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इस सभा में चुप रहो इस सभा में चुप रहो हुआ बहरों का आगमन । ये खड़े हैं आईने के सामने
यह जानते हैं – अपने ही दाग़दार चेहरे नहीं पहचानते हैं । तर्क का उत्तर बचा केवल कुतर्कों का वमन । बीहड़ से चल हर घर तक आ चुके हैं भेड़िए । हैं भूख से व्याकुल बहुत इनको तनिक न छेड़िए । लपलपाती जीभ खूनी ज़हर भरे इनके वचन । हलाल इनके हाथ से जनता हुई है आजकल । काटते रहेंगे हमेशा लूट -डाके की फ़सल । याद रखना उतार लेंगे लाश का भी ये कफ़न ।
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