदासी टपकती है टप टप... जिसे वह
मुस्कुरा कर पौंछने का प्रयास करता है।
उस बार के बसन्त के बाद जेल का जीवन नीरस नहीं रहा कभी... कितने मीडिया वाले,
एन. जी. ओ. वाले, स्कूलों - कॉलेजों के बच्चे आते, कैदियों के साक्षात्कार
होते... छब्बीस जनवरी - पन्द्रह अगस्त पर नेता - मंत्री लोग आते, सांस्कृतिक
कार्यक्रम होते वह उन सब हंगामों में देह से शामिल होकर भी मन से परे रहता,
चुपचाप... कहीं कुछ सोचता सा। लोग उससे कुछ पूछते तो हां - ना या संक्षिप्त
उत्तर देता, कोई उसके अतीत को कुरेदने का प्रयास करता तो वह मुड़कर चला जाता।
कल ही तो कुछ ट्रेनी फौजी अफसर जेल की विज़िट पर आये थे, इंस्पेक्टर मोरे
द्वारा उसके केस के बारे में जानकर उससे मिलने को उत्सुक हुए तब वह इसी पीपल
के नीचे बैठा था पैर लटकाये, अपने में गुम... उसने उठकर सबसे हाथ मिलाया, नम
आंखों से मुस्कुराता रहा, पर कुछ बोला नहीं। अतीत की सूखी परत जैसे किसी ने
मन के गहरे घाव से छील ली थी। तब से वह बेचैन सा इस पीपल के नीचे बार - बार आ
बैठता है, सुबह भी आया था...दोपहर तक बैठा रहा। वर्कशॉप से लौटने के बाद फिर
आ बैठा है। बचे खुचे खुरंटों को घावों पर से छीलता हुआ... सामने अनार के
छतनार झाड़ के बीच रहता गोरैय्यों का झुण्ड एक खिलन्दड़े अन्दाज़ में चहचहा
रहा है, बाबा बताया करते थे, बोगेनविलीया या अनार जैसे छतनार छोटे झाड़ों में
समूह में रहने वाली ये चिड़ियां `नॉननेस्टिंग बर्ड्स' हैं, घोंसला बना के
प्रजनन की ज़िम्मेदारी खत्म कर चुकी चिड़ियां या फिर प्रजनन करने के लिये साथी
ढूंढने की प्रक्रिया में लगी छड़े नरों व मादा चिड़ियों का झुन्ड हैं।
अचानक उसे एक चटकीली धूप भरा दिन याद आ गया जब फ्लायिंग क्लब के इंचार्ज ने
एक छोटी सी दिखने वाली प्यारी सी लड़की से मिलवाया था। वह दिव्या थी। सुन्दर
की बजाय बहुत
आकर्षक कहना उसके लिये उपयुक्त प्रतीत होता था।
`` तो दिव्या आप छोटा जहाज उड़ाना सीखना चाहती हैं?''
`` हाँ! सैस्ना।''
``रजिस्ट्रेशन करवाया? कल से हमारा नया बैच शुस्र् हो रहा है।''
`` हां, वहां डैड ऑफिस में यही सारी फॉर्मेलिटीज़ पूरी कर रहे हैं।''
`` आपका कोई फ्लायिंग एक्सपीरियंस? जैसे ग्लायडर फ्लायिंग, माइक्रोलाइट?''
`` नहीं।''
`` ज़ीरो से!''
`` हां।''
`` साहस है?''
`` हां क्यों नहीं?''
`` हमारा क्वेश्नेयर तो भरा होगा फार्म के साथ?
`` हां भरा है।''
`` दिव्या, जहाज उड़ाने के लिये जितनी इन्द्रियां भगवान ने दी हैं कम पड़ती
हैं। कुछ अलग से जगानी पड़ती हैं। तो कल से शुस्र् करेंगे। एक पूरा सप्ताह
पहले सिमुलेटर( जहाजनुमा एक इलेक्ट्रोनिक उपकरण, जिसमें हवाई जहाज जैसी ही
जॉयस्टिक होती है और स्क्रीन होती है जिस पर दृश्य वैसे ही बदलते हैं जैसे
आकाश में और ठीक वैसी ही कृत्रिम परिस्थितियां उत्पन्न की जाती हैं जो कि
जहाज उड़ाने में प्रस्तुत होती हैं। इसे ज़मीन पर प्रशिक्षण के लिये काम में
लाया जाता है।)पर।
`` आज से क्यों नहीं?''
