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अहले किताब ने मगर क्या तेरा हाल कर दिया मिलते हुए
दिलों के बीच और था फैसला कोई ए मेरी
गुलज़बीं तुझे चाह थी एक किताब की अब के हवा
के साथ है दामने यार मुंतजिर मुमकिना
फैसलों में एक हिज्र का फैसला भी था मेरे लबओं
पे मोहर थी, पर मेरे शीशा रु ने तो चेहरा औ
नाम एक साथ आज न याद आ सके मुद्दतों
बाद उसने आज मुझसे कोई गिला किया
परवीन शाकिर |
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