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कालिन्दी
मुझे जहां जाना था वह एक तीन मंजिला पीली इमारत थी। ढहती हुई सी। जिसके छज्जे लटके हुए थे। अनैतिकता वहां खुले सर घूमती थी।तरह - तरह के गलत - सही कामों में - मुब्तिला वहां बहुत से परिवार थे। अवैध शराब बेचने वाले। बहुत निचले तबके के स्मगलर। नशीली दवाओं का धन्धा करने वाले। फिल्मों में एक्स्ट्रा का काम करने वाले, आर्केस्ट्रा और बार में नाचने वाली लडक़ियां। ऐसी कुछ औरतें जो खुल कर शरीर का धन्धा करती थीं। कुछ ऐसी जो चुपचाप - चुपचाप अपने बच्चों से छिप कर, पति या पिता की सहमति से दैहिक सुख के बदले में घर का खर्चा चला रही थीं। बहुत कम कीमत पर।आह! इतनी कम कि ! ऐसी
पीली इमारतों की एक श्रृंखला थी।
पीली इमारतों के आगे
दलाल(जो अकसर उनके पति या प्रेमी हुआ करते थे) और ग्राहक वहां की औरतों के
जिस्म भाव ताव करते।
गहरे - अंधरे कमरे।
सीलन और बदबुओं से
गंधाते।
ग्राहकों की प्रतीक्षा में। कभी - कभी मैं हैरान होता हूँ, यह सोच कर कि वह एकदम सही माहौल था जो मुझे नशीली दवाओं का आदी बना सकता था। या फिर मैं किसी 'पैडिफिलिस' यानि बच्चों का यौनशोषण करने वाले आदमी या औरत के हाथों रबर के गुड्डे की तरह तोड - मरोड दिया जा सकता था। पूरी गुंजाइश थी उस माहौल में कि दुरगा जैसी कामुक औरत मुझे फुसला लेती या डेविड के गोद में बिठाने वाले खेल मुझे बरबाद कर देते।उस चाल के और बच्चों जैसा ही कोमल शिकार था मैं भी। उस जगह के घातों - प्रतिघातों के प्रति सदा छठी इन्द्रीय जाग्रत रखे हुए 'जमना' मुझे आगाह करती रहती थी। इसके पास मत जा,उसके साथ बात नहीं...इसके कमरे गया तो देखना....उसके साथ खेला तो। फिर भी मैं इन भयावह कल्पनाओं में जीने लगता हूं कि ऐसा हुआ होता तो...क्या होता ? मुझे अजीब का पीडादायक सुख मिलता है इन कल्पनाओं में। मैं अपने अंतस के खाज भरे कोने खुजला कर लहुलुहान कर लिया करता हूं। मीठा दर्द और मीठा सुख। 'कश्टमर' शब्द उस गली के हमउम्र बच्चों के बीच एक डरावना शब्द था। एक पिशाच जो औरतों का गला दबाया करता था। औरतें उसकी गिरफ्त में कराहतीं थीं। एक पिशाच जिसके न आने से -- कभी कटोरदान में रोटी कम पड ज़ाती थीं या फिर बचती तो सब्जी या शोरबे के बिना ही खानी होती थीं। किवदंतियां जुडी थीं इस शब्द से। पहली बार जब यह कान में पडा तो मेरे अलावा बाकि बच्चों को कुछ भी अटपटा नहीं लगा। हम सब बच्चे रात को साढे दस बजे बिल्डिंग की बालकनी में खेल रहे थे। तभी ऊपर आकर छोटू दलाल बोला था -- स्साले रण्डीखाने की औलादों ये कोई खेलने का टैम है। तुम पर तो अफीम भी अब असर नहीं करती। जाओ जाकर सो जाओ। कश्टमरों का टैम है ये। मैं ने 'कश्टमर' कभी नहीं देखा था। एक बार मैं स्कूल से लौटा तो देखा वो किसी आदमी को जल्दी - जल्दी कमरे से धकेल रही थी। मैं ने पूछा, '' ये ही कश्टमर था क्या ?'' वह फटी हुई आंखों से मुझे देखती रही और बिना खाना दिए बिस्तर पर धम्म गिर गई। मैं शाम तक भूखा बैठा रहा। उसके