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नींद नहीं आती

घड-घड-घड-घड, टिक-टिक, चट, टिक-टिक-टिक, चट-चट-चटगुजर गया ज़माना गले लगाए ए......ऐ...खामोशी और अंधेरा।  अंधेरा-अंधेरा।  आंख एक पल के बाद खुली तकिया के गिलाफ की सफेदी।  अंधेरा मगर बिलकुल अंधेरा नहीं।  फिर आंख बन्द हो गयी।  मगर पूरा अंधेरा नहींआंख दबा कर बन्द की फिर भी रौशनी आ ही जाती हैअंधेरा, पूरा अंधेरा क्यों नहीं होता? क्यों नहीं ? क्यों नहीं?

बडा मेरा दोस्त बनता है, जब मुलाकात हुई, आइये अकबर भाई, आपको तो देखने को आंखें तरस गयीं।  हें...हें....हेंकुछ ताजा कलाम सुनाइये।  लीजिये सिगरेट का शौक फरमाइये।  मगर समझता है, शेर खूब समझता है।  वह दूसरा उल्लू का पठ्ठा तो बिलकुल मूढ है।  आख्ख़ाह - आज तो आप बिलकुल नयी अचकन पहने हैं।  नयी अचकन पहने हैं.... तेरे बाप का क्या बिगडता है जो मैं नयी अचकन पहने हूं।  तू चाहता है कि बस तेरे पास ही नयी अचकन हो और शेर समझना तो दूर की बात, सही पढ भी नहीं सकता।  नाक में दम कर देता है।  बेहूदा - बत्तमीज क़हीं का मगर बडा भारी दोस्त बनता हैऐसों की दोस्ती क्या।  मेरी बातों से उसका दिल बहल जाता है।  बस यही दोस्ती है, मुफ्त का मुसाहिब मिला, चलो मजे हैं... ख़ुदा सब कुछ करे गरीब न करे।  दूसरों की खुशामद करते करते जबान घिस जाती और वह है कि चार पैसे जो जेब में हमसे जादा हैं तो मिजाज ही नहीं मिलते।  मैने आखिर एक दिन कह दिया कि मैं नौकर हूं कोई आपका गुलाम नहीं हूं।  तो क्या आंखें निकाल कर लगा मुझे दिखाने बस जी में आया कि कान पकड क़े एक चांटा रसीद करूं, साले का दिमाग ठीक हो जाय

टप-टप-खट, टप-टप-खट, टप-टप-खट, टप-टप-टप.... ....
स वक्त रात को आखिर यह कौन जा रहा है? मरन है उसकी और कहीं पानी बरसने लगे तो मजा है।  लखनऊ में जब मैं था।  एक सभा में मूसलाधार बारिश।  अमीनाबाद का पार्क तालाब मालूम होता था।  मगर लोग हैं कि अपनी जगह से

टस से मस नहीं होतेऔर क्या है - जो यों सब जान पर खेलने को तैयार हैं।  महात्मा गांधी के आने का इंतजार है।  अब आए- तब आए।  वह आए - आए - आए।  वह मचान पर महात्मा जी पहुचे.... ज़ै....ज़ै....ज़ै.... ख़ामोशी

''मैं आप लोगों से यह कहना चाहता हूं कि आप लोग विदेशी कपडा पहनना बिलकुल छोड दें।  यह सेतानी गौरमेंट....''

यहां पानी सर से होकर पैरो से परनालों की तरह बहने लगा।  कुदरत मूत रही थी।  सेतानी गौरमेंट, सेतानी गौरमेंट की नानी।  इस गांधी से शैतानी गौरमेंट की नानी मरती है।  हा-हा शैतानी और नानी।  अकबर साहब आप तो माशाअल्ला शायर हैं।  कोई राष्ट्रीय गीत रच डालिये।  यह गुल और बुलबुल की कहानियां कबतक।  कौम की ऐसी की तैसी, कौम ने मेरे साथ कौन - सा अच्छा सलूक किया है जो मैं गुल और बुलबुल को छोड क़र कौम के आगे दुम हिलाऊं थिरकूं

मगर मैं कहता हूं कि मैने आखिर किसी के साथ कौन सा बुरा सलूक किया कि सारा जमाना हाथ धोकर पीछे पडा है।  मेरे कपडे मैले हैं....।  उनसे बू आती है... बदबू सही।  मेरी टोपी देख कर कहने लगा कि तेल का धब्बा पड ग़या, नयी टोपी क्यों नहीं खरीदते? क्यों खरीदूं नयी टोपी.... नयी टोपी, नयी टोपी, नयी टोपी में क्या मोर के पंख लगे हैं? बहुत इतरा के साथ चलते थे जो, वह जूतियां चटखारते फिरते हैं आज, हम औजेताला-ए-लाल-ओ-गुहर को....

