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अंधेरे
मैं
अभी-अभी जहां से गुज़रा हूं वहां मुझे एक अजीब सी दुर्गंध का अहसास हुआ।सच
में मुझे अपनी नाक-भौं सिकोड़ लेनी पड़ी थी वहां।ज़रूर किसी ने कोई
कूड़ा-कचरा फेंक दिया होगा।इस बात के लिये मुझे अवश्य ही कमेटी वालों से
शिकायत करनी होगी।
लेकिन यह
कॉलोनी तो बिल्कुल नयी-नयी बनी है।जगह-जगह पर कूड़ा-कचरा फेंकने के लिये
ड्रम लगे हुए हैं।और यहां पर तो सभी सभ्य लोग रहते हैं।पढ़े-लिखे अफसर
लोग।तभी तो इस कॉलोनी का नाम ऑफिसर्स कॉलोनी रखा गया है।
अवश्य
ही वहां कोई जानवर मरा पड़ा होगा जो शायद दूर से मुझे दिखलायी नहीं
पड़ा।अफसरों की गाड़ियां दिन-रात इस कॉलोनी में आती जाती हैं।हो सकता है किसी
की गाड़ी के नीचे आकर कुचला गया हो।मुझे वापिस चल कर देखना चाहिए।लेकिन यह
क्या! मैं तो ये सब सोचता-सोचता इतनी दूर निकल आया हूं।अब वापिस जाकर
देखना...नहीं-नहीं! इतना वक्त मेरे पास कहां है।मुझे यहीं पर किसी अफसर के घर
का दरवाज़ा खटखटा कर उन्हें बतला देना चाहिये।यदि जल्दी ही उस मृत जानवर को
वहां से उठवाया न गया तो वह दुर्गन्ध दूर-दूर तक फैलती चली जाएगी।
इस वक्त
दिन के ग्यारह बजे हैं।सभी घरों के दरवाज़े बन्द पड़े हैं।अफसर लोग तो घर पर
होंगे नहीं।अपनी-अपनी ड्यूटी पर गये होंगे।उनकी बीवियों से...न-न! कहीं मुझे
कोई चोर-उचक्का ही न समझ बैठें।कमाल है कोई भी बाहर घूमता या दरवाजे पर खड़ा
भी दिखलाई नहीं पड़ रहा।यहां मेरी जान-पहचान का भी तो कोई नहीं है।
मुझे घर
चल कर पत्नी को बतलाना होगा।वह तो इस कॉलोनी में अक्सर आया करती है।बहुत
तारीफ भी करती है इस कॉलोनी की।
हमारा घर
इस कॉलोनी से थोड़ी दूर ही है।लेकिन लाजवन्ती के तन्दूर की वजह से हमारा इस
कॉलोनी से कुछ सम्बन्ध-सा हो गया है। ये
लाजवन्ती का तन्दूर मुझे पत्नी से ही पता चला था।करीब छ: माह पूर्व पिछली
गर्र्मियों में ही लाजवन्ती ने अपना तन्दूर इस कॉलोनी में जमाया था।यहां
तन्दूर क्या लगा साथ वाली दूसरी कॉलोनियों मे भी इसकी भनक पड़ गयी थी।
मुझे याद
है जब पहली दफा पत्नी तन्दूर से रोटियां लगवा कर लायी थी तो हमने बड़े चाव से
खायी थीं।जब से शहर वाला मकान छोड़ा उसके बाद पहली दफा ही तन्दूर की रोटी
खाने को मिली थी।शहरों में तो जहां-तहां गली-मुहल्लों में तन्दूर मिल ही जाते
हैं।
-मैंने
कहा जी ये अफसरों की कालोनी है बड़ी शानदार।पहले ही दिन जब पत्नी उस कॉलोनी
से हो कर आयी थी तो काफी विस्मय से कहने लगी थी।
-क्यों?
मैंने उत्सुकता से पूछा
था।
-आपको
नहीं पता क्या बढ़िया रहना-सहना है उन लोगों का।घर में सभी तरह की
चीज़ें...ऐशो-आराम...पता नहीं अपनी ज़िन्दगी भी कभी ऐसी होगी कि नहीं।
-तो
सभी घरों के चक्कर लगा आई हो?
मैंने व्यंग्य किया था।
-कहां!
