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तुम बोना कांटे

तुम बोना कॉंटे;
क्योंकि फूल न पास तुम्हारे।
बो सकते हो
वही सिर्फ जो
उगता दिल में;
चरण पादुका
ही बन सकते
तुम महफिल में।
न देव शीश पर चढ़ते कॉंटे
सॉंझ सकारे ।
हॅंसी किसी की
अरे पल भर भी
सह न पाते;
और बिलखता देख किसी को
तुम मुस्काते ।
जो डूबते
उनको देखा
बैठ किनारे।
जीवन देकर भी है हमने
जीवन पाया;
अपने दम से
रोता मुखडा
भी मुस्काया।
र्सौ सौ उपवन
खिले हैं मन में;
तभी हमारे।



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

कविताएं
वश में है   - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
तुम बोना कांटे
  - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
माँ की ममता - राजेसिंह उपनाम पी.डी.राजन   तृतीय पुरस्कार
तुम्हारी ममता - श्रीमती स्मिता दारशेतकर
माँ होने का अहसास -  कायनात काजी
हम और बच्चे -  विकेश निझावन
बचायें बचपन
  - रोहिनी कुमार भादानी
ममता का समंदर  - रेणु आहूजा।
ममता
- अम्लान मिश्र
लहरों में  -गरिमा गुप्ता
यादें - समीर लाल

कहानियां
उसके हिस्से का सुख - विकेश निझावन
तरंगों की तल्खियां - धनपत राय झा
ओस की नन्हीं बूंद - सरोज मिश्र  प्रथम पुरस्कार
लेख
बचपन
: सिखाएं अपने बच्चों को दोस्त बनाने की कला- के. सुधा
आप और आपके किशोर होते बच्चे : आज आपने अपने बच्चे को गले लगाया
? - के. सुधा द्वितीय पुरस्कार
 

कार्यशाला  16 | 15 |14 | 13 | 12 | 11 | 10 | 9 | 8 | 7 | 6 | 5 | 4 | 3 | 2 | 1


 

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