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भोली सी गाय 

एक भोली सी गाय 

रोज सुबह खड़ी-खड़ी रंभाती है।

ऊँचे दरवाजों पर, नहीं चीर

पाती उसकी आवाज

बजते अश्लील संगीतो को।

थक हार कर लड़खड़ाते

कदमों से खोजती है

पेड़ों को, हरियाली को

बहती नदियों को।

पर नहीं मिलता उसको

ऐसा कोई निशां

पूछती है पता

कभी रोकर, तो कभी

रंभाकर

ढूंढती है उन रास्तों को

जो जाते हो उसके गांव

की ओर।

कोसती है

उस दिन को जब

बेचा गया था दलालों के

हाथ उसको।

याद करती है

गाँव में गुजरे, वे सुखद

पल।

पर नहीं मिले वे सुख

यहां, न ही मिले वे सुख

यहां, न ही मिलने

की आस है

रोज सुबह खड़ी-खड़ी रंभाती है

ऊँचे दरवाजों पर,

एक प्यारी, भोली-सी गाय।

संजय सेन सागर
मार्च 5, 2008

 

           
 

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