ये सारी खबरें तो तन्दूर पर ही मिल जाती हैं।
-देखो
ये बड़े लोगों की बातें सुनना मेरे को पसन्द नहीं।वहां पर जो सुनती हो वहीं
छोड़ आया करो।नहीं तो उस कॉलोनी में जाना बंद कर दो।दो रोटियां होती हैं घर
पर भी बन सकती हैं।हम जैसे भी हैं अच्छे हैं। मैने स्वयं को कठोर बनाते
हुए कहा था।पत्नी मुंह बिचका कर रह गई थी।अगले रोज़ खाना खाती हुई वह बोली-
एक बात कहूं जी?
-क्या?
रोटी का कोर मुंह में
डालते हुए मैं रूक गया था।
-आज
आपको बड़े लोगों की नहीं छोटे लोगों की बात बताऊंगी।शायद वह मेरी पहले रोज़
वाली बात भूली नहीं थी।
-कहो
तो!
-वो
लाजवन्ती है न तन्दूरवाली।है बड़ी सुन्दर!
पत्नी
की इस बात पर मैं ठहाका मार कर हंस दिया- अपने भाई से रिश्ता करवाना चाहती हो?
हंसी के दर्मियान ही
मैंने कह दिया था।
पत्नी
ने आंखें तरेरीं तो मैं उसी रो में बोला- भई और क्या कहताा?
भला यह भी कोई बात थी जो
तुम बताने चली।मेरी शादी न हुई होती तो तुम कहती भी।पत्नी मेरे मज़ाक से
वाकिफ थी।चेहरे पर गम्भीरता लाती बोली- पूरी बात तो सुनी होती!
-हां-हां
पूरी बात कहो! पत्नी के चेहरे की गम्भीरता देख मैंने भी गम्भीर होने की कोशिश
की।
-अच्छे
भले घर से नाता रखती थी वह तो।लेकिन पति ने धक्के मार कर घर से निकाल दिया
बेचारी को!
-वो
क्यों?
-शक्की
मिजाज का था।
-ये
तो बुरी बात हुई! मैंने अफसोस ज़ाहिर किया।
-अब
किसके पास रहती है?
यों ही पूछ लिया मैंने।
-किसी
पर बोझ नहीं बनाना चाहती थी।मिसेज शर्मा ने सुझाव दिया तन्दूर लगा लिया।बहुत
अच्छी हैं मिसेज शर्मा।अपने गैराज में सर छिपाने को जगह दे दी बेचारी को।
-मिसेज
शर्मा कौन?
मेरे लिए नया नाम था यह।
-किसी
बड़े अफसर की बीवी है।कॉलोनी में ही रहती है।कल मुझे भी ले गयी थीं अपने
घर।चाय-वाय भी पिलाई।टेलीवीजन चल रहा था उनके घर।मैंने भी देखा।हर आदमी तो
ऐसी चीज़ें नहीं खरीद सकता न!
उस
वक्त पत्नी खामोश हो गयी थी।अगले रोज़ फिर उसने उसी कॉलोनी का ज़िक छेड़
दिया- आज तन्दूर पर बैठी थी तो वर्मा साहब आ गए।
-वर्मा
साहब! वो कौन?
मैंने शंकालू सी दृष्टि पत्नी
पर फैंकी।हालांकि इसका आभास उसे नहीं हुआ था।
-बहुत
बड़े अफसर हैं।कॉलोनी में ही रहते हैं।बहुत पैसा है उनके पास।
-क्या
कहते थे वे?
मेरा सन्देह बढ़ चला था।
-मुझे
कुछ नहीं कहा।लाजवन्ती से कह रहे थे।एकाएक पत्नी के बोलने का लहजा बदल गया
था।
-क्या
कह रहे थे?
-बता
रहे थे कि चार साल पहले उनकी शादी हुई थी।लेकिन शादी के कुछ दिन बाद ही उनकी
पत्नी चल बसी।
-तुम्हारे
सामने ही कह रहे थे?
-हां!
बड़े साफ दिल हैं।बहुत उदास दिखाई देते हैं बेचारे कभी-कभी।भगवान ने पैसा
दिया तो बाकी सभी सुख छीन लिए।
-दूसरी
शादी क्यों न करवा ली?
-लाजवन्ती
ने भी यही कहा था। बोले एक उम्र बीत जाने पर सब मुश्किल सा हो जाता है।
-इतने
बड़े अफसर खुद तन्दूर पर आते हैं?
