![]() |
मुखपृष्ठ | कहानी | कविता | कार्टून | कार्यशाला | कैशोर्य | चित्र-लेख | दृष्टिकोण | नृत्य | निबन्ध | देस-परदेस | परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया | भक्ति-काल धर्म | रसोई | लेखक | व्यक्तित्व | व्यंग्य | विविधा | विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन | स्वास्थ्य
साहित्य कोष | समाचार | |
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact | Share this Page! |
|
|
अ प्रतीक... क्या देख रहे हो? कोई अजनबी कान में फुसफुसा गया। 'उ..म..म..... मैंने लगभग नींद से जागते हुए कहा नहीं कुछ नही.....बस उगते सूरज को देख रहा हूं ...।काफी मनमोहक दृश्य है। दुनिया की भीड में लोग कितने बेमानी नजर आते हैं। सिर्फ कुछ ही चीजे ज़ानी पहचानी रह गयी हैं यह उगता सूरज उनमें से एक है। मैने अपने आसपास देखने की कोशिश की पर कोई नजर नहीं आया। दिन में कितने लोग तुम्हारी आंखों के सामने से निकल जाते हैं, किस किस को याद रखते हो। सुबह घर से निकलते हो, शाम को लौट आते हो, सारा दिन लोगों से मिलते हो, किसी को याद रखते हो किसी को भूल जाते हो। पर घर लौट आने के बाद ये सब कुछ कितना गैरजरूरी सा लगता है। हुह... सब कुछ कपडों के साथ खूंटी पे टांग देते हो पर परछांई कहीं टंगती है, परछाईं तो हमेशा रहती है - कंधे पर लदे बेताल की तरह। विचारों का क्या है, आदमी अकेला हो और व्हिस्की का एक पैग हाथ में हो तो, वो भी मस्तिष्क में उमडने ही लगते हैं। वैसे भी कोई प्रतिबन्ध तो है नहीं। खैर........ आजकल लोग अपने हिस्से की रोशनी, हवा, पानी आदि आदि अपनी अपने साथ अपनी जेबों में लेकर घूमते हैं। एक जेब से सिगरेट निकाली और दूसरी से सूरज.. बस..फिर भला ऐसे में किसी दूसरे से क्या मतलब। यदि जेबों में नहीं है तो वो है जन्म और मृत्यु...पर फर्क क्या पडता है... न अपनी खुशी आये न अपनी खुशी चले..... ..दम भी नहीं घुटता...। और कितनी सीमायें अपने कपडों पर जेबों की तरह टांकी जा सकती हैं। ''सीमायें हैं तो सही पर लोग खुश भी तो हैं और........। '' ''बात केवल खुशी की नहीं है, बात है टुकडा टुकडा जिन्दगी और सीमाओं में बटी खुशी की ...।'' ''पेट की सीमा के बारे में क्या खयाल है, भूखे से पूछो वो बतायेगा, वैसे भी सीमायें पूरी तरह सापेक्ष हैं। कोई खुश है और कोई नहीं है।'' ''माना कि सीमायें सापेक्ष हैं पर क्या व्यक्ति व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका अस्तित्व केवल पेट तक ही सीमित है? उसके आसपास कुछ सरोकार हैं........।'' ''व्यक्तित्व भी ठीक है, अस्तित्व भी ठीक है और सरोकार भी समझ में आते हैं पर यदि ये सीमायें बनी हैं तो कोई न कोई कारण तो अवश्य ही होगा। आज जब सब लोग अपनी अपनी जेबों में हाथ डालकर घूम रहे हैं तो इसका भी कारण है .....कि कोई दूसरा जेब न काट ले...। भई..लोग तो इस पर विश्वास भी करते हैं।'' ''ये विश्वास तो व्यक्तिगत है। पर व्यक्तिगत विश्वास की जगह समाज में तो होती नही है, व्यक्ति कोई इकाई नहीं है। सब एक दूसरे से जुडे हैं। सबका अपना अपना अस्तित्व है पर अपनी जगह पर। जहां बात समुदाय या समाज की होती है वहां तुम्हारा कोई अलग अस्तित्व नहीं रह जाता। गत विश्वास व्यक्ति को अपने तक ही सीमित रखने चहिये। बात सीमायें खींचने की और टुकडों में......।'' अचानक नजर घडी पर पड ग़यी। सात बज रहे थे। सिगरेट पीने का मन हो रहा था पर जेब में रखे सूरज की याद आते ही हंसी आ गयी। तपन घर आ गया होगा। तेज कदमों से चल पडा।तपन बाहर बरामदे की धूप में बैठा अखबार पढ रहा था। गेट खुलने की आवाज शायद उसने सुन ली थी। सामने से अखबार हटाकर उसने मेरी तरफ देखा और फिर अखबार सामने टेबल पर रख दिया। ''कोई खास खबर नहीं है क्या? '' मैंने पास पडी क़ुर्सी पर बैठते हुए पूछा। ''खास