वाह...वाह क्या बेतुकापन है।  जार्ज पंजुम के ताज में हमारा हिन्दुस्तानी हीरा हैले गए चुरा के अंग्रेज, रह गये न मुंह देखते।  उड ग़यी सोने की चिडिया, रह गयी दुम हाथ में अब चाहते हैं दुम भी हाथ से निकल जाये।  न दुम छूटने पाए।  शाबाश है मेरे पहलवान, लगाए जा जोर।  दुम छूटी तो इज्ज़त गयीक्या कहा? इज्ज़त? इज्ज़त ले के चाटना है।  सूखी रोटी और नमक खाकर क्या बांका जिस्म निकल आया है।  फाका होतो फिर क्या कहना, और अच्छा है फिर तो बस इज्ज़त है और इज्ज़़त के ऊपर पाक खुदा  ़ ़ख़ुदा बन्दे पाक, अल्लाह बोरी ताला, रब्बुल इज्ज़त परमेश्वर परमात्मा लाख नाम लिये जाएजल्दी-जल्दी और जल्दी क्या हुआ? रूहानी सुकून? बस तुम्हारे लिये यही काफी है।  मगर मेरे पेट में दोजख़ है।  दुआ करने से पेट नहीं भरता, पेट से हवा निकल जाती है।  भूख और जादा मालूम होने लगती है, भौं-भौं-भौं....

अब इनका भौंकना शुरू हुआ तो रातभर जारी रहेगा।  मच्छर अलग सता रहे हैं।  तौबा है तौबा! एक जाली का पर्दा गर्मियों में बहुत आराम देता है।  मच्छरों से निजात मिलती है।  मगर क्या निजात क्या? दिन भर की मेहनत, चीख पुकार, कडी धूप में घंटों एक जगह से दूसरी जगह घूमते-घूमते जान निकल जाती हैअम्मा कहा करती थीं अकबर धूप में मत दौड, मेरे पास आ के लेट बच्चेलू लग जायेगी तुझे बच्चे।  एक मुछत हो गयी उसे भी।  अब तो ये बातें सपना मालूम होती हैं और मौलवी साहब हमेशा तारीफ करते थे।  देखो, नालायको, अकबर की देखो, उसे शौक है पढने का।  सपना, वो सारी बातें सपना मालूम होती हैं।  मैं बस्ता तख्ती लिये दौडता हुआ वापस आता था।  अम्मा गोद से चिपटा लेती थी।  मगर क्या आराम था।  उस वक्त भी क्या आराम था।  ये सब चीजें मेरी किस्मत में ही नहीं।  मगर जो मुसीबत मैं बरदाश्त कर चुका शायद ही किसी को उठानी पडी हो।  उसे याद करने से फायदा? खैराती अस्पताल, नर्से, डाक्टर सब नाक भौ चढाए और अम्मा का यह हाल कि करवट लेना मुहाल और उनके उगालदान में खून के डले के डले।  मालूम होता था कि गोश्त के लोथडे हैं.... और मैं सबको खत पे खत लिखता था।  वही सब जो रिश्तेदार बनते हैं।  आइये अकबर भाई, आइये, आपसे बरसों से मुलाकात नहीं हुई।  यही उन्हीं के मा-बाप।  क्या हो जाता अगर जरा और मदद कर देतेदुनिया भर के पाखंड पर पानी की तरह दौलत बहाते हैं किसी रिश्तेदार की मदद करते वक्त मल-मल के पैसे देते हैं और फिर अहसान जताना इतना कि खुदा की पनाह।  उस दिन मैं कहीं बाहर गया हुआ था, उन्हीं महाशय की अम्मीजान, अम्मा को देखने आयी।  मैं जब पहुंचा तो उन्हें आए चन्द मिनट हुए थे।  चेहरे से टपक रहा था कि उन्हें डर है कि जीवाणु उनके सीने में न घुस जायें मगर बीमार को देखने का फर्ज है।  सवाब का काम है।  यह सब तो अपनी जगह।  उल्टे मुझे डांटना शुरू कर दिया।  कहां गये थे तुम अपनी अम्मा को छोड क़र।  इनकी हालत ऐसी नहीं कि इन्हें इस तरह छोडा जाये

