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वनगन्ध-7

ठीक अपनी शादी से जरा पहले अंतिम भेंट की लालसा लिये उससे मिलने मैं जोधपुर चला गया था अपना सामान एक गेस्ट हाउस में रख कर मैंने आकाशवाणी फोन किया, डयूटी ऑफिसर ने बताया कि अभी वह किसी प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग्स में व्यस्त है।  नहाने जाने से पहले मैंने कमरे में रखा रेडियो ऑन कर लिया।  कार्यक्रमों के बीच-बीच उसकी सधी आवाज क़ानों को सुख दे रही थी।  कितनी विविध प्रतिभाओं से तो रचा है ईश्वर ने इसे, मैं व्यर्थ ही डरता था, इसने तो अपने लिये स्थान बना ही लिया।  अब ऐसी आकर्षक , प्रतिभायुक्त लडक़ी को कौन नहीं अपनाना चाहेगा?

नहा धोकर, समय
गवाँए बिना, उसका मनपसंद आफ्टरशेव लोशन लगा पहले ही की तरह उससे मिलने जा पहुँचा।  शास्त्रीय संगीत के लम्बे कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के दौरान वह स्टूडियो से बाहर आई, शायद मेरे आने की सूचना डयूटी ऑफिसर ने इन्टरकॉम पर उसे दे दी थी

उसे देखकर लगा ही नहीं
...दरअसल जो मेरी कल्पना थी  उसी खण्डित भाव में डूबी अपनी प्रिया की थी....मुझे लगा था मैं अचानक पहुँच कर उसे खुश कर दूँगा और अलगाव से पहले की कुछ अच्छी घडियाँ हम साथ बिता लेंगे।  मेरी कल्पना के विपरीत ही वह मुझे मिली जैसे मेरे अस्तित्व मात्र को उसने स्वयं पर से रगड क़र धो डाला हो

जनवरी के दिन थे, उसने लैदर का काली जैकेट और जीन्स पहनी थी, बाल एकदम छोटेपूरे व्यक्तित्व में एक विद्रोह सा

''हलो निखिल, इन दिनों यहाँ....कुछ काम था जोधपुर में।'' स्वर अक्खड थे, मैं अचकचा गया।
''
बससोचा कि..''
''
चाय लोगे? '' मेरे उत्तर की प्रतीक्षा तक नहीं की उसने, मुडी और थर्मस में से दो ग्लासों चाय ले आई।
''
कब है शादी? '' उसी शुष्क भावहीनता से प्रश्न उसने मुझ पर उछाल दिया।
''
अगले महीने... ''
''
कार्ड तो पोस्ट कर सकते थे... आने का कष्ट, ओ हाँ... खास मित्रों को तो स्वयं आकर आमंत्रित किया जाता है ना? ''
''
मैं कार्ड देने नहीं आया हूँ मानसी..'' न चाह कर भी एक उच्छवास निकल ही गई।
''
अच्छा मैं आई, बस एक आखिरी रिकॉर्डिंग है, उसके बाद आती हूँ।''  फिर साथ लंच करेंगे।  कह कर अन्दर चली गई।

मैं वेटिंगरूम में बैठा सोचता रहा कि ये बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक? क्या सचमुच वह मेरी बैसाखियाँ छोड चल पडी है या ये कोई अपने आपको कोई नई सजा देने की शुरूआत है?

हमने साथ लंच किया
मैं ने पूछा कहाँ रहती हो तो जवाब मिला फिलहाल वर्किंग विमेन्स हॉस्टल में।  मैंने अपना उद्देश्य स्पष्ट किया,

'' आज का दिन मेरे साथ बिताना पसंद करोगी? ''
''
हाँ साथ ही हूँ! ''
''
आज हॉस्टल फोन कर दो नहीं आ रही हो।''

बस ज्वालामुखी छेड दिया था मैं ने

'' निखिल, क्या समझ कर चले आए हो? मैं बस देह हूँ? माना हमारा सम्बंध किसी आधार पर नहीं बस सहज मूक स्वीकृति पर बना, बिना किसी कमिट्मेन्ट के।  पर कहीं तो मन भी होगा मेरा जो टूटता-जुडता होगा।  तब तो स्वयं बताया तक नहीं गया कि सगाई कर ली है और अब।  तुम स्वयं आकर कहते कि मानसी मैंने समझौता कर लिया और सगाई कर ली तो शायद आज तुम्हारा आग्रह हँस कर मान लेती और शायद... जब भी..., छोडो निखिल किसी और से सुनकर बहुत आहत हुई थी मैं।  जाओ तुम अब। ''

