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क्या आज भी ?

क्या पेड-पौधों
जंगलो-झरनों
तालाबों-जलपंखियों
खेतो-सारसों
का अर्थ
तुम्हारे लिए आज भी है
मुझसे मिलता जुलता है?
लेकिन आज मैं,
स्वयं को उस सब से जोड नहीं पाती
समाज के तंग गलियारों में
एक प्रतिमा बन खडी हूं
उसी जगह पर
जो मेरे लिए बना दी गई है
वहां से हिलना भी मना है
मेरी डोर किसी के हाथ है
वह जो उनमुक्त है
खुली हवा में सांस लेने के लिए
दोस्त बनाने के लिए
कहीं भी,
कभी भी दायित्व उतार फेंकने के लिए
लेकिन मैं फिर भी
कोशिश करके जोडती हूं
स्वयं को  घर  से
बाहर लगी अपनी छोटी सी फुलवारी से

मनीषा कुलश्रेष्ठ
जनवरी 6, 2002 

इतना भी
क्या कम है?

 

एक ग्रामीण प्रणय गीत
बांध रहा है मेरे कानों को
वह दूर से तुम्हारी परछांई सा
कहीं से हवा में बह कर आया है
मेरे पहाडों वाले शहर से दूर हो तुम
चौडे पाट वाली नदी के शहर में
जानती हूं,
तुम नहीं बह पाओगे मुझ तक
मैं भी कहां इतना उड पाऊंगी?
फिर भी, क्यों तुम मेरे लिए
पलाश के फूलों और
जंगली बेरों की
रखवाली किया करते हो?
मै भी,
सारस के घोंसले वाले
खेतों में प्रतीक्षारत
स्वयं को गीत बुनने से
कहां रोक सकी हूं
फिर भी
इस रुख बदलती हवा से
यहीं कहती हूं
हृदय को जीवन से जोडने को
इतना भी क्या कम है!

मनीषा कुलश्रेष्ठ
जनवरी 6, 2002


 

हरे भरे
मन की थाह



उस क्षण,
न जाने क्यों ऐसी अनुभूति हुई
कि मेरा मन
एक विस्तृत भू-खण्ड है
मुझे भान ही कहां था
कि इस घास से भरे भू-खण्ड पर
कब से हजारों पक्षी
न जाने कैसे बीज चुग रहे है
अगर तुम न आते
और
इन अजाने- अदेखे
पक्षियों का झुण्ड शोर मचाकर
उड न गया होता
तो,
मैं अपने हरे भरे मन की
थाह कैसे पाती?

मनीषा कुलश्रेष्ठ
जनवरी 6, 2002

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