मरीज क़े मुंह पर इस तरह की बातें- मैं गुस्से से खौलने लगा।  मगर मरता क्या न करता।  अस्पताल का खर्च इन्हीं लोगों से लेना था।  मेरे बीवी बच्चे का ठिकाना इन्हीं लोगों के यहां था... मेरी शादी का जिसने सुना विरोध किया।  मगर अम्मा बेचारी का सबसे बडा अरमान मेरी शादी थी।  अकबर की दुल्हन बियाह के लाऊं, बस मेरी यह आखरी तमन्ना है।  लोग कहते थे घर में खाने को नहीं शादी किस बूते पर करेगी? अम्मा कहतीं थीं, खुदा रोजी देने वाला है।  जब मेरा रिश्ता तय हो गया, शादी की तारीख निश्चित होगयी, शादी का दिन आ गया, तो वही लोग जो विरोध करते थे सब बारात में जाने को तैयार होकर आगये।  अम्मी की सारी बची बचाई पूंजी मेहमानदारी और शादी की रस्मों में खर्च हो गयी।  गैस की रौशनी, रेशमी अचकनें, पुलाव, बाजा, मसनद, हंसी-मजाक, भीड।  ख़ाने में कमी पड ग़यी।  बावर्ची ने चोरी की।  बादशाह अली साहब का जूता चोरी गया।  जमीन-आसमान एक कर दिया।  अबे उल्लू के पठ्ठे तूने जूता संभाल कर क्यों नहीं रखा।  जी हुजूर, कुसूर मेरा नहीं- मेहर का झगडा शुरू हुआ।  मोज्जिल और मोअज्जल की बहस।  मुंह दिखाई की रस्म।  सलाम कराई की रसम।  मजाक, फूल गाली गलौज शादी होगयी।  अम्मा का अरमान पूरा होगया...

मुहर्रम अली बेचारा चालीस साल का होगया उसकी शादी नहीं हुई।  अकबर मियां शादी करवा दीजिये शैतान रात को बहुत सताता है।  शादी खुशी।  कोई हमदर्द बात करने वाला जिसे अपने दिल की सारी बातें अकेले सुना दें।  कोई औरत जिससे मुहब्बत कर सकें।  दो घडी हंसें, बोलें, छाती से लगा, प्यार करे- अरे मान भी जाओ मेरी जान।  मेरी प्यारी, मेरी सबकुछ।  जुबान बेकार है।  हाथ, पैर, सारा जिस्म, जिस्म का एक-एक रोंगटा.. क्यों आज मुझसे नाराज हों, बोलो।  अरें, तुमने तो रोना शुरू कर दिया।  खुदा के वास्ते बता, आखिर क्या बात है।  देखो, मेरी तरफ देखो तो सही।  वह आई हंसीं, वह आई होंटों पर।  बस अब हंस तो दो।  क्या दो दिन की जिन्दगी में बेकार का रोना-धोना।  ... ओ....हो...  यों नहीं यों- और  ...और जोर से मेरे सीने से लिपट जाओ  ...लखनऊ के कोठों की सैर मैने भी की है।  ऐसा गरीब नहीं हूं कि दूर ही दूर से देखकर सिसकियां लिया करूं

आइये हुज़ूर अकबर साहब यह क्या है जो मुद्दतों से हमारी तरफ रूख ही नहीं करते।  इधर कोई नयी चलती हुई गज़ल कही हो तो इनायत फरमाइये।  गाकर सुनाऊं? लीजिये पान नौश फरमाइये।  , लो और लो, जरा दम तो लीजिये।  नहीं आज माफ फरमाइये, फिर कभी।  मैं तो आपकी खादिम हूं, रूपये की गुलाम हूं।  समझती है मेरे पास टके नहीं।  रूपये देखकर राजी होगयी।  क्या सुनाऊं हुजूर  ...तबला की थाप, सारंगी की आवाज, ग़ाना-बजाना।  फिर तो मैं था और वो थी और सारी रात थी।  नींद जिसे आयी हो वह काफिर।  यह रातों का जागना, दूसरे दिन सरदर्द, थकावट, चिडचिडापन

अम्मा की बीमारी के जमाने में उनकी पलंग की पट्टी से लगा घंटों बैठा रहता था और उनकी खांसी।  कभी-कभी तो मुझे खुद डर मालूम होने लगता, मालूम होता था कि हर खांसी के साथ उसके सीने में एक गहरा जख्म और पड ग़या।  हर सांस के साथ जैसे जख्मों पर से किसी ने तेज छुरी की बाढ चला दी और वह घडघडाहट, जैसे किसी पुराने खंडहर में लू चलने की आवाज होती है।  डरावनी।  मुझे अपनी मां से डर मालूम होने लगा।  इस हड्डी-चमडे क़े ढांचे में मेरी मां कहां

