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अप्रत्याशित  

सदा ... सदा  की तरह
नव मेघों के उपहारों की  लेकर बाढ़
आया आसाढ़;
पर, तीव्र पिपासाकुल चातक ने कुछ न कहा,
सूनी-सूनी आँखों से बस देखता रहा,
आगत का स्वागत नहीं किया,
जीवन-रस  नहीं पिया! 

सदा ... सदा की तरह
झर-झर सावन बरसा ,
रतिकर कम्पित वक्षस्थल ले ,
उमड़ी .. तड़पीं  श्याम घटाएँ,
हरित सजल आँचल  फैलाए ,
पर, नृत्य मयूरों ने नहीं किया !
भादों बीत गया नीरस
मौन गगन ने
कजली गीतों का स्वर नहीं दिया! 

सदा ... सदा की तरह
आयीं शारद-ज्योत्सना रातें शीतल
याद दिलाने
मांसल विधु-वदनी की बातें!
पर, शुक्लाभिसारिका
निज घर  से नहीं हिली,
पथ सुनसान बनाए प्रति निशि जागा,
शांत सरोवर में
नहीं मोरपंखी कहीं चली! 

सदा  ....  सदा की तरह
लह-लह मधु-माधव आया ,
नव पल्लव
रंग-बिरंगे पुष्पों के गजरे लाया,
पर, वासंती नहीं खिली,
मधुकंठी की पीड़ा भी नहीं सुनी ! 

बोझिल तिथियों का ,
धूमिल स्मृतियों का ,
एक बरस
बी ... त ... ग .... या !



महेंद्र भटनागर
जनवरी 11, 2008

           
 

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