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गणतन्त्र दिवस

पापा कहते हैं
उन्होंने गणतंत्र दिवस देखा था

शायद बयालिस की बात हो
जब बिल्कुल करीब रहता था
घर के इक सदस्य की तरह

घर की छत नहीं थी
ठंढ़ में साथ ही ठिठुरते और
जगे रहते रात रात भर
कुछ सुनते सुनाते कंपकंपाते
चिपक कर बैठे रहते

अब वैसी ठंढ़ कहां?

– अखिलेश सिन्हा

मैं गणतन्त्र दिवस मनाऊंगा

मैं गणतंत्र दिवस मनाउंगा
पापा मना मत करना

माना बाहर ठंढ़ बहुत है
और वस्त्र नहीं हैं ऊन के मेरे
पर लाल किले तक जाउंगा
पापा मना मत करना

माना नन्हें हाथ हैं मेरे
और ऊंचा आकाश बहुत है
पर झंडा ऊंचा फहराउंगा
पापा मना मत करना

दशक चंद और वर्ष कई भए
तुम कहते तो मान गया मैं
पर मैं नया गणतंत्र मनाउंगा
पापा मना मत करना

कब से काले बादल सारे
सूरज को जा घेरे तो क्या
बन दीपक जल जाउंगा
पापा मना मत करना

मटमैला सा उनका पानी
और नीलम सी इनकी धारा
पर संगम बन मिल जाउंगा
पापा मना मत करना

जब भी देखूं सुध बुध खो दूं
ऐसी सुन्दर भारत मां
मैं नाच नाच गिर जाउंगा
पापा मना मत करना

मैं गणतंत्र दिवस मनाउंगा
पापा मना मत करना

– अखिलेश सिन्हा
जनवरी 26‚ 2001

उनके कहने से क्या होगा

कहते हैं
दस साल में नागरिकता मिल जाती है
और मिलता है जीने का अधिकार
एक निर्भय सहज जीवन जीने का

यहां तो दशक पे दशक बीत गये
पर आज भी
भयभीत सा रहता है गणतंत्र

सभी तो सता जाते हैं इसेः
रंग भाषा जाति मजहब
प्रांत अर्थ रिश्ते

कभी कभी लगता है
बीत जायेंगी शताब्दियां
इसी तरह इंतजार में

और सोचने लगता हूं
मिली है कभी भी कहीं भी क्या
नागरिकता गणतंत्र को ?
किसी के कहने से क्या होगा ?

– अखिलेश सिन्हा
जनवरी 26‚ 2001

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