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अभिनेत्री के नाटककार पति के लिये

हे लेखक, नाटककार, कवि और चिन्तक।
गलत को सह सह कर बचपन से
तुमने खुब तपाया अपना अर्न्तमन
अपने को ही देकर प्रसव पीड़ा
तुमने क्रुद्ध नायक को जन्म दिया
वह तो हर बुराई से लड़ता था
अन्याय को कभी उसने न सहन किया।
तुम्हारे रचे महानायक के प्रदर्शन का
कुछ तो हिस्सा तुम्हारे अन्दर का ही होगा।
आखिर धुन के ऐसे हठी ठहरे तुम कि
कवि पिता की ज्यादतियों के कारण
पिता की मृत्यु के बाद ही तुमने
पहली कविता लिखी।
अब तो तुम श्रंगार रस में ही रच बस गये हो
पर वक्त आन पड़ा है इंकलाबी शब्दों को रचने का
मंच से बाहर लाना है तुम्हे
अपने रचे क्रुद्ध नायक को
जीवन के वास्तविक कुरूक्षेत्र में लड़ने को।
तुम कहते हो अभिनेत्री पत्नी ही नहीं प्रेमिका भी है तुम्हारी
ये तो निजतायें और अस्मितायें हुआ करती हैं।
अब देर कैसी?
सिद्ध तुम्हे अब करना है
कि व्यवस्था से नाराज बगावती नायक की रचना ही नहीं
तुम खुद भी झण्डा उठाकर आगे चल सकते हो
नायक को जन्माने का रचनाकर्म ही नहीं
युद्धकर्म भी कर सकते हो।

राकेश त्यागी
सितम्बर 1, 2006




 

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अभिनेत्री, उसके पिता और पति के लिये

तुम तो त्रिमूर्ति कहे जाते हो नये भारत की।
अब तुम्हे सिद्ध करना है
कि तुम्हारे अल्फाज़, नाटक, कवितायें और आन्दोलन महज लफ्फाज़ी नहीं थे।
वह केवल अभिनय नहीं था।
लाखों निगाहें तुम पर हैं।
अपनी वाणी को निशब्द न होने देना
युद्ध से विरत अर्जुन के पात्र का अभिनय न करो
चक्रव्यूह में घुसकर उसे ध्वंस करने वाले अभिमन्यु पर अपना ध्यान केन्द्रित करो।
तुम्हारे लिये वास्तविक जीवन में औरों के मामलों मे किये गये संघर्ष
तुम्हारी नाटकों की रचनाशीलता का फैलाव हो सकता है।
पर उन सबके लिये तुम्हारा मौन रह जाना घातक होगा
जो तुम्हारी नाटकीय रचनाशाीलता को वास्तविक मानते रहे हैं।
उनके लिये, उनके भरोसे के लिये नाट्र्यशास्त्र को जीवंत कर दो।
जीवन के वास्तविक रंगमंच पर भी वैसा ही
विरोध का जीवन्त अभिनय करो
जैसा मंच पर परदा उठने के बाद करते हो।

राकेश त्यागी
सितम्बर 1, 2006



 




 

           
 

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