चौथा पहर

रात का यह चौथा पहरचाँदनी रात,
राधा के लिये ,
जैसे ज्येष्ठ- आषाढ़ की शिखर दुपहर ।
तीन पहर बीत गये कान
के किये दीदार,
रात का  यह चौथा पहर ,
राधा पर ढाता कहर।
 

रात का यह चौथा पहर,
रुक्मणि  सोई ,
जैसे  बेच  शहर- बाज़ार ।
नींद गहरी मन में चैन,
सपने देखते नाचें नैन ,
यह रात का चौथा पहर,
रुक्मणि पर बिखेरता सुनहर।
 

रात का यह चौथा पहर,
 मीरा के लिये एक बराबर,
 क्या जंगल क्या शहर ।
 पालने में शाम,
 झुलारे देते नहीं झपकते नैन।
एक ही लोरी ,
एक ही ध्यान
मेरे गिरधर गोपाल

 दूजा न कोई,
उसके लिये एक बराबर अमृत और ज़हर।
मदहोश, मदमस्त ,बेखबर
, कब सांझ ढली, कब हुई सवेर
 जिसके लिये युगों की नहीं गिनती
उसके लिये क्या पहला और क्या चौथा पहर ।
 

 डॉ.शशि पठानिया
सितम्बर 1, 2006

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चाँदनी रात

आज चाँदनी रात है  ,

तेरी यादों की सौगात है ,

इस वक्त न तुम्हारी  और न मेरी  ज़ात है।

हम दोनों गैरहाज़िर ,

अपनी -अपनी जगह हाज़िर ,

यादों के हमसफ़र,

जज़्वातों का झंझावात है,

क्योंकि तुम्हारी यादें हैं ,

तुम नहीं,

लेकिन फिर भी क्या बात है।

                 डॉ.शशि पठानिया
सितम्बर 1, 2006