`` क्योंकि ये ढीले सलवार कुर्ते में जहाज नहीं उड़ाया जाता। कल से टाइट
ट्राउज़र्स और टी शर्ट में आएंगी आप।''
जहां सैस्ना जैसा छोटा विमान पहली बार उड़ाना दिव्या के लिये एक चुनौती था,
वहीं एक जीवन्त और साहसी लड़की को यूं सिखाना, प्रशान्त के लिये एक नितान्त
नया अनुभव था। ट्राउजर्स और टी - शर्ट में वह बिलकुल बच्ची लगती। सिमुलेटर पर
सीखने में ही उसके धैर्य की पूरी परीक्षा ले डाली थी दिव्या ने पर वह उसे कभी
डांट ही नहीं पाता, कोई गलती करके खुद ही मासूम सा चेहरा बनाती और उसकी ओर से
कोई प्रतिक्रिया न पाकर खिलखिला कर हंस देती। वह उसका उद्भासित चेहरा देखता
रह जाता। कितनी अच्छी है दिव्या। जब बोलती है तो ऐसा लगता है, एक - एक शब्द
मिठास में पगा हुआ है, हर शब्द फूल की तरह खुशनुमा और रसीला। मुस्कुराती तो
काली आंखों की पुतलियां फैल जातीं और उनमें एक अवर्णनीय चमक दिखाई देती।
मुस्कुराते समय जो दांतों की उजली पांत उभरती... तो वह देखता ही रह जाता।
पहला दिन, इस बैच की उड़ान का। यूं ब्रीफींग सिमुलेटर चलाने पर भी होती थी,
पर आज सचमुच का ट्रायल था। सबके दिल धड़क रहे थे। एयर ट्रेफिक , आर. टी. और
मौसम तीनों की ब्रीफिंग शुस्र् हुई।
`` ग्रेवी ( इंर्धन) एज़ पर द प्रोफाइल से... थ्री हण्डरेड। अवर प्रोफाइल इज़
हैण्डलिंग सोर्टी।
दिव्या... लिसन केयरफुली। द फर्स्ट सोर्टी इज़ योर्स। टेक ऑफ, टर्न राइट...
हेडिंग ज़ीरो सिक्स ज़ीरो। क्लाइम्ब टू लेवल जीरो थ्री जीरो। गो आउट बाउण्ड
ट्वेन्टी नॉटिकल माइल्स। कम बैक हैडिंग टू फोर ज़ीरो... ओवर हैड... सर्किट
एण्ड लैण्डिंग।
`` आल द बेस्ट। हैप्पी लैण्डिंग्स।'' उसके बैच के पांच सदस्य एक साथ चिल्लाये।
पहली सोर्टी पर वह दिव्या के साथ था। टेकऑफ ठीक तरह से कर लिया था दिव्या ने,
दोनों सैस्ना जहाज के परों पर उड़ते हुए आकाश में थे। आकाश एकदम साफ और चटक
रोशनी से भरा था।
`` कमोन दिव्या, हाऊ यू आर हैण्डलिंग द जॉयस्टिक? यू आर टू हार्ड ऑन इट। यह
कोई ट्रैक्टर का गियर नहीं है।''
`` दिव्या, थ्रोटल इज़ एट नाइन्टी परसेन्ट, मेक इट सिक्सटी, इट इज़ टू फास्ट
टू हैण्डल।''
``कन्सन्ट्रेट ऑन रडर्स... और माय डियर आर. टी. कॉल्स पर ध्यान दो...और गिव
रिटर्न काल्स...आल्सो।''
`` क्या - क्या करूं? कहां - कहां कन्सन्ट्रेट
करूं?'' दिव्या अब घबरा रही
थी।
`` मैं ने तो पहले ही कहा था।''
दिव्या ने थ्रोटल सिक्सटी पर लाकर स्पीड लिमिट में की और एयर ट्रेफिक
कन्ट्रोल को कॉल दी
`` सैस्ना फोर्टी नाइन ऑप्स नार्मल...रीचिंग ज़ीरो थ्री ज़ीरो।'' और प्रशान्त
की ओर मुस्कुरा कर देखा।
`` कीप आईज़ ऑन होराइज़न... अदरवाइज़ वी विल हिट द ग्राउण्ड। चैक होराइज़न...