संदूक में रखे पुराने एलबम में पीली पडी हुई तस्वीरें देखता रहा। सारे चेहरे अजनबी। एक तस्वीर में कुछ औरतें थीं, उनमें से एक उसकी मां थी। एक फटा चित्र था जिसमें वह थी दूसरे की आधी बांह ही दिख रही थी। वह इस गली की सारी औरतों से अलग थी। ऐसी जो जिन्दगी अपनी तरह से, अपनी शर्त पर जीती हैं। चाहे वह गलत हो कि सही। ऐसे में अनपढ होना कोई मायने नहीं रखता। बचपन में भी उसका ऐसा कडक़ होना मुझे खुशी देता था। वह सबके सामने चुप्पी सी रहती। अकेले में बहुत बातें करती। वह अपने डर बांटती जिन्हें मैं बहादुर बच्चे की तरह दूर करने की कोशिश करता। वह झगडती अपनी रोजमर्रा की जरूरतों से। तरह - तरह के काम पकडती छोडती। कभी कपडा धोने का साबुन घर - घर बेचती। कभी साडियों के फाल लगाती रात रात तकया मालिश करती औरतों की।
जिन्दगी को दी अपनी संपूर्णता का मोल वह नहीं जानती थी।
उसकी नुची - कुतरी
हुई संपूर्णता का अहसास उसे तभी होता था जब वह नोची या कुतरी जा रही होती थी।
जिन्दगी के साबुत
टुकडे क़ा नोचे - कुतरे जाने का सिलसिला कब शुरू हुआ
,
यह उसकी याददाश्त में धुंधला
पड चुका है। आस - पास की महक से बुरी तरह उकताया - सा मैं उसे देखता हूं। उसकी कुतरी हुई संपूर्णता के साथ उसकी जिजीविषा उसके माथे पर जल - बुझ रही है। यह औरत जीवंत थी मेरे सपनों में। मेरे बचपन में। इसकी और मेरी उम्र में महज पन्द्रह सालों का फर्क है। मेरे बचपन में यह भी किशोरी थी। स्कूल का रास्ता उसकी बातों से महकता। मेरा बस्ता थामे वह दो मील चलती थी मैं उससे कहता कि चाल के और बच्चों की मैं भी वहीं पास के सरकारी स्कूल में पढूंग़ा। इतना चलना नहीं पडेग़ा। '' तू अलग है उन सब से। और देख मैं भी।'' भीड और धुंए से भरा रास्ताआगे चल कर जंगली फूलों से भरा जंगल बन जाता। उसकी बातों से वह रास्ता मजेदार हो जाता था। स्कूल की गली आने से पहले ही वह पलट जाती। मैं चीखतास्कूल के गेट तक चलो। वह गुर्रा कर मना कर देती, ''मुझे और काम नहीं है क्या?'' उसका मुलायम चेहरा रूखा हो जाता। मैं पूरे बचपन इस औरत का मुरीद रहा। नायलोन की सस्ती साडी और सूती सलवार - कुरते में भी परी लगती। उसका सांवला रंग, घुंघराले बाल, बडी आंखों के नीचे के स्याह घेरे, उसकी मांसल पीठ, उघडे पैर और गले की उभरी हड्डी। सब कुछ। मुझे इस पर बहुत गुस्सा आने लगा था बाद में। मुझे स्कूल छोडक़र पता नहीं कहां जाया करती थी वह।उसने साबुन बेचना, वेश्याओं की मालिश करना बन्द कर दिया था। स्कूल से लौटता तो वह कभी कमरे पर नहीं मिलती। शाम को वह मेरी चीख - पुकार सुनती और अपनी मुस्कानों से मेरे बचकाने गुस्से के खारेपन को सोखती जाती। पाव और दूध का कप पकडा कर मुझे प्यार से देखती। वह बहुत खुश रहने लगी थी। पन्द्रह साल का होने तक तो मैं बहुत कुछ बल्कि सब कुछ समझने लगा था। अंग्रेजी स्कूल और यह परिवेश मेरे भीतर विषमता की एक बहुत बडी ख़ाई खोद रहा था। मैं घनेरे असमंजस में था मेरे व्यक्तित्व के भीतर पता नहीं क्या बन - बिगड रहा था। स्कूल