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उसके हिस्से का सुख

- टिपी-टॉप टिपी-टॉप व्हाट कलर यू वान्ट?
- आई वान्ट ... आई वान्ट ... ब्लैक कलर!
- बलैक कलर ... ब्लैक ... ब्लैक ... ! भागते-भागते इधर-उधर नज़र दौड़ाते हुए मौंटू ने मान्या के बालों को जा छुआ था- यह रहा ब्लैक कलर!
- आंटी के बालों का रंग... ऋचा दौड़ती हुई पास आ गई थी- नहीं-नहीं! यह ब्लैक कलर नहीं है।आंटी के बालों का रंग तो सफेद है।
- हट्ट! बुद्वू कहीं का! सफेद बाल तो केवल बूढ़ों के हुआ करते हैं।
- लगता है तेरी आंखों में जाला आ गया है।देख तो ढेर सारे सफेद बाल।काले बाल तो कहीं-कहीं रह गये हैं।आंटी अब बूढ़ी हो गई हैं न।
- ममी आप बूढ़ी हो गई हैं? मौंटू ने दोनो हाथों से मान्या का चेहरा अपनी ओर घुमाते हुए पूछा।
- हां! मैं अब बूढ़ी हो गई हूं।मान्या दोनो के चेहरों की ओर देख मुस्कराने लगी।
- तो फिर ... अब तो पापा भी बूढ़े हो गये होंगे!
- मौंटू! मान्या एकदम से चिल्लायी। हाथ भी जैसे उठने को था।पीछे से राजीव ने आकर कब उसका हाथ रोक लिया उसे नहीं पता चला।
- क्या करने जा रही थीं आप! राजीव अपने शब्दों को दबाता हुआ बोला था।मौंटू और ऋचा दोने सहम गये थे।
मान्या खुद पर झुंझला आयी।यह उसे क्या होता जा रहा है आजकल।मौंटू के इतना भर कहने से ही उन्हें इतना गुस्सा आ गया।जिस आदमी के नाम भर से नफरत करने लगी थी आज उसके लिये इतनी सी बात गंवारा नहीं।
आखिर पिघल ही गयी न।पिघल भी क्या गयी प्यार उमड़ने लगा है अब तो शेखर केलिये।उसके बूढ़े होने का अहसास मात्र भी सहन नहीं हो पा रहा।नहीं-नहीं! वह क्यों कर कमज़ोर पड़ने लगी।जिस आदमी के कारण आज उसकी यह दुर्दशा हो गयी उम्र से पहले ही बुढ़ा गयी फिर उस पर क्यों प्यार आयेगा।
राजीव कल भी आया था।मौंटू छत पर खेल रहा था।गैलरी में राजीव को आते देख लिया तो चिल्लाते हुए नीचे आ गया था - अंकल आ गये ... अंकल आ गये ...!
राजीव के आने की इतनी खुशी! मौंटू को प्रसन्न होते देख उसे भी अच्छा लगता है।मौंटू के खिलते हुए चेहरे के साथ वह अपने चेहरे के भावों को बदलने की कोशिश करती है।आंगन में लटक रही मोतिये की बेल से एक फूल तोड़ कर अपने जूड़े में लगा लेती है।कहीं चेहरे के फीकेपन का अहसास राजीव को न हो जाए।
राजीव आंधी की तरह कमरे में घुसता है।वह मान्या को देख कर भी अनदेखा कर देता है और छत की ओर मुंह करके चिल्लाता है- मौंटू बाबा कहां गया ... देखो तो हम उसके लिये क्या लाये हैं...।
-केरम बोर्ड! मौंटू चिल्लाता हुए पास आ जाता है।
मान्या को याद आता है कल राजीव के जाते वक्त मौंटू ने उससे कैरमबोर्ड लाने की फरमाईश कर दी थी।और आज राजीव उसकी फरमाईश पूरी कर लाया है।उस रोज़ मौंटू ने बैट-बॉल के लिये कहा था तो राजीव बैट-बॉल ले आया था।मौंटू तो रोज़ कुछ न कुछ मांगेगा।नहीं वह मौंटू को मना करेगी।लेकिन क्या मौंटू समझ पायेगा? विचलित हो उठती है मान्या।
एकाएक फिर राजीव का ध्यान आता है तो पुन: एक अनचाही मुस्कान चेहरे पर ओढ़ लेती है।राजीव फर्श पर ही बैठ मौंटू से केरम खेलने में मग्न हो गया है।वह खेलने में सचमुच इतना मग्न है या केवल खेलने का अभिनय कर रहा है मान्या कुछ समझ नहीं पाती।दबे पांव करीब जाती है।-हमें नहीं खिलाओगे बाज़ी? तनिक राजीव की ओर झुकती हुई कहती है।
