इस सभा में चुप रहो 

इस सभा में

चुप रहो

हुआ बहरों का

आगमन ।

ये खड़े हैं

आईने के सामने

 

यह जानते हैं

अपने ही

दाग़दार

चेहरे नहीं पहचानते हैं ।

तर्क का

 उत्तर बचा

केवल कुतर्कों

का वमन ।

बीहड़ से चल

हर घर तक

आ चुके हैं

भेड़िए ।

हैं भूख से

व्याकुल बहुत

इनको तनिक न

छेड़िए ।

लपलपाती

जीभ खूनी

ज़हर भरे इनके वचन

हलाल इनके

हाथ से

 जनता हुई है

 आजकल ।

काटते रहेंगे हमेशा

लूट -डाके की फ़सल ।

याद रखना

उतार लेंगे

लाश का भी

ये कफ़न ।

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
अप्रेल 1, 2007

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