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चौथा पहर
रात का यह चौथा पहर
रात का यह चौथा पहर,
रात का यह चौथा पहर,
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चाँदनी रात
आज चाँदनी रात है
,
तेरी यादों की सौगात है ,
इस वक्त न तुम्हारी और न मेरी ज़ात है।
हम दोनों गैरहाज़िर ,
अपनी -अपनी जगह हाज़िर
, यादों के
हमसफ़र, जज़्वातों
का झंझावात है, क्योंकि
तुम्हारी यादें हैं , तुम नहीं, लेकिन फिर
भी क्या बात है।
डॉ
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