-न! राजीव गर्दन झुकाये जवाब देता है- खेलने वालों को बच्चों जैसा चुस्त होना चाहिये।चेहरे पर फूलों जैसी रौनक होनी चाहिये।वह जैसे एकदम से बुझ जाती है।मोतिया के फूल भी चहरे की रौनक नहीं बढ़ा पाये।एकाएक हाथ फूल की ओर उठ जाता है। कहीं गिर तो नहीं गया।फूल तो सही-सलामत अपनी जगह पर ही है।चुपचाप सामने सोफे पर बैठ जाती है।
अनदेखा कर भी राजीव सब नोट करता चला जा रहा है।एकाएक धड़म्म से उठ जाता है- हम थक गये।अब मौंटू बाबा खुद ही खेलेगा।
-अंकल हार गये ... अंकल हार गये...। मौंटू ताली बजाता हुआ स्वयं ही खेल में मग्न हो गया।
राजीव आहिस्ता से उनके पास आता है और कंधे पर हाथ रख देता है।वह चौंक पड़ती है। पता नहीं कहां खो गयी थी।- तुम हारे या जीते? एकाएक पूछ बैठती है।
-मैं हार गया! राजीव एक अनचाही मुस्कान ओढ़ते हुए बोला - मुझे लगता है मैं अगली बाज़ी भी हार जाऊंगा।
-हारने से इतना डरते हो तो अगली बाज़ी मत लगाओ।
-आदमी को कुछ हासिल करने के लिये बाज़ी तो लगानी ही पड़ती है।झट से विषय बदल लेता है- अच्छा हारने से हमारे दिमाग पर जो बोझ हो गया है उसे दूर करने के लिये एक कप कॉफी तो पिला दें।
मान्या मुस्कराती हुई उठ जाती है।राजीव भी रसोई में साथ आ गया है।वह खामोशी से कॉफी बना रही है।राजीव ही कहता है- आपने कभी गुलाब का फूल देखा है?
मान्या चौंकती है।पल भर के लिये राजीव के चेहरे की ओर देखती हुई कहती है- क्यों नहीं! अपने बोलने का लहज़ा जानबूझ कर बदल लेती है
- बताओ तो किस रंग का होता है गुलाब?
-लाल रंग का।मान्या को आभास हो जाता है कि वह बिल्कुल बच्चों की तरह जवाब दे रही है।
-लगता है आपने दूसरे रंगों के गुलाब नहीं देखे।जानती हैं आजकल हमारे आंगन में काले रंग के गुलाब खिल रहे हैं।
राजीव कहना क्या चाहता है वह समझ नहीं पाती।मूक सी बनी उसके चेहरे की ओर देखने लगती है।
-एक गुलाब कल आपके लिये भी लाऊंगा।काला गुलाब। खूब जंचेगा आपके बालों में।लाल गुलाब से कहीं ज्यादा।काले और सफेद का कंाबीनेशन तो खूब रहता है न।
-राजीव! सचमुच किसी शंका से घिर आती है वह।
सफेद बालों में सफेद फूल क्या खाक लगेगा।दिखलायी भी नहीं पड़ता।
वह जानती है राजीव ने व्यंग्य किया है।चुप रहती है।राजीव करीब चला जाता है।दांत चबाता कहता है- कभी सोचा है क्या हालत बना रखी है अपनी?
-तो क्या करूं?
-अपने पहले जीवन में लौट जाओ।
-दैटस इम्पॅासिबल! अगर उस व्यक्ति का ईगो है तो मैं भी अपने स्वाभिमान को डिगा नहीं सकती।और फिर उसने तो अपना नया साथी ढूंढ ही लिया है।
-आप भी अपने जीवन को पूरी तरह से मोड़ डालिये।
-कैसे?
-किसी ओर का हाथ थाम कर।
-व्हॉय ?
-मौंटू के लिये।
-यह क्यों नहीं कहते कि जीवन को और नर्क बनाने के लिये।वह हांफने लगती है।राजीव बुत्त सा बना उसे देख रहा है।जरा रूक कर कहता है- मेरी बात को समझने की कोशिश करो।कोई जाना पहचाना व्यक्ति मिल जाए तो हर्ज ही क्या है।
-एक मिला है।
-फिर ?
-वह मानेगा ?
-आपने पूछा ?...कौन है ...। राजीव का वाक्य अधूरा रह जाता है।