में किसी बच्चे से झगडा होने पर मैं अचानक फाहशा औरतों के मुंह से निकलने वाली भाषा बोलने लगता और फिर पी टी सर के हाथों पिटाई होती। यहां चाल के लडक़ों से एकदम अंग्रेजी बोल पडता तो मजाक बनता। वहां नन्स और फादर। यहांपेटीकोट में घूमती औरतेंदूसरी मंजिल में उसके कमरे तक पहुंचने वाली, पेशाब की मंद गंध वाली सीढियों के बीच ही देह और उसके गुह्य रहस्यों को लेकर नित नई कक्षा लगी होती। कामुक आवाजों, गंधों और गालियों से कमोबेश मैं सुन्न हो चला था। एक दिन हम दोनों लेटे - लेटे हल्की रोशनी में डूबे कमरे के कोनों में अंधेरे की बनती बिगडती आकृतियों को घूर रहे थे कि वह बोली। ''मुझे पता है तेरे मन में बहुत सवाल उठने लगे हैं आजकल।'' '''' ''आज
तू सारे सवाल पूछ ले जो तेरे मन में उठते हैं।'' ''तेरी शादी हुई थी'' ''नहीं।'' ''सच्ची
- सच्ची बताऐगी ना।'' ''
मेरी कसम खा।'' ''वैसे ही जैसे और इन्सान आते हैं।'' ''फिर मैं कोई कश्टमर की औलाद हूं'' '' वो सच नहीं है।नहीं। '' तूने सच बताने की कसम खाई है।'' ''तू नहीं समझेगा।'' ''मैं सब समझता हूं।'' ''नहीं समझता।'' ''तू बताएगी नहीं पता था।कसम खा के भी पलटेगी।'' ''
सच। तेरा बाप है। उसका नाम भी
है तेरे स्कूल के रजिस्टर में। उसने छोड दिया मुझे।अब उसकी बात की तो देखना।
ये अंग्रेजी स्कूल में पढ क़र तू कैसे - कैसे सवाल करता है रे। यहीं के सरकारी
स्कूल में पढता तो सवाल नहीं करता। चुपचाप समझने की कोशिश करता।'' सच जानने के बाद तो वह फिल्मों में एक्स्ट्राज क़ा काम करने वाली लडक़ियों, वेश्याओं, दलालों और ऑर्केस्ट्रा और बार में नाचने वाली औरतों वाली उस इमारत से वह निकल भागना चाहता था। ''जमना,
यहां से कहीं और
जाकर रहें।'' ''इसका कहां से देती है ? इससे छोटा और कच्चा झौंपडा चलेगा पर यह नहीं'' ''इसका किराया नहीं देती मैं। ये मेरी मां का कमरा है। खरीदा हुआ।'' ''तू तो कहती थी दूर कहीं रत्नागिरी में तेरा घर है। आम के बाग हैं।'' '' ऐसे ही । वो धन्धेवाली थी। उसने ही ये कोठरी खरीदी थी।रत्नागिरी में तेरे बाप का घर है। '' ''।'' '' और तू भी अब।'' उसकी आंखें फिर पथरा गईं और वह बैठे बैठे दीवार पर सर मारने लगी। पहले हल्के हल्के फिर जोर जोर से। मुझे चिढ हुई इस नाटक से। उस दिन भी मेरे मुंह से 'कश्टमर' शब्द सुनते ही पगला गई थी। शरीफ बनती है।गली के और बच्चे दिनरात 'कश्टमर' की बात करते हैं उनको कोई औरत कुछ नहीं कहती। यह है कि नाटक... तब से मैं
ने उसे कुछ भी कहना पूछना छोड दिया। मुझे शक नहीं यकीन था वह मुझे स्कूल छोड
क़र के धन्धा किया करती थी। अगर नहीं करती तो मेरे अंग्रेजी स्कूल की फीस कहां
से लाती। रात को परियों की कहानियां सुनाते हुए जरूर उसे अफीम चटाती थी। उसका
बटुआ हमेशा दस दस के नोटों से भरा रहता था। एक पासबुक भी रखती थी वह।