मैं उनके हाथ पर हाथ रखता, धीरे से दबाता, उनकी आधी खुली आधी बन्द आंखें मेरी तरफ मुडतीं, उनकी नजर मुझ पर होती।  उस वक्त इस जर्जर, हारे हुए मुर्दा जिस्म भर में सिर्फ आंखें जिन्दा होतीं।  उनके होंठ हिलते अम्मा-अम्मा आप क्या कहना चाहती हैं।  जी  ....मैं अपना कान आपके होठों के पास ले जाता।  वह अपना हाथ उठाकर मेरे सिर पर रखतीं।  मेरे बालों में उनकी उंगलियां मालूम होता था फंसी जाती हैं।  और बह छुडाना नहीं चाहतीं।  बहुत देर करदी, जाओ तुम सो रहो  ...अम्मा यों ही पलंग पर लेटी हैं।  एक महीना, दो महीना, तीन महीना, एक साल, दो साल, सौ साल, हज़ार साल।  मौत का फरिश्ता आया।  बत्तमीज, बेहूदा कहीं का।  चल निकल यहां से भाग।  अभी भाग वरना तेरी दुम काट लूंगा।  डांट पडेग़ी फिर बडे मियां की।  हंसता है।  क्यों खडा है सामने दांत निकाले।  तेरे फरिश्ते की ऐसी-तैसी।  तेरे फरिश्ते की...।

सारी दुनिया की ऐसी-तैसी, मियां अकबर तुम्हारी ऐसी-तैसी।  जरा अपनी काया पर गौर फरमाइये।  फूंक दूं तो उड ज़ाए, मुशायरों में पढेंग़े तो चिल्लाकर, बडे बने हैं गुर्राने वाले।  मुशायरों में तारीफ क्या हो जाती है कि समझते हैं  ....क्या समझते हैं बेचारे, समझेंगे क्या, बीवीजान कुछ समझने भी देंसुबह से शाम तक शिकायत, रोना-धोना।  कपडा फटा है।  बच्चे की टोपी खो गयी, नई खरीद कर ले आओ, जैसे मेरी अपनी नई टोपी है।  कहां खो गयी टोपी।  मैं क्या जानूं कहां खो गयी।  उसके साथ कोने-कोने में थोडी भागती फिरती हूं।  मुझे काम करना होता है, बर्तन धोना, कपडे सीना।  सारे घर का काम मेरे जिम्मे है।  मुझे किसी की तरह शेर कहने की फुर्सत नहीं।  सुन लो खूब अच्छी तरह से मुझे काम करना होता है।  मगर छत्ता छेड दिया, अब जान बचानी मुश्किल हुई, क्या कैची की तरह जुबान चलती है।  माशाअल्लाह, खुदा बुरी नजर से बचाए।  अच्छी तरह जानते हो मेरे पास पहनने को एक ठिकाने का कपडा नहीं है।  लडक़ा तुम्हारा अलग नंगा घूमता है।  हाय अल्लाह, मेरी किस्मत फूट गयी।  अब रोना शुरू होने वाला है।  मियां बेहतर यही है कि तुम चुपके से खिसक जाओ।  इसमें शरमाने की क्या बात है।  तुम्हारी मर्दानगी में कोई फर्क नहीं आता, खैरियत बस इसी में है कि खामोशी के साथ खिसक जाओ।  हिजरत करने से एक रसूल की जान बची।  मालूम नहीं से मौकों पर रसूल बेचारे क्या करते थे।  औरतों ने उनकी नाक में भी दम कर रखा था।  ऐ खुदा, आखिर तूने औरत क्यों पैदा की

मुझ जैसा गरीब कमजोर आदमी तेरी इस अमानत का भार अपने कंधों पर नहीं उठा सकता और कयामत के दिन मैं जानता हूं क्या होगा।  यही औरतें वहां भी ऐसी चीख-पुकार मचाएंगी, ऐसी-ऐसी आदाएं दिखाएंगी, वह आंखें मारेंगी कि अल्ला मियां बेचारे खुद अपनी दाढी ख़ुजाने लगें।  कयामत का दिन आखिर कैसा होगा।  सूरज आसमान के बीचो बीच आग उगलता हुआ, मई, जून की गर्मी उसके सामने क्या होगी, गर्मी की तकलीफ तौबा-तौबा अरे तौबा।  यह मच्छरों के मारे नाक में दम नींद हराम हो गयी।  पिन-पिन, चट।  वह माराआखिर यह कम्बख्त न हों, मगर क्या ठीक।  कुछ ठीक नहीं।  आखिर मच्छर और खटमल इस दुनियां में खुदा ने ही किसी वजह से पैदा किये? पता नहीं पैगम्बरों को मच्छर खटमल काटते हैं या नहीं।  कुछ ठीक नहीं, कुछ ठीक नहीं।  आपका नाम क्या है, मेरा क्या नाम है।  कुछ ठीक वाह-वाह-वाह, खुदा की इच्छा

