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ढलती शाम को

कभी-कभी

ढलती शाम को

उदास मन

दुनिया बदलने की बात सोचता है 

इक नयी दुनिया हो

जिसमें सब कुछ -

बढ़ना

चढ़ना

लड़ना

झगड़ना

चाह

डाह

लूट

खसोट

यारी

दुश्मनी

वासना

उपासना

आस

प्यास

खटास

मिठास -

और वह सब भी

जो उदासी में सूझता नहीं

कहें और सुनें

बस, छोटी-छोटी कविताएँ

सुशील गोस्वामी
मार्च 5, 2008

           
 

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