अदरवाइज़ यू विल सिंक योरसेल्फ अलोंग विद मी टू...।'' वह चीखा।
दिव्या को सीखते हुए चार महीने हो गये थे और उनके सम्बन्ध अनौपचारिक़ हो चले
थे, मगर वह इन्स्ट्रक्टर ही बने रहना चाहता था और दिव्या दोस्ताना बेतकल्लुफी
से आगे बढ़ना चाहती थी। निसंदेह वे दिन सुन्दर थे। वह अपने भीतरी डरों से उबर
रहा था। उसे नहीं पता था क्यों और कैसे वह लड़की उसके मन में घर बनाने लगी
थी। यह भी पता नहीं था कि वह उसके और अपने बीच कैसा रिश्ता बुनना चाह रहा
था...पर कुछ था ` सलोना - सा' जो पनपता ही जा रहा था उनके बीच। बर्फ की पतली
दीवार दोनों में से कौन तोड़ता? बहुत दिन बीतने पर दिव्या ने यह प्रयास किया,
वह यह तो जान गयी थी कि चुप्पा प्रशान्त ऐसा कोई दु:साहस नहीं करेगा लेकिन वह
यह नहीं जानती थी कि ...प्रशान्त के अवचेतन में तैरते कुछ स्वप्न चेतन से टकरा
कर लहुलुहान हो चुके हैं।
``प्रशान्त सर, मि. राव का आपके बारे में ख्याल है कि आप अब तक के
इंस्ट्रक्टर्स में बेहतरीन हैं उनके शब्दों में ` वण्डरफुल फ्लायर' हैं।
फ्लायिंग भी आपकी बहुत सधी हुई है। कहां से सीखा?''
``मुम्बई के एक फ्लायिंग क्लब से।''
`` फिर किसी एवियेशन कंपनी में पायलट क्यों नहीं बने?'' दिव्या आश्चर्य से
पूछती।
`` नौकरी में ही बंधना होता तो...''
`` तो...''
`` नहीं बंधना चाहता।''
`` तभी शादी भी इसीलिये नहीं की।''
`` हां एक तरह से।''
`` अभी तो वक्त है...''
`` ज़रूरी तो नहीं...''
`` मेरे ख्याल में ज़रूरी है... न सही शादी कोई सोलमेट तो...''
`` मैं ने ज़िन्दगी में ऐसे कॉलम रखे ही नहीं, कुछ जीवन स्वतन्त्र,
निरुद्देश्य
भटकने के लिये भी होने चाहिये न इस समाज में ...किनारे बैठ कर तल का बहाव
देखते हुए।''
`` झूठ है आपका यह फलसफा! खुद को बरगलाने का एक तरीका। अच्छा एक बात कहो
प्रशान्त... जब मैं नहीं आती तुम पूरे बैच के सोर्टीज़ कैन्सल क्यों करवा देते
हो?''
`` किसने कहा?''
`` राधिका ने।''
`` बेवकूफ है वह...दैट इज़ शीयर कोइन्सीडेन्स...।''
`` तो क्या हमारे बैच की फेयरवेल ट्रीट भी कोइन्सीडेन्टली उसी दिन आपने तय की
है जिस दिन मेरा जन्मदिन है?'' दिव्या ने आंखें बड़ी - बड़ी करके पूछा।
`` शायद!'' प्रशान्त मुंह फेर कर मुस्कुरा दिया।
दिव्या ने उसकी आंखों में गहरे झांक कर देखा फिर मुस्कुरा कर अपना बैग उठा कर
` गुड डे सर' कह कर मुड़ गयी। वह देर तक उसकी जाती हुई आकृति देखता रहा। दूर
जाकर उसने भी मुड़कर देखा और दोनों मुस्कुरा दिये थे।
दिव्या का फ्लायिंग का शौक और कोर्स दोनों पूरे हो गये थे। फिर भी वह और
प्रशान्त मिलते रहे। प्रेम जगा और अपने पूरे त्रिआयामी विस्तार के साथ दोनों
के वज़ूदों पर छा गया। कभी दोनों शहर के खूबसूरत स्थानों पर मिलते...खुले
आकाश के नीचे तो कभी दैहिक आकर्षण के वशीभूत प्रशान्त के फ्लेट की बन्द नीली
जादुई दीवारों के बीच गायब हो जाते। कभी उस फ्लेट की छत पर दोनों समानान्तर
लेट संध्या और रात्रि के बीच का संक्रमणकाल निहारा करते। शून्य के नीचे लेटे
हुए तारों को एक - एक कर निकलता हुआ देखने में अनूठा सुख मिलता। प्रत्येक
सितारा उदित होते हुए अथाह गगन में गहराई के नये विस्तार का संकेत करता। ये
गहराइयां अदृश्य हाथों से उन्हें गोद में उठा लेतीं और तब यह कहना कठिन हो
जाता कि धरती सिकुड़ कर उनके आकार व देह में आ गई है या वे ही विस्तृत हो इस
जगती से एकाकार हो गये हैं।
प्रशान्त फ्रीलान्स इन्स्ट्रक्टर के तौर पर फ्लायिंग सिखाता रहा और दिव्या ने
बतौर सेल्स एक्जीक्यूटिव एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर ली। प्रशान्त के
लिये दिव्या जीवन भर के लिये सबसे निकट और सबसे प्रिय हो गयी थी। उसके जीवन्त
प्रेम ने उसके जीवन को नवीन प्रेरणा से भर दिया था... उसे लगने लगा था कि वह
अब भविष्य की दुर्गमतम अड़चनों का सामना हंस कर कर जायेगा।
प्रेम उनके बीच पूरे वेग के साथ बह रहा था, दिव्या के किनारों पर पूरी
पारदर्शिता के साथ और प्रशान्त के किनारे अब भी कहीं धुंधला जाते थे, जब भी
कभी दो प्यार करने वाली बेचैन रूहों से साथ जीवन जीने की बात उठती। शादी!
