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धत्त्त ....

यार तुम बहुत बिंदास हो
तुम्हारी बात ही कुछ और है
अब तक कहाँ थीं ?
तुम्हारे जैसा पहले कोई कभी नही मिला ...

अँधेरे तहखानो में लगाईं गईं, ऐसी तमाम सीढीयाँ उतरतीं ही नही बेहया औरते
करिए बेशर्म इशारे, लाख मारिये आँखें
क्या मजाल जो शर्मा जाएँ..
कमबख्त देखती भी इस तरह हैं
कि मानो कह रही हों..
हाँ तो कहिये जनाब और कितना नंगे हो सकतें हैं आप ..

बेहया ये औरते,
उकेर ही देतीं हैं कलेजों पर, अपने होने का पता
बिछ जातीं हैं आपकी व्यवस्थाओं में, बारूदी सुरंगों की तरह
क्या मुसीबत है कि सूंघ ही लेती हैं जालिम
दबे पाँव बढ़ते स्टेथस्कोप,आकस्मिक लेट नाईट मीटिंगे,अचानक बढाई गई सेलरी
कमर पर आशीर्वादों के हाथ और द्विअर्थी संवाद ..

झिड़क देतीं हैं तिलचट्टे से, सदियों के सफल मंसूबे
खा गईं सब लाज शरम बेचकर...
करेंगी बहस ,हँसेंगी ठठाकर..
शरीयत को दिखातीं हैं आँख ..
बनेंगी प्रधान ,चलेंगी धकिया कर
चालीस की उम्र में भी पहनेंगी जींस....
समझायेंगी मजे में सेक्स के मीन्स

बेपरवाह टांगती हैं दुपट्टे, एकाग्र पढ़ाती हैं लिंग सरंचना
बिंदास छांटती हैं अंत:वस्त्र और सेनेटरी नैपकिन
साधारण गालियाँ तो छोड़िये ...
जब आप भरे पूरे मर्द होकर उच्चारेंगे चूतिया
तब भी कमजर्फ घूरतीं हैं ऐसे
कि जैसे भरे बाज़ार कर जाए कोई बधिया..
अरे प्लेटो अरस्तू को कर चुकीं हैं पस्त,पंजा लडातीं हैं देरिदा से
ज़िंदा मुसीबतें सी नाचती हैं सर पर,अब क्या ख़ाक डरेंगी खुदा से

दसियों प्रेमिकाओं पर आजमाए गये शेर गजल
जब सुनाते हैं आप
और ज्यों ही झूमता है अन्दर का शैतान ..रमैया वस्ता वैया
मुंह पर मार निकल लेती हैं ..और क्या हाल हैं भईया
धत्त्त्तत्त
ये भी कोई औरते हैं
महाकवि तुम्हरी बलिहारी
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी,ये सब ताड़न के अधिकारी !!!

वन्दना शर्मा
4 मार्च 2012
 

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धत्त्त ....

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