बहुत कुछ वह कहती रही , बहुत कुछ मैंने कहा।  इतने अलौकिक सम्बंध का कटु अंत मुझे तोड ग़या।  फिर भी रात बस में बैठने से पहले उसके हॉस्टल पहुँचा।  न जाने क्यों गेट की आवाज सुन वह नीचे चली आई

'' कौन है चौकीदार जी? ''

मुझे उसका यूँ मेरे आने की उम्मीद करना भला लगा और फिर से लगने लगा कि इस संबंध की अलौकिकता हमेशा रहेगी

'' तो तुम्हें हमेशा की तरह पता था कि मैं आउंगा? ''
 
''
अपना खयाल रखने का आश्वासन दोगी तो मैं भी जी सकूंगा।''
''
हाँ दोनों डबडबाई आँखे एक दूसरे से चुराते हुए विदा ले लौट गए विपरीत दिशाओं में।''

बहुत कठिन पल थे

धूमधाम से शादी हुई, सबने अपने अरमान पूरे किये और मेरा एक नन्हा अरमान मन के अंधेरे कोने में खो गया

शादी होते ही श्वसुर जी का पहला प्रयास यही था कि मुझे किसी तरह दिल्ली बुलवा लें
।  यूँ भी मेरा पापा-मम्मी के साथ रहना मुश्किल ही था, पर दिल्ली जाने का अर्थ था कि श्वसुरगृह के हो रहना।  पापा-मम्मी फिर अकेले हो गए, जिन्हें अरमान था बहू का

शादी के बाद पता चला स्वर्णा को कुछ-कुछ आभास है, वह जब भी मेरे पुराने एलबम देखती, मानसी और मेरे चित्रों को गौर से देखती
।  मिनी के भूले भटके पत्र, कविताएं हाथ लग जाते तो पूछताछ भी नहीं करती पर बातों-बातों में संयत भाषा में व्यंग्य मुझ तक जरूर पहुंचा देती

वक्त बीतते कितनी देर लगती है? देखते-देखते मेरे और स्वर्णा के संबंधों में अटूट सेतुबंध बन हमारा बेटा आगया
।  एक प्रमोशन भी हुआ मैं दिल्ली में जमा रहाअपनी ही गति से चल रहा था जीवन और हर परिस्थिति से समझौते करता हुआ मैं, आरामदेह रास्तों पर सुकून से चल रहा था कि मानसी के एक पत्र ने शान्त पानी में पत्थर का सा काम किया

'' तो जनाब! पर्यावरण मंत्रालय में फाईलों के जंगल में वनसेवा कर रहे हैं? मेरा बी बी सी में एनाउन्सर के लिये एक इन्टरव्यू है दिल्ली में ।  मेरी दिल्ली में कोई जान-पहचान नहीं है, क्या मैं आपके पास आकर ठहर सकती हूँ? कोई आपत्ति ? ''

स्वर्णा के लिये असह्य था

'' नहीं निखिल! मैं नहीं मिलना चाहती इस लडक़ी से.. ''

फिर भी मैंने पत्र का जवाब फोन से दिया और पूछा ''ये नया शगल क्यों? ''

'' पलायन समझ लो।''

मेरे कहने पर वह आ गई।  श्वसुर गृह की सम्पन्नता पर बैठा मैं बार-बार उसकी उपस्थिति में अचकचा जाता।  स्वर्णा बार-बार कहती रही नहीं मैं नहीं मिलूंगी फिर भी मिली और उतनी ही सहज औपचारिकता से जितना वह हमारे परिवेश की अन्य महिलाओं से मिला करती थी।  मिनी तो सहज ही थी मगर अपने-आप में गुम सी।  पूरे दिन की भागदौड उसने खुद ही की, मैंने कहा भी मैं छोड आऊँ जहाँ-जहाँ भी जाना हो या ड्राईवर भेज देता हूँ।  उसने यह कहकर मना कर दिया कि अब तो अगर सलेक्शन हो गया तो पूरा देश ही अनजाना होगा, सारे रास्ते पूछ-पाछ कर ही तय करने होंगे ना

रात डायनिंग टेबल पर जब उसने बताया इन्टरव्यू अच्छा ही रहा और काफी पॉजिटिव था उनका रिस्पॉन्स, तो मैं घोर कृत्रिमता से बोला

'' तो भारत छोडने का इरादा कर लिया है।  हाँ अच्छा है, बहुत अच्छा , बी बी सी बहुत वास्ट मीडीया है।  वहाँ तुम्हें अधिक अवसर मिलेंगे। ''