-वह तुम हो राजीव ... तुम हो।मान्या फट सी पड़ी।
राजीव जड़ हो जाता है। जरा रूक कर कहता है- मैंंने यह बाज़ी नहीं लगानी चाही थी।मैं आपके ऑफिस का मामूली क्लर्क। मैं ... आपकी इज्जत करता हूं।
-मैं जानती हूं राजीव।लेकिन मौंटू तुमसे जुड़ चुका है।
-वह मुझसे नहीं जुड़ा।वह एक अभाव को पूरा करने के लिये जुड़ा है। मेरी जगह कोई दूसरा आदमी होगा तो वह उससे भी जुड़ जाएगा।
-दूसरा आदमी।मान्या कहीं भीतर तक आहत हो आती है।राजीव के चेहरे की ओर देखती कहती है- तो क्या उस दूसरे आदमी से मैं जुड़ पाऊंगी? मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो राजीव।
वह समझ गयी थी राजीव इतनी दूरी नहीं पाट सकता।उसका ओहदा ... उसकी आयु ... उसका समाज ...।
कोई दूसरा व्यक्ति ? नहीं-नहीं! उसे घिन्न हो आती है।मौंटू का भविष्य अब केवल उसी के हाथ में है।उस रोज़ मिस्टर सक्सेना कह रहे थे- मिसेज़ मान्या! डू यू वान्ट सम ऑपरच्यूनिटी?
-व्हॉट सर ?
-लंदन जाना चाहेंगी? बोर्ड ऑफ डायरैक्टऱ्ज ने वहां की वेकैंसी के लिये आपका नाम प्रपोज़ किया है।
-नो सर! एकाएक बोली थी वह। सर से पांव तक एक कंपन महसूस किया था उसने।अकेली बच्चे को लेकर किसी दूसरे देश में...? हालांकि उस वक्त पापा के शब्द भी कानों में गूंज गये थे- जीवन में कॅरियर को लेकर कभी इमोशनल मत होना।ज़माना बदल गया है। ज़िंदगी बहुत छोटी होती है।इन्सान को अपने और अपनों के लिये जी लेना चाहिये।
अपने और अपनों के लिये? इस वक्त मौंटू के सिवा उसका अपना है ही कौन! हां! वह मौंटू के भविष्य का सोचेगी। मौंटू की परीक्षाएं नज़दीक आने वाली हैं।उसके बाद वह इंग्लैंड में पढ़ेगा।मौंटू का भविष्य और उसका कॅरियर साथ-साथ चलेंगे।यों भी राजीव जैसे व्यक्तियों की परछाइयों के बीच वह अब नहीं जी पाएगी।
देर रात तक पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने पलटती रही।संडे-टाईम्स में इंग्लैंड के ब्र्राईटन बीच का पूरा आर्टिकल पढ़ डाला।समंदर की लहरें जैसे उसके भीतर उतरती चली गयीं।रात नींद में भी वह मौंटू के साथ उन लहरों से अठखेलियां करती रही।
सुबह उठते ही मान्या ने निर्णय लिया कि वह ऑफिस पहुंचते ही सबसे पहले मिस्टर सक्सेना से अपने लंदन जाने की बात करेगी।


विकेश निझावन

कविताएं
वश में है   - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
तुम बोना कांटे
  - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
माँ की ममता - राजेसिंह उपनाम पी.डी.राजन   तृतीय पुरस्कार
तुम्हारी ममता - श्रीमती स्मिता दारशेतकर
माँ होने का अहसास -  कायनात काजी
हम और बच्चे -  विकेश निझावन
बचायें बचपन
  - रोहिनी कुमार भादानी
ममता का समंदर  - रेणु आहूजा।
ममता
- अम्लान मिश्र
लहरों में  -गरिमा गुप्ता
यादें - समीर लाल

कहानियां
उसके हिस्से का सुख - विकेश निझावन
तरंगों की तल्खियां - धनपत राय झा
ओस की नन्हीं बूंद - सरोज मिश्र  प्रथम पुरस्कार
लेख
बचपन
: सिखाएं अपने बच्चों को दोस्त बनाने की कला- के. सुधा
आप और आपके किशोर होते बच्चे : आज आपने अपने बच्चे को गले लगाया
? - के. सुधा द्वितीय पुरस्कार
 

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