-नहीं
नौकर है।बीमार पड़ गया था।और फिर यही तो उनका बड़पन्न है।मैं
समझ गया।अब रोज़ दिन कॉलोनी की कोई न कोई बात सुनने को मिला करेगी। अगले
रोज़ ऑफिस से लौटते ही मैंने खुद है पूछ लिया- लाजवन्ती का क्या हाल है?
पत्नी रोटी लगा रही थी।
तन्दूर की रोटी देख इसी बात का ख़याल आ गया।
-पता
नहीं मेरे पर इतना विश्वास क्यों करने लगी है।मन की सारी बात कह डालती है।
-क्या
कहा?
पता नहीं क्यों मेरी भी अब इन
बातों में रूचि सी पैदा होने लगी थी।
-कल
शाम को वर्मा साहब की तबीयत भी कुछ ढीली थी।तन्दूर पर लाजवन्ती को आटा देने
आए तो बोले-जरा रोटी बना कर मेरे कमरे में पकड़ाती जाना।लाजवन्ती बड़ी भोली
निकली। देने चली गई...।
-तो
इसमें ऐसी कौन सी बात हो गई?
-लो!
जिस घर में मर्द अकेला रहता हो वहां पराई औरत चली जाए ... तो कुछ नहीं होगा
भला!
-हुआ
क्या?
-वही
हुआ जो अकेले में एक मर्द पराई औरत के साथ कर सकता है।पहले थोड़ी इधर-उधर की
बातें कीं।फिर बोले- लाजवन्ती तू तन्दूर पर मेरे लिए रोटी बनाती है घर आ कर
ही बनाने लग जा।देख सारी उम्र अकेले गुज़ारना मुश्किल है।और फिर मेरे पास ढेर
जमीन जायदाद है। तू कहेगी तो मैं यह नौकरी छोड़-छाड़ कर तुझे अपने गांव ले
जाऊंगा।
-लाजवन्ती
ने क्या कहा?
-बस
यहीं तो गलती कर आई लाजवन्ती।कुछ नहीं कहा। चुपचाप चली आयी।
मैं
कहती हूं यहां सारा दिन दिमाग खराब करने के बाद दो पैसे जुटा पाती है। वहां
एक दिन में रानी बन जाएगी।भला उसे और क्या चाहिए! लेकिन उसे तो दुनिया भर की
चिन्ता खा गई।अरे शादी के बाद उसके पास पैसा आ जाएगा तो लोगों की जुबान अपने
आप बन्द हो जाएगी।फिर कौन सा उसने यहां रहना है।वर्मा ने उसे गांव चलने का तो
कह दिया है।लाजवन्ती की वजह से पत्नी इतने आवेश में क्यों आ गई यह मेरी समझ
में नहीं आया था।मैंने झिड़क दिया- दूसरों के लिए इतना दिमाग खराब करने की
क्या जरूरत।
पत्नी
कुछ दिन के लिए तन्दूर पर नहीं गई थी।तबीयत खराब हो आई थी कुछ। गर्मी के
दिनों में जरा ऊटपटांग खा लिया तो पेट में दर्द या फिर जी मितलाने लगता है। उस रोज
छुटटी का दिन था।मैंने ही पत्नी से जिद्द की- भई लस्सी के साथ तन्दूर की
रोटी हो तो मजा आ जाएगा। तन्दूर
से रोटियां लगवा कर पत्नी लौटी तो उसका चेहरा बुझा हुआ सा था।
-क्या
बात कोई नई खबर लाई हो लाजवन्ती की?
उसे देखते ही मैंने
पूछा।
-बहुत
उलझ गई है बेचारी!
-क्यों?
-वर्मा
उसे जल्दी ही गांव चलने को कहता है।लेकिन वह डरती है।
-किससे?
-आदमी
को सबसे ज्यादा डर अपना ही होता है।यदि उसका उठाया कदम गलत हो जाए तो वह खुद
से ही बदला लेने लगता है।पत्नी यह कैसी फिलॉसफी ले बैठी थी मैं समझ नहीं
पाया। अधिक गहराई तक जाने की मैंने जरूरत ही नहीं समझी। परसों की
बात है। पत्नी केवल लाजवन्ती को मिलने ही गई थी।मुझे बतला कर ही गई थी। मैंने
तो रोका था- क्यों दूसरों के बीच आती हो?
