![]() |
मुखपृष्ठ | कहानी | कविता | कार्टून | कार्यशाला | कैशोर्य | चित्र-लेख | दृष्टिकोण | नृत्य | निबन्ध | देस-परदेस | परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया | भक्ति-काल धर्म | रसोई | लेखक | व्यक्तित्व | व्यंग्य | विविधा | विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन | स्वास्थ्य
साहित्य कोष | समाचार | |
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact | Share this Page! |
|
|
एक पुलिस वाले की मौत उस शहर
में तीन लोग रहते थे| यों तो दुनिया का कोई शहर ऐसा नहीं है जहां ज्यादा लोग
रहते हों क्योंकि रहते तो वे हैं जो
'रहने'
की परिभाषा में आते हैं बाकि तो दो टांगों वाले जिनावरों
की भीड क़ा रेला होता है जो सुबह से शाम तक सिटी बसों,
टेम्पों, तांगों और लोकल
ट्रेनों में धक्के खाता है| बेटे की नौकरी और बेटी की शादी की उधेडबुन में ही
मानव तन नष्ट करता है मजदूरी कर शाम को ताडी पीना या ऑफिस से आकर लम्बा -
लम्बा पादना और अफसरों को गाली देना मगर सामने मिमियाना बस इसी में उम्र तमाम
करता है| उन तीनों ने पूरे शहर को गधा बना रखा था| वे इशारा करते और शहर ढेंचू ढेंचूं करता| बस फर्क इतना कि वे जिधर इशारा करते उधर से ही शहर ढेंचू ढेंचूं करता| उनको अजान, प्रार्थना या आरती से कोई खास अपनत्व नहीं था| वे पिछले जनम के गिरगिट थे| जनता भोली, थोडी मूरख, थोडी भली होती है| कुल जमा वोट पडते 50 प्रतिशत, इसमें से 10 प्रतिशत खारिज हो जाते, 20 प्रतिशत फर्जी होते, पांच प्रतिशत दूसरे छुटभैय्यों को मिलते और बचे पन्द्रह में से जिसे 7 5 प्रतिशत वोट मिलते बस वही लोकप्रियजननायकहृदयसम्राटजनता का प्याराआंखों का तारा बन जाता| पूरी आबादी से 7 5 प्रतिशत वोट वाला सभी का नायक बनेगा| इस प्रकार के अद्भुत आनंद की सृष्टि इस शहर के लोकतंत्र में ही संभव थी| वे तीनों कभी ये जानने का प्रयास नहीं करते थे कि वोट 50 प्रतिशत ही क्यों पडे? 100 प्रतिशत क्यों नहीं? बाकि प्रचास प्रतिशत का क्या हुआ? वे जानते थे कि बाकि प्रचास प्रतिशत वे लोग हैं जो वोट देने न ही जाएं तो अच्छा वरना सारा गणित गुड ग़ोबर हो सकता है| वैसे भी पच्चास प्रतिशत बेचारे किस्म के बुध्दिजीवी होते हैं जो स्वतन्त्रता की पचास सीढियां चढक़र हांफ चुके हैं| लोकतन्त्र को कुंए में ढकेल खुद किसी खेजडी क़े नीचे सो चुके हैं| पूछने पर खींसें निपोर कर कहेंगे कि '' एक सांपनाथ एक नागनाथ, क्या करें वोट देकर? वाह भाई वाह| इसलिए उन तीनों का राज था| शहर चिडी चुप था| उनके गुर्गे - चंपू पूरे शहर में फैले हुए मजाल कि कोई उनकी शान में गुस्ताखी करे| शेष भीड क़भी तबादले के लिए फडफ़डाती तो कभी मुहल्ले में हैंडपंप खुदवाने के लिए खदबदाती| वे सब कुछ करते| विमान द्वारा दिल्ली धोकने से लगतार 'सुलभ शौचालय' का फीता काटने तक| तब दो टांगों वाला रेवड उनकी जय जयकार करता| उस शहर में वे तीनों रहते थे| अमनचैन, सुखशांति, शहर के किनारों तक पसरा हुआ आराम| चैन खींचना, पर्स मारना, आत्महत्या, हत्या बलवा, बलात्कार, मादक पदार्थों की तस्करी अब ये सब तो शहर में होगा तो होगा ही मगर इन सबका यह मतलब तो नहीं कि शहर में अमनचैन नहीं है? आप देखिए जब भी शहर में कोई मेला प्रदर्शनी लगती है, पूरा शहर दौडा आता है| भेल - पूरी खाता है| बच्चे आईसक्रीम खाते हैं| कुछ वर्गों की बीवियां पर्स आगे लटकाए घूमती हैं और मर्द, बच्चे गोद में लिए साथ - साथ चलते हैं, तो कुछ वर्गों में मर्द आगे चलते हैं बीवियां पर्स लटकाए बच्चों के साथ पीछे| युवतियां यह जानते हुए भी कि शोहदे फिकरे कसेंगे फिर भी अजीब और विचित्र वेशभूषा में मेलों में आऐंगी| खिचडी हिंगलिश बोलेंगी| स्वयं को ऐश्वर्या या करीना के समक्ष तोलेंगी| आप अमन और शान्ति क्या चाहते हैं? अब छेड - छाड अौर बदतमज़ी तो होगी ही| आप भी सब्र रखो| बुध्दिजीवी ठाली कौम है| क़रती कुछ नहीं और 'थूक बिलौने' सबसे सबसे आगे| सो यह तो मानना पडेग़ा