वनगन्ध

यह स्वप्न मानसी का था और इस स्वप्न में भटक मैं रहा हूँ, एक श्रापित यक्ष की तरह।  पहाडों की सर्पिल पगडंडियाँ और उनके ढलानों पर ढरकती सी महसूस होती झौंपडियाँ।  पेडों ही पेडों से होकर गुजर जाते उच्छृंखल बन्दरों के झुण्ड।  मोड से घूमते ही अचानक सामने आकर चौंका देने वाला अल्पवयस प्रपात।  यही तो था उस वनकन्या का स्वप्न

यह जंगल ठीक उसी की तरह रहस्यमय है
।  यहाँ की सुबहों और शामों में घनेरा अन्तर है।  सुबह पंछियों की काकली में गूँजता है यह जंगल, तो दोपहर में यही जंगल सुस्ता रहे तेन्दुए सा लगता है।  शाम घर लौटने की विविध गतिविधियों से प्रतिध्वनिर्तसी और रात विकल कर देने वाली उदास शान्ति में डूबी-डूबी

कितने जंगल और अभयारण्य घूम चुका
हूँ, बचपन में प्रकृति-प्रेमी पिता के साथ फिर कॉलेज टूअर्स और मानसी के साथ भी।  उसके बाद कॅरियर भी यही चुन लिया।  अब कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट बन कर जंगल-दर-जंगल भटक रहा हूँ।

यहाँ जैसी व्याकुल कर देने वाली शान्ति मैंने कहीं नहीं देखी और ये सौन्दर्य तो किसी कुशल चितेरे की कल्पना में भी नहीं समा सकता, यह सौन्दर्य तो अद्भुत है, नितान्त अद्भुत !

कुछ ही दिन पहले तो यह खूबसूरत सजा मुझे मिली है
।  एक प्रतिष्ठित काष्ठ व्यापारी से उलझने और उस अच्छे सम्पर्कों वाले व्यक्ति के खिलाफ गैर कानूनी रूप से वनों की कटाई का केस फाइल करने के लिये।  वरना मैं तो फाईलों ही के जंगल में खोकर रह गया होता, पर्यावरण मंत्रालय दिल्ली में

स्वयं के अच्छे सम्पर्कों का लाभ न उठा कर मैंने अपना स्थानान्तरण स्थगित नहीं करवाया।  बस उखड ग़या था मन।  सो घर, पत्नि, बेटे को दिल्ली में ही छोड यहाँ चला आया, इस सघन वन में बसे इस अभयारण्य काजीरंगा नेशनल पार्क में

कहीं मन की अजानी परतों में शायद मानसी का वह सुन्दर स्वप्न किसी मंजूषा में सुरक्षित रखा था और आज वही स्वप्न साकार हो मेरे समक्ष यह जंगल बन कर पसर गया है
।  बस वही नहीं है

कितनी ही बार मेरी पत्नि स्वर्णा ने फोन पर दिल्ली ट्रान्सफर के प्रयास करने की बात कही है, मगर मैं ही टालता आ रहा
हूँ।  उसे मेरी अब इतनी आवश्यकता भी कहाँ उसका अधिकतर समय अपने सम्पन्न मायके में ही तो बीतता है।  अब मेरी अनुपस्थिति में तो वह मेरा छोटा फ्लैट छोड वहीं चली गई है।  उसकी मम्मी भी अस्वस्थ रहती हैं, वह भी क्या करे इकलौती पुत्री जो है।  यहाँ वह इस सभ्यता से कोसों दूर आने की कल्पना तक नहीं कर सकती।  बहरहाल वह यहाँ नहीं आना चाहती, मैं यहाँ से जाना नहीं चाहता।  इतना जरूर जानता हूँ कि शीघ्र ही जाना होगा।  मेरे श्वसुर जी अपने सम्पर्कों का लाभ उठा सरकारी धागों से खिंचवा बुला ही लेंगे राजधानी में।  इसीलिये इन पलों को खूब जीता हूँ।  वहाँ भीड में भी तन्हा होने की पीडा में जीता था, यहाँ तन्हाई को बडे चाव से जीता हूँ।

व्यस्तता के क्षणों से उबर कर अपनी कॉटेज में आकर घण्टों इस वनगन्ध को सूंघा करता
हूँ।  वनदेवी के विविध रूप मन मोह लेते हैं

काज़ीरंगा की यह दोपहर कोहरे की यवनिका हटा गुनगुनी धूप से धुर्लीधुली सी चली आई है
।  आज पहला फुरसत भरा इतवार है कि आज में देर तक सोया हूँ, आराम से नाश्ता किया है