-उनके
बीच कहां आ रही हूं।मुझ पर विश्वास करके इतना कुछ कह देती है मेरा कोई फर्ज
महीं बनता क्या! पत्नी
तीन-चार घंटे बाद लौटी थी।-क्या फैसला किया लाजवन्ती ने?
मैंने पूछा।
-बड़ा
कमीना निकला वर्मा।
-क्यों?
मैं चौंका था।
-दगा
तो दिया ही उसे खराब भी कर गया।मैं अवाक
पत्नी के चेहरे की ओर देखने लगा था।
-लाजवन्ती
खुद ही गई थी आज उसके पास।पक्का करके गई थी कि आज वर्मा से गांव चलने के लिए
कह देगी।
-फिर?
-पहले
तो वर्मा बहुत खुश हुआ।उससे कई तरह की बातें करता रहा।चाय-वाय भी पिलायी
उसे।चार घंटे उसके कमरे में रही लाजवन्ती।इस बीच वर्मा ने उसके साथ वो
किया... यों कह लो कि एक मर्द जो एक रंडी के साथ करता है।
-लाजवन्ती
को अक्ल न आई?
-भोली
निकली।रानी बनने के सपने देख रही थी।मैं जड़ सा बना पत्नी के चेहरे की ओर देख
रहा था।वह ही बोली- चार घंटे बाद धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।बोला- अगर फिर
यहां कदम रखा तो बोटी-बोटी कर दूंगा।
-लाजवन्ती
कुछ न बोली?
-न!
चुपचाप चली आयी।मैं तो कह आई हूं उसे कमीने को बदनाम कर दे कॉलोनी में।नौकरी
से भी जाएगा और बदनामी भी दुनिया भर की।
-लाजवन्ती
की बदनामी न होगी?
-यही
तो वह सोच रही है।इसीलिए झट से कोई निर्णय नहीं ले पाई।
अरे! मैं
उस कॉलोनी से होकर आ रहा हूं।थोड़ा इधर-उधर चक्कर काट कर ही देख लिया होता कि
लाजवन्ती किस जगह पर बैठती है।उसके बारे में इतनी बातें सुन-सुन कर मेरे
दिमाग में उसकी एक आकृति सी बन गई है।उस आकृति से लाजवन्ती की शक्ल तो
मिलाता।यह अनुभव भी हो जाता कि आदमी की कल्पना शक्ति कितनी तेज होती है।और
फिर पत्नी उसकी सुन्दरता की तारीफ किए नहीं थकती है।लेकिन
मुझे जल्दी घर पहुंचना चाहिए और पत्नी से उस दुर्गंध के बारे में बताना चाहिए। अफसरों की कॉलोनी में एक जानवर इतनी देर तक मरा पड़ा रह जाए। अरे मेरी
तो अक्ल मारी गई है।पत्नी तो कल दोपहर से अपने मायके गई हुई है। ये
क्या हमारी कॉलोनी में भी वही दुर्गंध।... मेरे घर के बाहर इतनी भीड़ क्यों?
ये पुलिस की जीप और ...।
-आप
इन्हें पहचान सकते हैं?
मेरे करीब पहुंचते ही एक पुलिस
वाले ने ज़मीन पर पड़ा सफेद कपड़ा एक और सरका दिया है।
-नहीं!
मैं चिल्लाया हूं।
-यह
लाश हमें ऑफिसर्स कॉलोनी में किसी के कमरे से मिली है।किसी ने बताया है कि यह
लाश आपकी पत्नी की है।शायद
इन्होंने आत्महत्या की है।उस कमरे में जो अफसर रहते थे वे तो लापता हैं।
``......''
-आप
इस विषय में कुछ जानते हों तो हमें बतलाएं। इससे हमें काफी मदद मिल सकती है।
``......''
-आप
खामोश क्यों हैं?
कुछ बोलिए ताकि यह लाश हम आपको
दे सकें और आप इसका अंतिम संस्कार अपने हाथों कर सकें।
मैं
बोलूं! इस लाश के बारे में?
अपनी पत्नी के बारे में।न-न !
यह लाश मेरी पत्नी की नहीं हो सकती।यह बदबू भरी लाश ... मेरी पत्नी के जिस्म
से तो मेरे ही बदन की गन्ध आया करती थी।... मेरी पत्नी के जिस्म से तो चन्दन
वन महका करते थे ... मेरी पत्नी...!
विकेश निझावन
मई
1, 2007
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