मियां अकबर इतना भी अपनी हद से बाहर न निकलिये।  और क्या है? नदी में बह चले।  अंगूर खट्टे, आपको खटास पसंद है, पसंद से क्या होता है, चीज हाथ भी तो लगे।  मुझे घोडा गाडी पसंद है मगर करीब पहुंचा नहीं कि वह दुलत्ती पडती है कि सर पर पांव रखकर भागना पडता है।  और मुझे क्या पसंद है? मेरी जान।  मगर तुम तो मेरी जान से प्यारी हो, चलो हटो, बस रहने भी दो, तुम्हारी मीठी मीठी बातों का मजा मैं खूब चख चुकी हूं।  क्यों क्या हुआ, हुआ क्या मुझसे यह बेगैरती नहीं सही जाती।  तुम जानते हो कि दिनभर लौंडी की तरह काम करती हूं , किसी खिदमतगारिन को एक महीने से जादा टिकते नहीं देखा।  मुझे साल भर से जादा हो गये मगर कभी जो जरा दम मारने की फुर्सत मिली हो।  अकबर की दुल्हन यह करो।  अकबर की दुल्हन वह करो...अरे-अरे क्या, हुआ क्या तुमने तो फिर रोना शुरू किया

मैं तुम्हारे सामने हाथ जोडती हूं.... मुझे यहां से कहीं और ले जा के रखो।  मैं शरीफजादी हूं।  सबकुछ तो सह लिया, अब मुझसे गाली बर्दाश्त न होगी।  गाली-गाली, मालूम नहीं क्या गाली दी।  मेरी बीवी पर गालियां पडने लगीं, या अल्लाह, या अल्लाह।  इस बेगम कम्बख्त का गला और मेरा हाथ।  उसकी आंखें निकल पडीं ज़ुबान बाहर लटकने लगी।  हो जा अब इस दुनिया से रूखसत।  खुदा के लिये मुझे छोड दो।  कुसूर हुआ माफ करो, अकबर मैने तुम्हारे साथ अहसान भी किये हैं  .....अहसान तो जरूर किये हैं।  अहसान का शुकि्रया अदा करता हूं , मगर अब तुम्हारा वक्त आगया।  क्या समझकर मेरी बीवी को गालियां दी थीं।  बस खत्म, आखिरी दुआ मांग लो।  गला घोटने से सर काटना बेहतर है।  बालों को पकड क़र सर को उठाया जबान एक तरफ निकली पड रही है, खून टपक रहा है।  आंखें घूर रही हैं  ....या अल्लाह आखिर मुझे क्या हो गया।  खून का समंदर।  मैं खून के समंदर में डूबा जा रहा हूं।  चारों तरफ से लाल-लाल गोले मेरी तरफ बढते चले आ रहे हैं।  वह आया, वह आया।  एक, दो, तीन सब मेरे सर पर आकर फटेंगे।  कहीं यह दोजख़ तो नही, मगर ये तो गोले हैं आग के शोले नहीं।  मेरे तन-बदन में आग लग गयी।  मेरे रोंगटे जल रहे हैं।  दौडो, अरे दौडो, खुदा के लिये दौडो ।  मेरी मदद करो, मैं जला जा रहा हूं मेरे सर के बाल जलने लगे।  पानी, पानी कोई सुनता क्यों नहीं? खुदा के वास्ते मेरे सर पर पानी डालो।  क्या इन जलते हुए अंगारों पर से मुझे नंगे पैर चलना पडेग़ा? क्या मेरी आंखों में दहकते हुए लोहे की सलाखें डाली जाएंगी? क्या मुझे खौलता हुआ पानी पीने को मिलेगा? ये शोले मेरी तरफ क्यों बढते चले आरहे हैं? ये शोले हैं या भाले? आग के त्रिशूल।  जख्म की भी तकलीफ और जलने की भी....
या अल्लाह मुझे जहन्नुम की आग से बचा।  तू रहम करने वाला है।  मैं तेरा एक नाचीज ग़ुनहगार बंदा तेरे हुज़ूर में हाथ बांधे खडा हूं  ....मगर कुछ भी हो जì