वह गलियारे के एक हॉल में दाखिल हुई फिर तुरन्त पलट आई। वह सफेद खंभे के पीछे छिप गया। वह मुड क़र उसी खंभे की तरफ आ रही थी। ''क्या उसने देख लिया ?''मेरा दिल गले तक उछल आया। दौड - दौड क़र,चल - चल कर वैसे भी मेरी सांसे काबू में ही नहीं आ रही थीं। उसकी परछांई दिखी लगा वह हल्की उदास मगर बहुत शांत थी। खंभे के जरा पहले उसने एक बडा दरवाजा धकेला और अन्दर चली गई। मैं ने चैन की सांस ली और खंभे के पीछे से निकल आया। अब मैं वहां एकदम अकेला खडा था, हवा में उडते पत्तों और ठण्डे सन्नाटों के बीच। मैं ने चारों तरफ नजर डालीगलियारे के दोनों तरफ चित्र टंगे थे। बडे अजीब। हरी गाय और जामुनी पहाड। ख़ेतों में झुके हुए अधनंगे, हडियल आदमी - औरतों के झुण्ड। पेडों में उगे लाल फलों पर कुछ रोते कुछ हंसते चेहरे। कैसे चित्र हैं ये बडे भद्दे और डरावने। तभी बहुत से पैरों की धपड - धपड अाहटें सुनाई दीं। कुछ खिलखिलाहटें और बातेंमैं गलियारे के एक खुले हिस्से से बगीचे में कूद गया। उसे दरवाजे में भीतर घुसे पन्द्रह मिनट से ज्यादा हो गए थे। मैं लगातार उस दरवाजे पर नजर टिकाए रहा। अचानक एक डर पेट में गङ्ढा बनाने लगा। पेट में हल्का - हल्का कंपन हुआ जो आतंक का पूर्वाभास होता है।वह इन गलियारों और बडे - बडे क़मरों में खो गई तो मैं क्या करुंगा ? वह बेखबर घर जाऐगी और उसे ढूंढेगी और मैं इस एकदम अजनबी इलाके में खो जाऊंगा। लौटने का रास्ता, ट्रेनका स्टेशन का कुछ भी नहीं पता था मुझे। मैं तो घाटकोपर के आगे कभी आया ही नहीं। मगर कल तो वह वापस आऐगी वह अगर नौकरी करती है यहांअगर नहीं करती हो और बस आज किसी काम से आई हो तो क्या करुंगा ? मुझे लगा पन्द्रह साल का होकर भी बच्चे का बच्चा ही रह गया। लगा चाल के बच्चे जो चिढाते हैं वह सही हैकि मैं दूध पीता बच्चा हूँ, उसके पल्ले से चिपका रहता हूं। अब मेरी हथेलियों में पसीना चिपचिपा रहा था। भूख पेट जला रही थी। आंखों में आंसुओं के कण किरकिरा रहे थे। भीषण असुरक्षा से मन में भर गई। एक इच्छा हुई कि गेट के पास बैठे चपडासी से जमुना बाईजमुना बाई सलुंके के बारे में पूछे। पर अगर उसने मुझे पकड लियाऔर पूछा 'अन्दर कैसे घुसा' तो ?
मैं सहमा हुआ गलियारे के साथ - साथ नीचे घास पर चलता रहाआगे गलियारा बन्द हो गया। खिडक़ियां शुरू हो गयीं। एक के बाद एक, कई - कई मैं हर खिडक़ी के नीचे बने एक पतले चबूतरे पर चढ - उतर कर खिडक़ी - दर - खिडक़ी झांकता हुआ सरकने लगा। कहीं परदे तो कहीं नहीं। कहीं अन्दर बडे क़मरों में हर दीवार पर चित्र ही चित्र और चित्र बनाते लडक़े - लडक़ी। कहीं छोटी - बडी मूर्तियां तो कहीं लोहे और लकडी क़ी अजीब सी आकृतियां बनाते लोग। बडी - बडी लाइटें और कैमरे। भीतर दुबका आतंक अब उत्सुकता में बदल रहा था। एक उम्मीद जागी थी कि अब मैं उसे खोज लूंगा। एक खिडक़ी में मैं ठिठक गया । कमरा खाली था, परदा खुला था। दीवारों पर नंगे मर्द और औरतों के चित्र लगे थे। जवान भी और बूढे और बहुत बूढे नंगे मर्द और औरतें। मैं बुरी तरह अचकचा गया। तब तक मैं ने नंगी औरतों वाली किताबें देख ली थीं। चाल में वो हर कहीं मिलेंगी। सफेद, सुन्दर, नंगी - कामुक औरतें। तब मुझे लगा क्या बकवास है |