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आज़ादी का त्योहार लज्जा ढकने को मेरी खरगोश सरीखी भोली पत्नी के पास नहीं हैं वस्त्र, कि जिसका रोना सुनता हूँ सर्वत्र ! घर में, बाहर, सोते-जगते मेरी आँखों के आगे फिर-फिर जाते हैं वे दो गंगाजल जैसे निर्मल आँसू जो उस दिन तुमने मैले आँचल से पोंछ लिए थे ! मेरे दोनों
छोटे क्योंकि,
नये युग
के सपनों की ये तस्वीरें हैं ! इनकी रक्षा को पर,
सावधान !
लोभी गिद्धो !
महेंद्र
भटनागर |
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