वैसे कम ही समय हुआ है मुझे
यहाँ आए।  अभी तो ठीक से यहाँ का नक्शा भी नहीं पता मुझे।  यहाँ भी काम और उलझनों की कमी नहीं है।  काष्ठ व्यापारियों और वन-कर्मचारियों के बीच विरोध भी बहुत है, वहीं कुछ वन-कर्मचारी उनसे जा मिले हैं और कौडियों के मोल बेशकीमती वन सम्पदा उन्हें भेंट कर रहे हैं।  अभयारण्य की सीमाओं के परे भी जंगल का संरक्षित हिस्सा एक सौ पचास किलोमीटर के लगभग फैला हुआ है।  अभयारण्य ही सत्रह गाँवों की परिधि को छूकर गुजरता है।  कई चौकियाँ हैं, जहाँ तैनात हैं जंगल गार्डस।  फिर भी छिट-पुट घटनाएं होती ही रहती हैं।  वनांचलों में रहने वाले आदिवासियों की अपनी समस्याएं हैं।  उनकी आवश्यकताएं तो एक हद तक जंगल को बिना हानि पहूँचे पूरी होती रही हैं।  जंगल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं, खदान मालिक और काष्ठ व्यापारी

लगभग सभी अधिकारी गौहाटी या पास बसे कस्बे में बने वनविभाग के सरकारी आवासों में रहते हैं।  एक घर मुझे भी आवंटित हुआ था किन्तु स्वर्णा ने यहाँ आकर रहने की अनिच्छा प्रकट की तो मैंने जंगल के अन्दर बने एक पुराने गेस्टहाउस को ठीक करवा वहीं डेरा डाल लिया।  वैसे यह बेहद शान्त और निरापद जगह है।  यूँ भी यह हिस्सा पर्यटकों के लिये निषिध्द है।  कभी ही कोई विदेशी शोध-कर्ता विशेष अनुमति ले इधर चला आए तो चला आए।  पास ही गार्डस के छोटे-छोटे घर हैं।  उन्हीं में से एक मेरा काम कर जाता है।  हेडक्वार्टर यहाँ से पाँच कि मी दूर है, इस नेशनल पार्क के पश्चिमी प्रवेश-द्वार के पास।  जीप से आता-जाता हूँ।  आने के बाद से ही काफी व्यस्त रहा, कुछ वी आई पी विजिट, कुछ इनक्वायरियाँ।  वैसे भी नये माहौल, नए लोगों को समझने में कुछ समय तो लग ही जाता है।  हमारे चीफ कंजरवेटर भले व्यक्ति हैं जिन्होंने मुझे यहाँ जमाने में हर संभव सहायता की है और अब लगता है यहाँ रहना सुखद रहेगा

ये कॉटेजनुमा गेस्टहाउस बहुत पुराना है, ब्रिटिशर्स के समय का
।  शाम के झुटपुटे में यह बहुत रूमानी लगता है (मैं कबसे हर चीज में मानसी की तरह रूमानियत ढूंढने लगा?) ढलवाँ टिन की छतें, लकडी क़ा मजबूत फर्श, बाहर बॉलकनी में भी लकडी क़ी नक्काशीदार रेलिंग।  काई जमी दीवारों पर सट कर बढती बेलें।  ढेरों-ढेर कटहल, जामुन, आम, लीची के और अनवरत फैले वनीय वृक्षों की पंक्तियाँ, उनपर चढे रंगीन पुष्पों की छटा बिखेरते अद्भुत दुर्लभ आर्किड्स

एक पतली पगडंडी थोडा सा आगे जाकर छोटे से तालाब तक
पहुँचाती हैं, वहाँ गार्डस की पाली बतखें क्वैक-क्वैक करती तैरा करती हैं।  इस कॉटेज का अहाता भी एक छोटा-मोटा सा जंगल ही है।  कितनी ही बार साँप पर पैर पडते-पडते बचा है।  जोंक चिपकना तो रोज क़ी बात है, पहली बार घबरा गया था, सोमा ने नमक डाल कर हटाया था।  सोमा मेरा सेवक, मेरा सहचर भी।  वह बहुत कुछ जानता है, छोटे-मोटे प्राकृतिक इलाज, मौसम का अनुमान, जंगल की आवाजों के अर्थ।  थोडा सौन्दर्र्यबोध भी रखता है, सुबह-सुबह उठा लाता है जंगली आर्किड्स के गुलाबी-नीले गुच्छे और उन्हें फर्न के साथ टूटे प्याले में सजा जाता है और तन्हा कमरा सजीव हो उठता है