स्वर्णा और मानसी दोनों खूब समझती थीं कि यह कृत्रिमता है और मैं मूर्ख सा वातावरण सामान्य करने की चेष्टा में और असामान्य बना जा रहा था।  मानसी मृगांक से खेलती रही , स्वर्णा कॉफी के सिप लेती रही।  जब नाम पूछने पर मृगांक ने अपना नाम बताया तो मानसी ने मेरी ओर देखा, स्वर्णा ने वह निगाह बीच ही में भाँप ली

उसका सलेक्शन हुआ और एक दिन एयरपोर्ट से उसका फोन आया कि वह जा रही है, और चली गई हमेशा के लिये


चार वर्ष बीत गए, और आज अतीत दुहराता इस जंगल में बैठा
हूँ।  झिंगुरों की आवाजों और बढती स्याही से बेखबर सा।  सामने झील में डूब सूरज ने आत्महत्या का असफल प्रयास किया है, जानता हूँ कल सुबह आकर कहेगामाफ करना दोस्त कल ज़रा ज्यादा भावुक हो गया था।  झील का कलरव नीरवता में बदलता जा रहा है।  मानसी जो आज कलरवित झील है और देरसबेर रात को भी आना है।  यही सोच कर उठ आता हूँ बॉलकनी से कमरे में।  यहाँ जीने के मूलभूत साधनों में मेरे बिस्तर, कपडों से भरी अलमारी, किताबें एक छोटा म्यूजिक़ सिस्टम, एक पोर्टेबल टी वी रखे हैं बस।  वैसे इस गेस्टहाउस में एक और बेडरूम, एक लिविंगरूम, किचन तो है ही।  पर मैं इसी कमरे में रहना पसंद करता हूँ, इसके पीछे एक छोटा सा स्कवॉश कोर्ट है जो लगभग जंगली झाड-झंखाड से ढक सा गया था।  मैं ने इसे अपने खेलने लायक बना लिया है

इस कमरे में एक बहुमूल्य सी चीज है जिसे मेरा एकमात्र ऐश्वर्य कहा जा सकता है, एक तितली की तस्वीर है
।  हाँ मानसी की जिसे हरएक से छुपा कर रखा था मैंने, यहाँ आकर सामने लगा लिया है, टी वी के उपर।  हाँ कुछ बॉटल्स भी हैं व्हिस्की की जिन्हें मेरा एक फौजी दोस्त थमा गया था, वैसे मैं खास अवसरों पर बहुत सीमित मात्रा में पीता था, आजकल क्या करूं, बहुत तन्हा महसूस करता हूँ।  कुछ दिन पहले मेरे ऑफिस के पतों पर घूमता-घामता मानसी का पत्र पहुँचा था।  वही उसकी तस्वीर के पास पडा है।  लिखती है

'' इन चार सालों में बखूबी अपने पैर जमा ही लिये हैं।  मेरे एक रेडियो प्रोग्राम की सफलता के बाद मुझे टी वी चैनल पर वैसा ही एक कार्यक्रम एन्करिंग के लिये मिला है।  बहुत खुश हूँ, हमेशा की तरह लगा इसे आपसे बाँटू।  वैसे ही जब हर बार मैं मंच पर पुरस्कार लेती थी और आप कहीं दूर पीछे बैठे संतुष्ट हुआ करते थे।  आज देर तक अपने जीवन और इसकी सार्थकता-निरर्थकता के बारे में सोच रही थी तो आप बेहद याद आए ।  अरसे से आपकी कोई खबर नहीं थी, दोष मेरा ही था मैंने अपने बदलते पतों का हिसाब आपको दिया ही नहीं, फिर भी आपके मम्मी से लिये पतों पर बर्थडे विशेज हमेशा मिली है।  इतने सालों बाद पहली बार भारत आने का मन हुआ है।  इतने दिनों मैं भाषा विज्ञान में पी एच डी करने की वजह से बस भारत आने की सोच भी नहीं सकी ।  

पत्र में कुछ और भी अनलिखा सा था जिसे मैं महसूस कर रहा था क्या कोई आया है मिनी के जीवन में? कुछ और भी है जो वह बाँटना चाहती है

मन को अन्यमनस्कता से बचाने के लिये एक पैग व्हिस्की ले लेता
हूँ।  सोमा खाना ले आया है खाकर सो जाता हूँ, नींद के घेरों में भी वही सबमानसी,उसकी बातेंउसकी हँसी तो कभी रुदन

