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.......दिन रात की तकरार से

थक गया हूं अब तो मैं, दिन रात की तकरार से
गोया टूटा हो मुसाफ़िर, रास्तों की मार से।
 

अब तलक है आस मुझमें, क्योंकि बाक़ी सांस है
जीते जी शायद वो मुझसे, बात करले प्यार से।
 

जो भी आया झोलियां भर कर गया अपनी मगर
मैं ही लौटा हाथ ख़ाली, आपके दरबार से।
 

ऐ जहां वालो भला क्यों आपको इलज़ाम दूं

मैं परेशां हूं बहुत, ख़ुद अपने ही किरदार से। 
देखते रह जाइयेगा मेरे कदमों के निशां

जब चला जाऊंगा इक दिन दूर इस संसार से।

तेजेन्द्र शर्मा
फरवरी 8, 2008
 

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