|
|
दीप-द्वंद्व
राजकोट के
परकोटे पर
जलता एक
दीपक
शान से इतराकर
पड़ोस के
झोपड़े वाले
दीपक से
बोला
मैं तो
पीता हूँ
शुद्ध घी
और तेरा
भोजन है किरोसीन।
रे मूर्ख!
मेरे और
अपने बीच
के फर्क
को पहचान
और अपनी
औकात
में रहना
जान।
सुन ऐ
दीपक दीन-हीन
होगा अगर
तू मेरी
वंदना में
लीन
तो खुश
होकर शायद
मैं दे
दूं तुझे भी
अपने भोजन
घी
की बूँदे
तीन।
बड़बोले
दीपक की ये
बातें
सुनकर दूसरा
दीपक बोला
-
हे मित्र !
जीवन के सच को पहचान
जल तो तू
भी रहा है
फर्क तो
सिर्फ इतना है
कि मैं
किरोसीन में जल रहा हूँ
और तू घी
में जल रहा है।
रूक और भी
सूनता जा
किरोसीन
की कृपा से
मैं तो
आराम से जल रहा हूँ
और तू घी
में
तड़प-तड़प
के जल रहा है।
अपने
सद्कर्मो की वजह से
मैं जल्द
ही मुक्त हो जाऊँगा
इस नशवर
संसार से
लुप्त हो
जाऊँगा।
परन्तु
मेरे मित्र
भोग की
लालसा में
तू जलता
ही जायेगा
और जलने
के बाद
फिर
पछतायेगा।
जीवन के
इस
अनोखे
रहस्य को
तब तू जान
पायेगा।
अमित
कुमार सिंह
मोहने का उपक्रम
गांव में
आंगन की
गौरैया के मानिंद फुदकती
आई वह
गुड़िया सी;
और मुझ
अजनबी को
देखने लगी
तिरछी
निगाहों से।
पास में
बैठी मेरी पत्नी ने
उसकी ओर
इंगित कर कहा,
'इसने कल
बहुत
सुंदर डांस दिखाया था।`
मैं उस
बच्ची की ओर
मुस्कराकर
देखने लगा
और उसे
उकसाने हेतु बोला,
'सचमुच?`
एक निश्छल
आत्मश्लाघा के भाव से
उसके
होठों पर हल्की सी स्मित बिखरी
और
उसने हामी
में सिर हिला दिया।
मेरी
पत्नी ने उससे कहा
'आज फिर
दिखाओ`;
तो वह
मुझे देखते हुए ऐसे सकुचाई
जैसे कह
रही हो,
'इनके
सामने शरम नहीं आयेगी?`
पत्नी उसे
लालच देने हेतु,
सामने
मेज़ पर रखी जलेबियों की ओर
देखते हुए
बोलीं,
'दो जलेबी
मिलेंगी।`
तब भी उसे
सकुचाते देखकर
मैंने
प्यार से
कहा,
'मुझे भी
डांस दिखाओ।`
मेरी बात का उत्तर
उसने मेरी
पत्नी को देखते हुए दिया,
'इनसे भी
दो जबेली लूंगी`;
और हमारी
हंसी से कमरा गूंज उठा
जैसे पतझड़ में अचानक बहार आगई हो।
हंसी को
किसी तरह थामकर
मेरे 'हॉ`
कहते ही
वह मेरी
पत्नी से अधिकारपूर्वक बोली,
'कल वाला
डुपट्टा तो लाओ।`
पत्नी
हंसते हुए डुपट्टा लाई,
जिसको सिर
पर ओढ़कर वह ठुमका लगाते हुए,
तोतली
बोली में गाने लगी,
'लाल
डुपट्टा उड़ गया रे बैरी हवा के झोंके से,
पिया ने
मुझको देख लिया हाय रे धोखे से`।
हंसी के
फव्वारों के बीच
मेरी
पत्नी दार्शनिक भाव से बोलीं,
'गांव की
बच्चियां मन मोहने के ये उपक्रम न करें
तो इन्हें
कौन प्यार करे?