कि शहर में अमन चैन है| वो भी उन तीनों के कारण है क्योंकि उनके चम्पू यही बता रहे हैं| आप वही तो मानेंगे जो कोई बताएगा| अपनी अक्ल का इस्तेमाल करते तो वोट पचास की जगह सौ प्रतिशत नहीं पडते? उस शहर में तीन लोग रहते थे और अचानक चौथा रहने आ गया| बस यहीं से जलजला शुरु हुआ| 'रह' तो तीन ही सकते थे| बाकी रेवड में शामिल हो जाओ एक हाऊसिंग बोर्ड का मकान किश्तों पे खरीद लो| 'लूण - तेल-लकडी' क़े हल में गृहस्थी काटो| जवान लडक़ी को घर भेजना, दहेज देना, बेटे की नौकरी की जुगाड क़रवाना, मोहल्ले के गुंडों को रिरियाकर नमस्ते करना और मर जाना बस यही आपके हिस्से में है| सो चौथा रहने आ गया| चौथा कदकाठी से सामान्य मगर पट्ठा मजबूत, तीखे तेवरों, बेधती आंखों और दहाड क़े लिए ख्यातनाम| वो पुलिसवाला था, जिले का बडा अफसर| वर्दी खूब फबती, ऊपर से आई पी एस का तमगा| ये नए छोरे भी अफसर बनते ही अपनी पे आ जाते हैं| अरे भाई सरकारी वर्दी मिली है तो सलाम मारो जो 'रहते' हैं उनकी हाजरी बजाओ बाकि दो टांगों वाले रेवड क़ो जी भर के हांको और लक्ष्मीपूजन में व्यस्त रहो मगर सिरफिरों का आप क्या कर सकते हैं? साले! ईमानदारी, कानून, डयूटी, लॉ एण्ड आर्डर सभी लटका कर घूमते हैं| अरे भाई और भी तो एस पी हैं| बैठे हैं आराम से| पदोन्नति समय पर हो जाती है| जो 'रहते' हैं वो सिफारिश भी तो करते हैं| सेल्यूट बजा दो| मगर नहीं, खब्ती कोई बस में से थोडे ही उतरते हैं? ऐसे ही तो नजर आते हैं| सो चौथा 'रहने' आया तो तीन 'रहने' वालों को तो 'उंगली' हो गयी| एक्स, वाई, जेड़ और अब 'पी'| मामला जमा नहीं| वैसे हवाएं 'पी' के आने से पहले ही संदेशा ले आई थीं कि आदमी कडक़ है| उसूलों वाला है, दस साल में तेरह ट्रान्सफर झेल चुका है| ऐसा नहीं कि पी के शहर आने की बात पर एक्स, वाई, जेड़ ने अपने अपने स्त्रोत नहीं टटोले? आराम की जिन्दगी में बेकार खलल होगा सो ऊपर तक समझाते रहे कि यह आदमी पार्टी के लिए ठीक नहीं है| कार्यकर्ताओं का मनोबल तोडेग़ा मगर 'ठीकरी घडा फोड ग़यी' और पी इस शहर में आ गया| ''
चौप्प साले! है तो खाकी वर्दी
पहने एक आदमी| तुम साले इतने! मुफ्त का खा खाके मुटिया रहे हो| अगेन्स्ट नहीं
कर सकते?
हो गई राजनीति| बोरी बिस्तर
समेटकर गांव में परचूनी की दुकान खोलनी पडेग़ी|'
एक्स ने अपने चंपुओं को
गरिआया| '' इसकी मां का अपने लोगों पर हाथ डाला ना तो साले की पत्थर रगड दूंगा| जनप्रतिनिधि हूं कोई मजाक नहीं| ऐसे खाकी वर्दी वाले मेरी बांयीं जेब में थोक के भाव रहते हैं और ज्यादा स्याणपट्टी करी तो तुम साले किस दिन के लिए हो धिक् है तुम्हें'' जेड ने अपने चंपुओं को धिक्कारा| शहर की
भीड अचकचा गई| दो टांगो वाला रेवड टांगों पर उचक उचक कर झांकने लगा| अखबार
में खबर थी कि एस पी ने कानून और व्यवस्था सुधारने का ऐलान किया है| सारे
थानेदार मुस्तैद हो गए| सिपाहियों ने बेल्ट कस लिए| यातायाता का हवलदार वक्त
पर चौराहे पर खडा होने लगा| शहर में गश्त बढा दी गई| मगर हैरानी कि
'तू डाल - डाल,
मैं पात - पात' वाली स्टाइल
में अपराधों का ग्राफ बढने लगा| रेवड फ़िर भागने लगा| ऐसा कैसे हो सकता है कि
कानून की व्यवस्था किसी रेडलाइट ऐरिया जैसी हो गयी कि छापे मारो पर सुधरती
नहीं| यातायात के लिए चौराहे पर मार्किंग की गयी| जेब्रा क्रॉसिंग बनाए गए|
वन वे कौन कौनसा मार्ग होगा यह खबर अगले दिन अखबारों में दे दी गई|
टैक्सीचालक वर्दी पहनें और दोपहिया चलाने वाले हैलमेट पहनें यह व्यवस्था तय
की गई| पच्चीस तारीख से सब कुछ शुरु|
डॉ.
अरविंद सिंह
|
|
|
मुखपृष्ठ
|
कहानी |
कविता |
कार्टून
|
कार्यशाला |
कैशोर्य |
चित्र-लेख | दृष्टिकोण
|
नृत्य |
निबन्ध |
देस-परदेस |
परिवार
|
बच्चों की
दुनिया |
भक्ति-काल धर्म |
रसोई |
लेखक |
व्यक्तित्व |
व्यंग्य |
विविधा |
|
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact |
|
(c) HindiNest.com
1999-2008 All Rights Reserved. A
Boloji.com Website |
ठ