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आराम अब जा के मिला है मेरी लेखनी को आराम नहीं हाथ नहीं दिल टुटा है ... ... और तेरे बारे में तो मैं दिल से ही लिखता था । व्यवसायिकता उपर चढ़ने के लिए जैसे कोई करता है सीढ़ी का प्रयोग आगे बढ़ने के लिए उसने किया मेरा उपयोग । व्यवसायिकत द्वारा : मुकेश सोनी दिसंबर २००५ बेंगलोर सोचा कि बीता कल किसे क्या दे पाया ? आने वाला कल किसने देखा ? ... सोचा आज में जी लूँ। भटकता रहा जीवन पथ पर उमर भर की प्यास लिए कौन करता अमृत वर्षा का इंतजार सोचा मदमाती सुरा पी लुँ। तुमसे मिलन की आस मन बगिया में खिलता रहा विश्वास तुम क्यों कर आती मगर ! हाय ! ये अलगाव है कष्टकर सोचा अपनी विस्मृतियाँ तुझे भेंट कर चलुँ। अब दिन देखो कैसा आया जो था पाया इक पल में गवायाँ मन बहुत था दुनिया को देने का समुन्दर की रेत पर इक धुंधली तस्वीर - शायद अधुरी भी सोचा अपनी छाप दुनिया में छोड चलुँ। मुकेश सोनी
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