|
उम्र के चालीसवे वसंत में
उम्र के चालीसवें
वसंत में-
गिरती है समय की धूप और धूल
फ़र-फ़र करती झरती हैं तरुण
कामनायें
थोड़े और घने हो जाते है मौन के
प्रायः दीप
फिर,
फिर खोजता है मन सताए हुए
क्षणों में सुख!
उम्र के चालीसवें वसंत में-
छातों और परिभाषाओं के बगैर भी
गुजरता है दिन
सपने और नींद के बावजूद बीतती
है रात
नैराश्य के अन्तिम अरण्य के पार
भी होता है सवेरा
जीवन के घने पड़ोस में भी दुबकी
रहती है अनुपस्थिति!
उम्र के चालीसवें वसंत में-
स्थगित हो जाता है समय
खारिज हो जाती है उम्र
बीतना हो जाता है बेमानी!
डॉ.मनीष मिश्रा
22सितंबर, 2009
|