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ममता का समंदर
ममता का समंदर मां के अंदर
खुली बाहों सा आकाश
स्मित चांदनी लिया सा मुखड़ा
छलकती हंसी जैसे प्रभाश

बिछी रेत पर मेरा चलना
था अनुभव भावी जीवन का
नन्हें निर्मल बचपन के कदम
थे जिन पर तेरे सदा नयन

मेरा जीवन तेरी धड़कन
हर पल मुझे कुछ सिखलाना
कभी छोड़ कर अंगुली मेरी
स्वतंत्र दिशा मुझे दिखलाना

तेरे कारण जीवन पथ पर
चला र्निभीक अभय सध कर
और जब जब पाई मैनें गति
मां तब तब तेरी हंसी खिली

आज भी जब सोचा करता हूं
उस सगर तट के वो दिन
बचपन के खेलों में तूने
जहां सीख अनेंकों दी हर दिन

सक्षम सबल अभय अटल
बना उन्हीं खेलों से था
संजो वही संस्कार भावना
बना हर संघर्ष का भी योद्धा
 

 रेणु आहूजा



 

कविताएं
वश में है   - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
तुम बोना कांटे
  - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
माँ की ममता - राजेसिंह उपनाम पी.डी.राजन   तृतीय पुरस्कार
तुम्हारी ममता - श्रीमती स्मिता दारशेतकर
माँ होने का अहसास -  कायनात काजी
हम और बच्चे -  विकेश निझावन
बचायें बचपन
  - रोहिनी कुमार भादानी
ममता का समंदर  - रेणु आहूजा।
ममता
- अम्लान मिश्र
लहरों में  -गरिमा गुप्ता
यादें - समीर लाल

कहानियां
उसके हिस्से का सुख - विकेश निझावन
तरंगों की तल्खियां - धनपत राय झा
ओस की नन्हीं बूंद - सरोज मिश्र  प्रथम पुरस्कार
लेख
बचपन
: सिखाएं अपने बच्चों को दोस्त बनाने की कला- के. सुधा
आप और आपके किशोर होते बच्चे : आज आपने अपने बच्चे को गले लगाया
? - के. सुधा द्वितीय पुरस्कार
 


 

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