नींद से अचानक जाग कर अपने चतुर्दिक को पहचानने की कोशिश करता
हूँ।  सन्नाटा अपने पंखों की फडफ़डाहट से अपने ही अहसास को कम कर रहा है।  सन्नाटा चीरती हुई आवाजें मेरे भीतर से उभरती हैं या वातावरण से बता नहीं सकता।  खिडक़ी खुली रह गई है।  शीशम, चीड, और शिरीष के लम्बे पेडों से टकरा कर सन्नाटा चमकादड क़ी तरह फडफ़डाए जा रहा है।  बाहर अंधेरा है; पर यही अंधेरा प्रकृति की हसीन एक अदा है।  किन्तु भीतर का अंधेरा? इसकी कोई आवाज नहीं होती, बस बेआवाज क़राहें होती हैंऐसे ही मन के अंधेरों में गुम होर्तेहोते रात को तीन बजे मैंने उसे एयरपोर्ट पर कहा था उससे-

क्यों एकदम ही दूर चले जाने का निर्णय लिया यहाँ रहकर भी तो अच्छी तरह जी सकती थीं? नहीं करनी थी शादी मत करतीं, कम से कम यह अहसास तो रहता यहीं हो आस-पास कहीं इसी देश में।  यहाँ मेरा और तुम्हारे मम्मी-पापा का और वहाँ रह कर तुम्हारा मन नहीं टूटेगा? एक लम्बे चुप के बाद वह बोली थी-

'' मन का क्या है, वह तो टूटता-जुडता है निखिल।  मैं यहाँ और रही तो हमारा संबंध तिकोना हो जाएगा  बस उसी स्थिति से बचना चाहती हूँ।  फिर बी बी सी मेरा सपना है।  मिलिंद बडा हो ही गया है सो मम्मी-पापा की चिन्ता नहीं है।  कौनसा कभी न लौटने के लिये जा रही हूँ, मैं तो इसी ज़मीन का मौसम हूँ।''

रात की बदगुमानी कम नहीं हो रही।  एक मूक प्रार्थना करता हूँ, पर उजाला नहीं माँगता, माँगने से मिलेगा, यकीन नहीं होता।  मैं उठकर कॉफी बनाता हूँ।  कॉफी से मानसी और स्वर्णा दोनों का रिश्ता है।  स्वर्णा से हर सुबह सात बजे की ताजा गर्म कॉफी, एक नियम का रिश्ता।  और मानसी! वो कहाँ नियमों में विश्वास करती! हम दोनों जब भी साथ हुए नौ-दस से पहले कभी नहीं उठे।  मानसी रजाई से अपना चेहरा निकाल झाँकती, देखती मैं सो रहा हूँ तो खुद भी फिर सो जाती, मैं भी देखता अभी सोई है तो दुबारा अपना भी चेहरा ढाँप लेता।  इस लुका-छिपी में मैं ही उठता और जैसे ही अपनी चप्पलें टतोलता, वह भी रजाई उतार बिल्ली सी कूद पडती।  फूलों वाले खुशनुमा प्रिन्ट के नाईट सूट में वह बिल्ली की सी ही अंगडाई लेती और मेरे बाथरूम से निकलने से पहले ढेर से झाग वाली कॉफी बनाए मिलती।  कई बार तो कॉफी बना कर मेज पर रखे रॉकिंग चेयर में पर्शियन केट सी हाथ-पैर सिकोडे सोई मिलती

ओह! उसका स्पंदनों से भरी लहर-लहर देह इस कुहासे से भरी सुबह में मुझे
कँपा गई।  कॉफी के घूंट भरते ही ढेर सी कडवाहट सीने में उतर गई।  हवा में शीतलता बढ रही है।  दूर किसी पेड से बंदर की चीखा क्षणिक रूप से सिहरा जाती है।  सुबह बस होने को है पर उजाला नहीं धुंधलका बढ रहा है।  ढेर से अंगारों-से विचार और सवाल कोहरे के अस्पष्ट पर्दे पर खिल रहे हैं।  हर सवाल में, हर विचार में वही साफ-धुली तस्वीर।  इतने बडे अरसे बाद अतीत टूटती दीवार सा मुझ पर ढह गया है, मैं अचेत पडा हूँ और वह तमाम गुनाहों से परे हो गई है

अंत में खुले किनारे बहुत हैं पर मैंने जो सुखद अंत चाहा था उसे त्याग वह निर्वासित यक्षिणी सी पराये देश में अकेली है
।  एक बार घर जाने पर अंकल से मिला था, बहुत दुखी मन से बता रहे थे कि -

'' शादी के लिये तो मना कर चुकी ही थी, अब इस विषय पर बात तक नहीं करती ।''

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