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तुम्हारे प्रेम में हूँ...ये कुछ सबूत मुझको मिले हैं

तुम्हारे आने पर अब
नहीं सवांरती बालशीशा नही देखती ..
नही लगाती करीने से चाय की ट्रे
कुछ और तो लो ,जिद भी नहीं करती
उड़ेलती हुई दिन भर की बीती..
बिंदास देती हूँ गालियाँ और मजे में कह जाती हूँ
उठा लाओ तो जरा दूर रखी मेरी चप्पलें
फर्श बहुत ठंडा है ..
भूल ही जाती हूँ वह पहली तारीख जिसमे हम मिले थे
तुम्हारे प्रेम में हूँ ..
ये कुछ सबूत मुझको मिले हैं ....

बह गईं हैं खारे पानियों में
तन मन की निबोलियाँ ..
क्षुब्ध ज्वालाओं के तर्पण कर चुकीं हूँ
बाकी नही रहे हाथों पर अड़ियल जले निशाँ

अंधड़ो से नाते...
आजकल रुला नही पाते
कितने वेश बदलने पड़ते..
तुमसे खुली किताब
भूलने और माफ़ भी करने लगी हूँ
तुम्हारे प्रेम में हूँ..
ये कुछ सबूत मुझको मिले हैं ..

व्यस्तताओं की उलझी लटों में
खिलते हैं बारहमास तुम्हारी फ़िक्रों के फूल

लेते है राहत की सांस..

इस ख़ुशी में..
कि ठीक ठाक पहुँच गए हैं मुझ तक
जैसे तेज रफ़्तार गाड़ी के आगे से..
दौड़कर निकल जाए हँसता हुआ बच्चा

सारी बातेंखुराफातेंसारे गुस्से आस पास के
रख देती हूँ...
मिटटी सनी सीपियों से
पौंछतेधूसर थकानों के निशान..
कभी नही रखते रस्तों पर संदेहों के स्याह पहाड़
कुछ भी नही पूछते ...

जैसे नही बोल पाई हूँ तुमसे
शुक्रिया...
तुम्हारे प्रेम में हूँ...
ये कुछ सबूत मुझको मिले हैं !!!  

वन्दना शर्मा
4 मार्च 2012
 

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