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प्रसिद्ध हास्य कवि प्रदीप चौबे जी की इन हास्य कविताओं द्वारा भारतीय व्यवस्था पर करारे व्यंग्य
व्यवस्था

1
पलक झपकते ही
हमारी अटैची साफ हो गई
झपकी खुली
तो सामने लिखा था –
इस स्टेशन पर
सफाई का
मुफ्त प्रबंध है!


2
होनी थी‚
हो गई
डाक–व्यवस्था पर
जो फिल्म बनी थी
वह डाक में ही
कहीं खो गई।


3
रात
बारह बजे के बाद
आई एक
पुलिस वाले की आवाज़
किसी ने सुना – जागते रहो
किसी ने सुना – भागते रहो


 

4
इनक्वायरी काउंटर पर
किसी को भी न पाकर
हमने प्रबंधक से कहा जाकर –
' पूछताछ बाबू सीट पर नहीं है
उसे कहाँ ढूंढें? '
जवाब मिला –
'पूछताछ काउंटर पर पूछें!'


5
सरकारी बस थी
सरकती न थी‚
बस‚
थी।


6
सरकारी बस की
भीड़ में
वह ऐसा फँस गया
कि फिर न निकला
वहीं बस गया


7
पुल‚
पहली बरसात में बह गए
केवल
बनाने वाले रह गए!

भिखारी

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