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आने और लौट
जाने के बीच
आने और
लौट जाने में फर्क है
बसंत और
पतझड़ के बीच के
मखमली
अंतराल का
जब आए थे
तो ...
उड़ता था
यहां - वहां तितली सा
एक नाम
अनचीन्हा - अनजाना
पहचान
जोड़ता हुआ होंठों से
आने और
लौट जाने के बीच की
इसी
नर्माई में सोई थी
एक जादुई
लय, आंखें मूंदे
एक
पारलौकिक धुन, मुंह खोले
इन्हें
जगाया था हमने
रोज़
अल्लसुबह
आने और
लौट जाने के बीच
गूंज रहे
हैं, नई भाषा के
कुछ नये
शब्द, कुछ नये मानी
नए
दोस्तों के दिए नए संबोधन
मुखर
शब्दों के बीच, पर तौलता
है मौन
इस पार से
उस पार परवाज़ भरती हैं आंखें
आने और
लौट जाने के बीच
की ये
स्मृतियां
ख़यालों
की ऊंचाई से गिर कर
क्या ऐसे
ही शोर मचाएंगी?
ऐसे ही
जगाएंगी
जैसे
जगाया है
इस बावरी
नदी ने
रात के
सन्नाटों में
आने और
लौट जाने के बीच
कहीं जा
गिरा एक टुकड़ा वज़ूद
अब उठता
नहीं बहुत भारी है
वह एक नाम,
मेरे होंठों पर
बिखरा है
तितली के टूटे पंखों सा
चेहरे की
पथरीली उदासी पर
आना कितना
सहज होता है
जाना
कितना दुश्वार
आने और
लौट जाने में फर्क है
बसंत और
पतझड़ के बीच के
मखमली
अंतराल का
मनीषा
कुलश्रेष्ठ
जुलाई 1 , 2006
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