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ढलती शाम को कभी-कभी ढलती शाम को उदास मन दुनिया बदलने की बात सोचता है इक नयी दुनिया हो जिसमें सब कुछ - बढ़ना चढ़ना लड़ना झगड़ना चाह डाह लूट खसोट यारी दुश्मनी वासना उपासना आस प्यास खटास मिठास - और वह सब भी जो उदासी में सूझता नहीं कहें और सुनें बस, छोटी-छोटी कविताएँ
सुशील
गोस्वामी |
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