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अधिकारों के नाम पर पुरुषों ने औरत को खूब ही ठगा है, अधिकारों के नाम पर उसे ही छला है। नारी क्यों आधुनिकता के चक्कर में अपना मान खो रही है, अप्राप्य को पाने की धुन में प्राप्य को भी खो रही है। नारी को पुरुष के समान क्यों बनाते हो, वो
तो
उठी
हुई
है
,उसे
क्यों
गिराते
हो। क्षमा,त्याग, ममता की मूरत बन नहीं सकता। फिर,कॆसे ये नारी पुरुषों से हेय हुई, सदा श्रेष्ठ हॆ नारी, फिर क्यों हेय हुई। कर्त्तव्य निर्घारित किये हैं सृष्टि ने दोनों के ही, क्यों अधिकार याद ,कर्त्तव्य भूलते हैं दोनों ही। नारी की गरिमा खंडित करने में पुरुषों का हाथ है , अपनी गरिमा न संभाल पाई नारी ,ये उसका भी स्वयं दोष है। दहेज की बलि वेदी पर चढा कर नारी का अपमान किया, नारी ने अपनी लाज छोड़ क्या खुद का कोई मान किया। पुरुषों ने नारी को घर में बंदिनी बना रखना चाहा, नारी ने घर से निकल प्रगति की और बढ़ना चाहा। पुरुष ने रोक लगाने को बढ़ाए, किन्तु खींच लिए हाथ अपना लाभ जान, प्रगति के चक्कर में घर-ऑफिस के पाटों में पिस कर रह गयी एक जान।
रुचि
चंद्रा |
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