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मेरा आसमान
आकाश में उड़ते हुए पक्षी को
खुला आसमान चाहिये
जहां से उड़ कर वह
दूर‚ बहुत दूर चला जाये
मुझे पंख मिल गये हैं
अब मैं उड़ने को
पूरी तरह से तैयार हूँ
लेकिन आसमान है कि
कहीं दिखता ही नहीं
कंकरीट के इस जंगल में
भटक कर रह जाता है मन
प्रतिदिन
प्रतिपल
प्रतिक्षण


ध्रुवतारा
तारों भरा आकाश
कुछ झुक कर बातें करने
आया मेरे पास
कहा मैं ने —
तुम्हारे आँगन में
एक नहीं‚ अनेक तारे
रंग – बिरंगे सुन्दर प्यारे
मुझे दे दो मात्र एक तारा
जो बने जीवन का ध्रुवतारा
मौन आकाश करने लगा अट्टहास
ध्रुवतारा है अटल
तुम्हारा पथ चंचल
अपना पथ स्वयं प्रशस्त करो
बन जाओ ध्रुव
हो के अडिग – अटल
मार्ग दर्शक
दिशा निर्देशक
निज पथ प्रदर्शक

 

अकाल
मौत के दरवाजें से
झांकती एक ज़िन्दगी
तरस रही है
एक बूंद पानी के लिये
तड़प रही है
एक रोटी के लिये
सरकारी आंकड़ों में
उत्पादन बढ़ा है
गतवर्ष की तुलना में
निर्यात बढ़ा है
फिर भी पलामू का
केशवराम भूख से व्याकुल
मौत के दरवाज़े पर खड़ा है
तीन साल से
रबी‚ भदई और खरीफ
एक भी फसल नहीं हुई
तीन सौ एकड़ उपजाऊ ज़मीन
बंजर बन गई
फसल तो दूर
घास भी नहीं उग रही
आदिमानव की तरह
लोग जंगलों में भटकते हैं
पौधों की जड़ों को खोदते हैं
काटते – उखाड़ते हैं
कड़वाहट निकालने के लिये
पानी में उबालते हैं
फिर इसे चबाते हैं
पेट की आग बुझाने के लिये
बाज़ार में ‚ सरकारी गोदामों में
बहुत अनाज है
किन्तु ये
गरीब दाने दाने को मोहताज हैं।


क्षितिज के उस पार
प्रत्येक आदि का अन्त
प्रारम्भ का समापन
किन्तु कविता
तुम्हारा अन्त कहाँ
अन्त में भी आरम्भ
एक अन्तहीन सिलसिला
क्षितिज की तरह
दूर‚ बहुत दूर तक
नभ को छूता
उस पार – इस पार
वृहद‚ विस्तृत‚ भव्याकार
मन करता है उड़ चलें
चल कर छू लें
क्षितिज के उस पार
कोई मनमीत प्रतीक्षारत
कोई नवगीत साधनारत
संभवत: मिले
किंचित दिखे
क्षितिज के उस पार

-शंकर सिंह

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