यहां तो
कन्या के जन्म की खबर मिलते ही
सभी के
मुंह उतर जाते हैं।`
-महेश
चंद्र द्विवेदी
Top
|
तुम
भूल तो
सकते हो मेरे दोस्त
कुछ समय
के लिए
उन
शाश्वत सत्यों को
और रख
सकते हो
छलावे
में अपने आप को
उन,
मिथ्या और
क्षणिक सुखों की
चासनी
में डुबोकर
जिनके
सामने,
आगे-पीछे
या फिर
ऊपर और
नीचे
तुम्हें
कुछ दिखाई नहीं देता।
कोई
दर्पण
जो
तुम्हें
तुम्हारा
असली
चेहरा
दिखाने
की कोशिश करता है,
तुम्हारा
अहं,
उसे
चकनाचूर कर देता है।
तुम्हें
याद भी न होगा
या कहूं
कि
तुम्हें
फुर्सत ही कहाँ है
जो ये
जानो कि
अब तक
कितने दर्पण,
तुम्हारी,
बेरहमी
का शिकार हुए हैं।
ऐसा न हो
कि
एक दिन
उनके
टुकडे
बिखरते-बिखरते
इतने हो
जायें कि
घर से
बाहर निकले, तुम्हारे हर
कदम को
लहू-लुहान
कर दें।
तब,
और तब,
क्या
होगा मेरे दोस्त,
जब गुजर
जाएगा वह, जिसे,
आज तक,
न तुम
रोक पाए हो
न मैं
और न कोई
अन्य ही।
सच तो ये
है कि
वह अकेला
ही नहीं गुजरता
बल्कि
अपने साथ
सब कुछ,
हाँ-हाँ
... स.....ब कुछ
बदलते
हुए गुजरता है।
और तब,
बियावान
जंगल में
भटक गए
प्राणी-सा
एकाकी मन,
चीत्कार
करता है,
छटपटाता
है
हा-हाकार
करता है।
पर,
इससे आगे,
कर कुछ
नहीं सकता,
क्योंकि,
यही
प्रकृति का नियम है।
इसलिए
पुन: कहता हूँ कि
तुम,
भूल तो
सकते हो मेरे दोस्त
कुछ समय
के लिए,
उन
शाश्वत सत्यों को
पर,
नकार
नहीं सकते!
नकार
नहीं सकते मेरे दोस्त,!!
नकार
नहीं सकते!!!
डॉ०
दिनेश पाठक 'शशि`
मुझसे दूर
कहाँ जाओगे उर्फ जिजिविषा
पाताल तो
पाताल है
अन्तरिक्ष
में भी मुझे पाओगे
मैं
गुस्र्त्वआकर्षण के सिद्धांत के विपरीत भी
सिद्धांत हूँ ।
मुझसे दूर
कहाँ जाओगे
मैं जितनी
तरल हूँ
उतनी ही
विरल हूँ
इतनी सरल
हूँ
मुझसे दूर
कहाँ जाओगे
पाताल तो
पाताल है
अन्तरिक्ष
में भी मुझे पाओगे
मुझसे दूर
कहाँ जाओगे
विरल इतनी
कि सांसों में बस जाऊंगी
तरल इतनी कि रक्त बन शिराओं में घूम आऊंगी
सरल इतनी
कि गहरी नींद का चेहरा बन जाऊंगी
मुझसे दूर
कहाँ जाओगे
रोज सुबह
दरवाजे पर दस्तक देती हूँ
मैं
उम्मीद हूँ , एक दिन और
जीने की
दुलारूंगी
तुझे,पुकारूंगी तुझे
कभी मैं
दुम हिलाऊंगी, कभी तुम
हिलाओगे
मुझसे दूर
कहाँ जाओगे
अशोक प्रितमानी
उठो
तुम्हें जीना है
उठो कि उन
आंखों को पोंछो, जिनसे
आंसू छलक रहे हैं,
उठो कि उन
गिरतों को थामों, जो
सहमे से भटक रहे हैं।
उठो कि उन
भूखों को पूजो, जो
फांकों से खेल रहे हैं,
उठो कि उन
बदनों को ढांपो, जो
नंगापन झेल रहे हैं।
उठो कि
उनको खुशी खिलाओ, जो
मुस्काना भूल गए हैं,
उठो कि
उनको हंसी पिलाओ, जो
हंसना सा भूल गए हैं।
उठो कि
उनको गले लगाओ, जो अपनो
से बिछड़ गए हैं,
उठो कि
उनको फिर बसाओ, जो
बिल्कुल ही उजड़ गए हैं।
उठो कि
उनसे रिश्ता जोड़ो, जो
रिश्तों से टूट गए हैं,
उठो कि
उनका साथ निभाओ, जो
तन्हा से छूट गए हैं।
उठो कि
उनको जीना सिखाओ, जो
जीवन से हार रहे हैं,
उठो कि
उनको लड़ना सिखाओ, जो
खुदको दिक्कार रहे हैं।
उठो कि
उनको इतना बता दो,
दुनियां उनके साथ खड़ी है,
उठो कि
उनको इतना बता दो,
मुश्किल बस दो चार घड़ी है।
उठो कि
उनको कसम खिला दो, हमको
जीना ही जीना है,
उठो कि
उनको कसम खिला दो, गम़के
सागर को पीना है।
उठो कि
उनको यकीं दिला दो, बुरे
वक्त से जो भी लड़ा है,
उठो कि
उनको यकीं दिला दो,
मालिक उसके साथ खड़ा है।
अशोक
वशिष्ठ
5
नवंबर 2005
|
|
|
Hindinest is a website for creative minds, who
prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.
 
 
 
 
|
|