खबर तो मैं लाया हूं।'' ''क्या?'' ''जन्मेजय को जानते हो, मिश्रा की पार्टीमें मुलाकात हुई थी...।'' 'हां, तो...।'' ''उसने आत्महत्या कर ली भई..लोग तो इस पर विश्वास भी करते हैं।'' ''उहूं.. अजीब बात है, वो तो काफी मस्त आदमी था।'' तपन कुछ नहीं बोला। परेशान दिखायी पड रहा था। वैसे भी तपन काफी इमोशनल है। पता नहीं किस किस के बारे में सोचा करता है।लोगों के अपने अपने विश्वास हैं, अपनी अपनी मान्यताएं हैं जीवन और मृत्यु को लेकर। जिन्दा रहने या न रहने के लोगों के पास व्यक्तिगत कारण हैं, कम से कम मैं तो ऐसा ही सोचता हूं। पर तपन ऐसा नहीं सोचता, मैं जानता हूं। ''...व्यक्तिगत विश्वास का आधार क्या है? हमारे सरोकार हमें एक दूसरे से किस हद तक जोडते हैं?'' जीने का अर्थ क्या केवल कैलकुलेटर के बटन दबाने की तरह है जहां एक और एक मिलकर दो होते हैं, फिर एक और एक ग्यारह करने वाले लोग भी तो हैं। हमारे सरोकार यदि व्यापक नहीं हैं तो ..... और व्यापकता की सीमा क्या है? फिर सीमाएं...।'' ''बकवास है...।'' उसी अजनबी की आवाज। किसी ने सही कहा है कि कुछ बातें फालतू होती हैं। अचानक तपन का चेहरा याद आ गया और फिर जन्मेजय की मौत। मुझे लगा कि जन्मेजय की मौत पर मेरी प्रतिक्रिया से तपन को मायूसी हुई है। वो चाहता था कि मैं कुछ कहूं, कुछ और कहूं। पर क्या? अब कहा या किया ही क्या जा सकता था। मैं न तो अपने व्यक्तिगत मामलों पे किसी से बात करता हूं और न ही दूसरों के मामलों में हस्तक्षेप। यदि कोई दूसरा ऐसा करता है तो मुझे पसन्द नहीं। जन्मेजय की मौत उसका नितान्त व्यक्तिगत मामला था और ऐसे में तपन मुझसे किस तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता है, मैं समझ नहीं पाया। ''दुःख
नहीं हुआ जन्मेजय की मौत का...?'' ''मैं जन्मेजय को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। लेकिन हर ऐसी मृत्यु के पीछे दुनिया से छूट कर अलग रह जाने की विडम्बना ही होती है। क्यों इतना आत्मकेंद्रित हो गया है जीवन...।हर आदमी...।अपनी जिन्दगी टुकडे टुकडे क़र के, उसे अपनी जेबों में भर के कोई भला कितने दिन जी सकता है। जन्मेजय की मौत के जिम्मेदार सब हैं और खुद जन्मेजय भी।'' लगा कि कोई सर्द आवाज झुरझरी बनकर रीढ क़ी हड्डी में उतर गयी हो। मुझे अपने कानों में सूंऽऽऽऽ की आवाज स्पष्ट सुनायी दे रही थी।मन हुआ कि पकड क़र जान से मार दूं। पर किसे? शायद जन्मेजय ने भी यही सोचा होगा। – अंशुमान अवस्थीग्राफिक्स पूर्णिमा वर्मन |
|
|
मुखपृष्ठ
|
कहानी |
कविता |
कार्टून
|
कार्यशाला |
कैशोर्य |
चित्र-लेख | दृष्टिकोण
|
नृत्य |
निबन्ध |
देस-परदेस |
परिवार
|
बच्चों की
दुनिया |
भक्ति-काल
| धर्म |
रसोई |
लेखक |
व्यक्तित्व |
व्यंग्य |
विविधा |
|
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact |
|
(c) HindiNest.com
1999-2007– All Rights Reserved. A
Boloji.com Website |