शादी के नाम पर प्रशान्त ठहरना चाहता था। तीन - चार साल और।
``कैसे प्रशान्त... मैं २४ की हो चुकी हूं। पापा कब तक मानेंगे?''
``तो पापा को गुडबाय कर कर, यहां मेरे साथ रहने चली आओ। अब तुम पचास फेरे लगा
लो या एक भी मत लगाओ हो तो मेरी ही ना।''
``सो तो है।''
`` देखो दिवी, मेरी कुछ व्यक्तिगत परेशानियां हैं जिनसे में कुछ सालों में
उबर आऊंगा, फिर अमेरिका चल कर सैटल होंगे।''
``क्या? प्रशी, परेशानियां तुम मुझे तो बता ही सकते हो।तुम्हीं कहते हो मैं
सोलमेट हूं तुम्हारी।''
``बताऊंगा दिवी वक्त आने दो।जल्दबाज़ी मत करो।''
प्रशान्त के साथ जीवन बिताने के निर्णय में दिव्या को कोई अड़चन नज़र नहीं आती
थी। सांवला सलोना आकर्षक व्यक्तित्व, संतुलित व्यवहार, परिवार एक आम उच्च
मध्यमवर्गीय ढांचे का, पूना शहर के बीचों - बीच अपना बड़ा सा पुराना घर जहां
उसके आई - बाबा रहते हैं। सांगली के आस - पास अंगूरों और आमों के कुछ बाग
जिन्हें प्रशान्त के बड़े भाई संभालते हैं, बड़ी बहन की शोलापुर में शादी हो
चुकी है। कहीं कुछ भी तो उलझन नहीं।
उसे यह समझ नहीं आता था कि क्यों अपने माता - पिता को शहर में अकेला छोड़
प्रशान्त ने शहर से बाहर फ्लायिंग क्लब के पास, अपना वन बेडरूम फ्लैट ले रखा
था। शायद दूरी की वजह से, पर फ्लायिंग क्लब की नौकरी तो अस्थायी थी, सालाना
कान्ट्रेक्ट पर। हर साल उसका कॉन्ट्रेक्ट नया बनता। अब बहुत हो गया, किसी
एविएशन कंपनी में पायलट के पद पर आवेदन करने के लिये उसे मनाना ही होगा।
फ्लायिंग उसके लिये उसका पैशन है, यह बात वह अच्छी तरह जानती थी।
एक रात दोनों प्रशान्त के फ्लैट की टैरेस पर बैठे थे, नि:सीम आकाश को निहारते।
मिग २१ विमानों का अभ्यास जारी था। जू...म ...धरा से उठते... अपने पीछे
ज्वालापुंज लिये उड़ते विमानों की गति मोह रही थी...। दोनों चित्रलिखित से उस
रात्रिकालीन अभ्यास को देख रहे थे।
``प्रशांत, तुम फ्लायिंग क्लब छोड़ कर एयरफोर्स क्यों नहीं जॉइन कर लेते? मैं
देखती हूं कि तुम बड़ी हसरत से इन जहाजों को देखा करते हो। मेरे ख्याल में
तुम उड़ा ही लोगे ये मिग्स।''
एक पल प्रशान्त चुप रहा...दिव्या की सुघड़ कोमल उंगलियां उसके हाथों को सहला
रही थीं। कहीं उसका अहं पिघला और उसके मन के ताले अचानक टूट गये।
``दिवी, ये जहाज... ये मिग २१ ...मैं उड़ा चुका हूं।'' प्रशान्त ने आकाश में
देखते - देखते ही कहा। जैसे एक सम्मोहन के तहत कोई पिछले जन्म की बा |