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आज राम की आँखें हैं उदास 

अजान बाहु राम ने
कानूनी दराज से
पन्ने निकाले
महिला विधेयक
उसके काले अक्षरों
में जंगल की तमाम
वृक्ष झाडियां
कंटकाकीर्ण राहों में
खून से सने
लहुलुहान कोमल पग
संशय की आग में
झुलसती
बार-बार सीता
,
रोती
, कलपती
बार-बार सीता
यादें बार-बार आती हैं पास

आज राम की आंखें हैं उदास

राम
एक बार मैं फिर
अयोध्या आना चाहती हूँ
तुम्हारे क
ांधे पर सिर
रखकर रोना चाहती हूँ
राम के राजीव लोचन से
दो बूँद सरक आये
पर शब्द!
गुलाबी होंठ पर पड़ी
पपड़ियों के कांटों
से बाहर नहीं निकल पाये
सीता का मन कसैला हो गया
सरयू का पानी फिर मैला हो गया
राम के हाथ से
काले अक्षरों के सफेद पन्ने
हवा में लहरा उठे
सीता ने देखा
,
पढ़ा फिर बोलीं

नहीं राम!
मुझे विधेयक नहीं
विश्वास चाहिए
मुझे कानून नहीं
अनुराग चाहिए
राम!
शर्तों पर रचते
विवाह
स्वयंवर कहलाते
पुरूषोत्तम का लबादा
ओढे
स्त्री को वन पहुँचाते
शीलनिधि का दर्प
बार-बार झुलसाती
मुझे
मर्यादाओं और नैतिकत

पर
हलाल होती मैं
एक बार फिर अयोध्या
आना चाहती हूँ

तुम्हारे कांधे पर सिर
रखकर रोना चाहती हूँ
मैं दफन हुई तो
इसलिए कि
कभी नहीं जन्मेगी सीता
राम की आत्मप्रशंसा
की अग्नि में
कभी नहीं झुलसेगी
सीता
लेकिन-
यहाँ तो रोज
जन्म लेते हैं राम!

स्वारथ के राम
महारथ के राम
सुख के राम
अपने दु:ख के राम
रोज ही जलती हैं
सीतायें
परम्पराओं के नाम
पर
मारी जाती हैं
धकेली जाती हैं
फिर भी राम
एकबार फिर मैं
अयोध्या आना चाहती हूँ
उस शील निधि
मर्यादा पुरूषोत्ताम
राम के लिये नहीं
,
एक सरल-सहज
राम के साथ
उसके क
ांधे पर
सिर रखकर रोना
चाहती हूँ
राम अतीत के हैं बहुत
पास
आज राम की आंखें हैं
उदास
...

डॉ.मनसा पांडेय
जुलाई 16,2008

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