मेरा यह सहचर एकदम अनोखा है।  यहीं का आदिवासी युवक है, अभी गार्ड बना है।  पूरी लगन से सेवा करता है।  बोलता कम है, आदिवासी गीत गुनगुनाता रहता है।  हिन्दी थोडी ज़ानता है।  मेरा हर क्रियाकलाप बडे ध्यान से देखा करता है।  खाना ऐसा बनाता है कि मेरी उत्तर भारतीय जिव्हा अपने खाने का स्वाद भूल चली है।  मेरा प्रयास रहता है कि खाना जिव्हा पर कम से कम रहे, सीधे गले में उतर जाए।  कभी-कभी मूड में होता है तो अहाते में बने पोखर से मछली पकड क़िसी अपनी आदिवासी-पारम्परिक रेसिपी से उसे पकाता है।  आज ऐसा ही हुआ था, बस खाना खाकर लेट गया था।  सालों बाद दोपहर में यूँ लेट पाने की फुरसत नसीब हुई थी।  आदत नहीं थी सो नींद ही नहीं आई।  उठा और चला आया इस ओर भटकने और खो गया अतीत के बीहड में, जिसका भी इस जंगल की भाँति कोई ओर-छोर नहीं।  बहुत उलझ कर लौट जाता हूँ।  लौट कर घने शीरीष की डालों से ढकी बॉलकनी में, इज़ी चेयर पर जा बैठता हूँ ।  शाम ढलने तक यहीं बैठूँगा और बस मानसी के बारे में सोचूँगा।  अब तक जो न कर सका समय ही नहीं होता था।  अगर कभी होता भी था खाली समय तो जरा सा भी विचार मग्न देख स्वर्णा पूछ बैठतीक्या सोच रहे हो? पास्ट....

बस घबरा कर और व्यस्त हो जाता
।  शरीर अपना हर काम करता, मस्तिष्क पूरी तौर पर विवेक के हाथों चलता।  हृदय नियम से धडक़ता।  मैं भी हँसता-बोलता, सोशलाइज क़रता।  मगर अवचेतन का कोई हिस्सा काष्ठ हो चला था।  यहाँ आकर नम हवाओं और सीली हुई स्मृतियों के असर ने उस काष्ठ को जीवन और स्पंदन दे दिया है, जिसमें मानसी की स्मृतियों के नये, रक्तिम किसलय फूट पडे हैं

मानसी तो एक बरसाती नदी है, जब-तब मुझमें बहती-सूखती रहती
।  अब तो वह एक आभास मात्र है, कच्चे ग्राम्य-गीतों की तरह दूर से महसूस भर होती है।  उसीकी तरह उसका स्नेह भी अनोखा था।  प्रेम में अगाध विश्वास था उसे, कोई फिल्मी या आकर्षण जनित प्रेम नहीं सहज मौलिक प्रेम जिसकी परिभाषाएं भी मौलिक हुआ करती थीं।  उस अपरिपक्व वयस में भी उसके शब्दों में प्रेम की सराहना कभी आम संवादों में नहीं होती थी, जैसे 'आत्माओं का सहस्पंदन ही प्रेम है।  उतना ही अनश्वर, देह से परे होकर सोचें तो वह कभी भी, किसी से भी हो सकता है।  उसे गुनाह, समर्पण, शीर्लसंकोच जैसे शब्दों से चिढ थी, उसके अनुसार प्रेम तो प्रकृति सा निर्बन्ध होता है, वैसे ही जैसे दो फूल साथ खिलें, आपस में टकराएं, अपना पराग बाँटे फिर मुरझा कर पांखुरी-पांखुरी हो बिखर जाएं।  वह बहुत उलझाती थी और मैं बहुत समय तक तो जान ही न सका कि वह मेरे लिये क्या सोचती है।  उसकी उन मौलिक परिभाषाओं ने खूब छला इतना कि आज तक ठगा सा बैठा हूँ।

देर रात तक टी वी देखना मेरी दिनचर्या में शामिल है, और कभी-कभी मानसी की आवाज सुन लेने की चाह में ट्रांजिस्टर पर हिन्दी समाचार भी सुनता
हूँ।  ऐसा दुर्लभ संयोग र्दो तीन बार ही संभव हो पाया है और तब-तब मेरा एकान्त सार्थक हो उठा है।  एकदम अलग सी आवाज़, न महीन न भारी, न शुष्क न भावुक, सधी सी आवाज, सुस्पष्ट उच्चारण

वह स्वयं तो किसी कोहरे में खो गई है,
जहाँ से बस कभी-कभी उसकी आवाज गूँजा करती है।  वह कहा करती थी  मैं तो इसी जमीन का मौसम हूँ, यहीं ढूंढना अपने जंगलों में, कभी पतझड क़े सूखे पत्तों में, कभी सीली हवाओं में, बासंती वनपुष्पों की मादक गंध में मैं तुम्हें मिल जाँऊगी।  मैं ढूंढ ही तो रहा हूँ।

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