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बादल इक जैसा ही बरसा करते हैं जब भी किसी से कुछ भी सौदा करते हैं लोग सदा ही अपना सोचा करते है साथ चले हो ,रास्ते में मेरे साथी कुछ भी मिले तो आधा-आधा करते हैं अपने और पराये में क्यों भेद रहे एक नज़र से सबको देखा करते हैं उनसे पूछो जिनकी माएं जग में नहीं माँओं को वे कितना तरसा करते हैं प्यार बिना बच्चे कैसे मुस्कायेंगे ये गुंचे मधु रितु में महका करते हैं जग जितना तेरा है उतना मेरा है कुछ तो सोचा कुछ तो समझा करते हैं प्राण,जरूरी बात नहीं,हर आँगन में बादल इक जैसा ही बरसा करते हैं
प्राण
शर्मा |
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